राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026
सुप्रीम कोर्ट में एक तरफ़ जजों के बढ़ते वर्कलोड और पर्याप्त आराम न मिल पाने की बात कही जा रही है, तो दूसरी तरफ़ ऐसी अर्जी पर सुनवाई के लिए समय निकाला जा रहा है, जिसके आधार और शिकायतकर्ता की ओर से पैरवी के अधिकार पर ही सवाल उठ रहे हैं। यही विरोधाभास अब न्यायिक प्राथमिकताओं को लेकर बहस का विषय बन गया है।
16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने उस आवेदन पर सुनवाई के लिए सहमति दी, जिसमें आरोप लगाया गया है कि 12 अक्टूबर को अदालत की ओर मार्च के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक गर्भवती महिला पत्रकार को धक्का दिया था। वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के सामने यह मामला उठाया। पीठ ने कहा कि आवेदन और संबंधित याचिका को 26 या 27 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया जा सकता है।
सवाल आरोप का नहीं, न्यायिक प्राथमिकताओं का भी है
राहुल गांधी पर लगाया गया आरोप अभी आरोप ही है, जिसकी सच्चाई सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों से तय होनी है। लेकिन यहां कुछ बुनियादी सवाल भी उठते हैं। क्या शिकायतकर्ता स्वयं अदालत के सामने पेश हुईं? क्या गौरव भाटिया के पास उनकी ओर से पैरवी करने का वैध वकालतनामा है? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सार्वजनिक जानकारी में सामने आना जरूरी है। केवल इन सवालों के आधार पर आवेदन को खारिज मान लेना भी उचित नहीं होगा, लेकिन इनकी जांच किए बिना मामले की गंभीरता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना भी ठीक नहीं है।
जब अदालत खुद वर्कलोड की बात कर रही है…
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की ओर से न्यायाधीशों के भारी कार्यभार और उनकी नींद तक प्रभावित होने की बात कही गई है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि अदालत के सीमित समय का इस्तेमाल किन मामलों के लिए और किन प्राथमिकताओं के आधार पर किया जा रहा है?
एक ओर मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष की चिंताएं हैं। दूसरी ओर, राहुल गांधी के खिलाफ धक्का देने के आरोप वाली अर्जी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने जा रही है। दोनों मामलों के तथ्य और कानूनी प्रकृति अलग हैं, लेकिन आम नागरिक यह जानना चाहता है कि लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े गंभीर सवालों पर न्यायिक कार्रवाई की गति और प्राथमिकताएं किस आधार पर तय होती हैं।
न्याय की कसौटी समानता और पारदर्शिता है
सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता केवल उसके फैसलों से नहीं, बल्कि इस भरोसे से भी मजबूत होती है कि हर मामले को कानून, साक्ष्य और समान मानदंडों पर परखा जाएगा। किसी राजनीतिक नेता के खिलाफ आरोप हो या चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों का मामला—किसी को भी विशेष छूट नहीं मिलनी चाहिए और किसी के साथ राजनीतिक पहचान के आधार पर अलग व्यवहार भी नहीं होना चाहिए।
अब देखना होगा कि सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की स्थिति, आवेदन की वैधता और कथित घटना से जुड़े साक्ष्यों पर क्या सामने आता है। न्यायपालिका से अपेक्षा है कि वह आरोपों की निष्पक्ष जांच करे, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि उसके समय और प्राथमिकताओं को लेकर जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब पारदर्शिता से मिले।



