राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026
आखिरकार चुनाव आयोग को अपना रुख बदलना पड़ा। जिस मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट की मांग को लेकर राहुल गांधी लगातार आवाज उठा रहे थे, अब राजनीतिक दलों को पढ़ने योग्य डिजिटल मतदाता सूची उपलब्ध कराने का रास्ता खुला है। यह सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि उस लड़ाई का अहम पड़ाव है, जिसमें कांग्रेस लंबे समय से चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची की स्वतंत्र जांच की मांग कर रही है।
राहुल गांधी ने संसद में यह मुद्दा उठाया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा। कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल बार-बार आयोग से मिले। लेकिन मांग पर तत्काल सहमति नहीं बनी। कांग्रेस का आरोप रहा कि आयोग के रवैये और डिजिटल फाइलों के स्वरूप ने मतदाता सूची का वैज्ञानिक विश्लेषण करना और कठिन बना दिया। अब पढ़ने योग्य PDF उपलब्ध कराने के निर्देश को विपक्ष अपनी मांग की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मान रहा है।
एक सीट की जांच में छह महीने, आखिर क्यों?
अगस्त 2025 में राहुल गांधी ने कर्नाटक की महादेवपुरा विधानसभा सीट की मतदाता सूची का विश्लेषण पेश करते हुए 1,00,250 संदिग्ध प्रविष्टियों का आरोप लगाया था। कांग्रेस के मुताबिक, केवल एक सीट के आंकड़ों की जांच में उसकी 40 लोगों की टीम को लगभग छह महीने लगे।
राहुल गांधी की मांग साफ थी—मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट दीजिए, ताकि देशभर की मतदाता सूचियों का कंप्यूटर आधारित विश्लेषण किया जा सके। इससे दोहराए गए नामों, संदिग्ध प्रविष्टियों और मतदाता सूची में हुए बदलावों की व्यवस्थित जांच संभव हो सकती है।
लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि आयोग ने मांग मानने के बजाय राहुल गांधी को ही चुनौती दी। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कथित अनियमितताओं के आरोपों पर सात दिन के भीतर हलफनामा देने या माफी मांगने की बात कही थी। राहुल गांधी ने इसके बाद भी मुद्दे को राजनीतिक और सार्वजनिक बहस में उठाना जारी रखा।
आयोग की चुनौती के सामने लोकतंत्र की आवाज
राहुल गांधी और कांग्रेस ने इस लड़ाई को केवल एक राजनीतिक दल की मांग तक सीमित नहीं रखा। उनका तर्क रहा कि मतदाता सूची पर सवाल उठाने का अधिकार लोकतंत्र में जनता और राजनीतिक दलों दोनों को है। अगर सूची की जांच करना मुश्किल बना दिया जाए, तो संदिग्ध प्रविष्टियों की पहचान और चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा भी प्रभावित होती है।
राहुल गांधी का संदेश यही रहा कि मतदाता सूची की जांच के लिए आवश्यक डिजिटल डेटा उपलब्ध कराया जाए, ताकि आरोपों और दावों की पड़ताल केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस या राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रहे, बल्कि आंकड़ों के आधार पर हो सके।
ज्ञानेश कुमार को शायद अंदाजा नहीं था कि जिस सवाल का जवाब कागजों और आंकड़ों से दिया जाना चाहिए, वह लोकतांत्रिक आंदोलन का मुद्दा बन जाएगा। कांग्रेस ने सड़क से संसद तक इस मांग को उठाया और अब आयोग के नए निर्देश को अपनी लड़ाई की अहम उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है।
आठ साल पुराना सवाल: मध्य प्रदेश, 2018
यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ। वर्ष 2018 में मध्य प्रदेश की मतदाता सूची को लेकर भी कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर संदिग्ध नामों का आरोप लगाया था। पार्टी ने करीब 27 लाख संदिग्ध प्रविष्टियों की बात कही थी। उस समय चुनाव आयोग ने कांग्रेस के आरोपों को स्वीकार नहीं किया था। बाद में मतदाता सूची के पुनरीक्षण में लगभग 24 लाख नाम हटाए जाने की बात सामने आई।
यहीं सवाल उठता है—अगर कांग्रेस के आरोप गलत थे, तो बाद में इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाने की जरूरत क्यों पड़ी? आयोग ने उन नामों को हटाने के कारणों के बारे में क्या जानकारी दी? इन सवालों का जवाब पारदर्शी आंकड़ों और रिकॉर्ड के आधार पर ही मिल सकता है।
कांग्रेस का आरोप रहा है कि मतदाता सूची को ऐसे प्रारूप में उपलब्ध कराया गया, जिसमें कंप्यूटर से बड़े पैमाने पर जांच करना मुश्किल हो गया। तस्वीर के रूप में मौजूद सूची से नामों की तुलना और संदिग्ध प्रविष्टियों की पहचान करना, टेक्स्ट-आधारित डेटा के मुकाबले कहीं अधिक कठिन है।
लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई
राजनीतिक दलों को पढ़ने योग्य मतदाता सूची उपलब्ध कराने का निर्देश महत्वपूर्ण है, लेकिन असली परीक्षा इसके क्रियान्वयन की होगी। क्या सूची के साथ नाम जोड़ने, हटाने और संशोधित करने का पूरा विवरण मिलेगा? क्या राजनीतिक दलों को आंकड़ों का स्वतंत्र विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त डिजिटल सामग्री उपलब्ध होगी? और क्या यही व्यवस्था सभी राज्यों में लागू होगी?
कांग्रेस की मांग केवल एक फाइल या प्रारूप की नहीं, बल्कि ऐसी चुनावी व्यवस्था की है जिसमें मतदाता सूची की जांच करना असंभव या असाधारण रूप से कठिन न हो। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इसी से मजबूत होती है कि चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का जवाब पारदर्शी तरीके से दिया जाए।
आखिरकार संदेश साफ है—आवाज उठेगी, सवाल पूछे जाएंगे और जवाबदेही की मांग जारी रहेगी। राहुल गांधी और कांग्रेस इस फैसले को अपनी लंबी लड़ाई का नतीजा बता रहे हैं।



