राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 जून 2026
चुनावी चाणक्य या बीजेपी के लिए ‘रिमोट कंट्रोल’ रणनीतिकार?
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विशेषज्ञ प्रशांत टंडन ने भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पर ऐसा हमला बोला है जिसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। टंडन का दावा है कि प्रशांत किशोर केवल चुनावी सलाहकार नहीं हैं, बल्कि 2014 से ही ऐसी भूमिका निभा रहे हैं जिसका अंतिम राजनीतिक लाभ बार-बार बीजेपी और नरेंद्र मोदी को मिलता दिखाई देता है। टंडन सवाल उठाते हैं कि आखिर यह कैसा संयोग है कि जिन दलों को मजबूत करने का दावा किया जाता है, समय बीतने के साथ वही दल संगठनात्मक संकट, गुटबाजी और राजनीतिक क्षरण का शिकार हो जाते हैं, जबकि बीजेपी और अधिक मजबूत होकर उभरती है। उनका तंज है कि अगर किसी पार्टी को अपने संगठन की जगह एक्सेल शीट, सर्वे रिपोर्ट और पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन से चलाना हो तो वह चुनावी सलाहकारों को सौंप दे, लेकिन अगर राजनीतिक संगठन बचाना हो तो कार्यकर्ताओं पर भरोसा करना होगा।
I-PAC: राजनीतिक ICU या राजनीतिक वायरस?
प्रशांत टंडन ने I-PAC मॉडल पर तीखा व्यंग्य करते हुए कहा कि इसे राजनीतिक दलों के लिए आधुनिक उपचार के रूप में पेश किया गया, लेकिन कई जगह यह इलाज से ज्यादा बीमारी साबित हुआ। उनके अनुसार राजनीतिक दलों में वर्षों से संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं की जगह अचानक डेटा विश्लेषक, कॉरपोरेट सलाहकार और चुनावी प्रबंधकों ने ले ली। टिकट तय करने से लेकर नारों और उम्मीदवारों तक का फैसला ऐसी टीमों के हाथों में चला गया जिनका स्थानीय राजनीति से कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं था। टंडन का कटाक्ष है कि कई दलों ने अपने कार्यकर्ताओं को किनारे कर “सर्वे देवता” और “डेटा महाराज” की पूजा शुरू कर दी। परिणाम यह हुआ कि चुनावी मशीन तो तैयार हुई, लेकिन राजनीतिक आत्मा कहीं खो गई।
बंगाल में टिकट किसे मिला और फायदा किसे हुआ?
टंडन का सबसे बड़ा हमला पश्चिम बंगाल मॉडल पर है। उनका आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस में कई ऐसे नेताओं को टिकट दिलाए गए जो बाद में बीजेपी की राजनीतिक ताकत बन गए। वे सवाल पूछते हैं कि आखिर उम्मीदवार चयन की वह प्रक्रिया कितनी सफल मानी जाए जिसके नतीजे में विपक्ष के कई चेहरे बाद में बीजेपी के खेमे में दिखाई दें। उनका व्यंग्य है कि कुछ लोगों को देखकर ऐसा लगता था मानो टिकट तृणमूल का मिला हो लेकिन भविष्य की नियुक्ति बीजेपी के लिए तय हो। टंडन कहते हैं कि यदि किसी रणनीतिकार की सलाह से चुने गए उम्मीदवार बाद में प्रतिद्वंद्वी दल को मजबूत करें तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
विपक्ष को सलाह, बीजेपी को लाभ — यह कैसा गणित?
टंडन का कहना है कि भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा अनसुलझा गणित यही है कि प्रशांत किशोर जहां भी सलाह देते हैं, वहां अंततः बीजेपी का नुकसान कम और फायदा ज्यादा क्यों दिखाई देता है। उनका व्यंग्य है कि यदि कोई डॉक्टर लगातार मरीजों का इलाज करे और अंत में लाभ किसी तीसरे व्यक्ति को मिले तो जांच तो बनती है। वे दावा करते हैं कि बिहार से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों तक कई घटनाओं में राजनीतिक परिणामों ने इस संदेह को और मजबूत किया है कि कहीं न कहीं विपक्ष की राजनीति को भ्रमित करने का एक बड़ा खेल खेला गया।
कांग्रेस ने दरवाजा नहीं खोला, इसलिए बच गई?
प्रशांत टंडन का मानना है कि कांग्रेस का सबसे समझदारी भरा निर्णय वह था जब उसने प्रशांत किशोर को अपने संगठन का स्थायी हिस्सा बनाने से इनकार कर दिया। उनका आरोप है कि उस समय मीडिया के एक बड़े वर्ग ने ऐसा वातावरण बनाया मानो कांग्रेस को बचाने के लिए कोई राजनीतिक मसीहा आ रहा हो। टीवी स्टूडियो से लेकर अखबारों तक यह संदेश दिया गया कि बिना प्रशांत किशोर के कांग्रेस का भविष्य नहीं है। टंडन तंज कसते हुए कहते हैं कि भारतीय राजनीति में अब कार्यकर्ता नहीं, बल्कि “पावरपॉइंट बाबा” पैदा किए जा रहे हैं, जिनके पास हर समस्या का समाधान स्लाइड नंबर 37 में मौजूद होता है।
जन सुराज: विकल्प या वोट कटवा प्रयोग?
बिहार की राजनीति पर बोलते हुए टंडन ने सबसे तीखा सवाल जन सुराज को लेकर उठाया। उन्होंने पूछा कि आखिर जिस राजनीतिक अभियान को व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन बताया गया, वह चुनाव में निर्णायक शक्ति क्यों नहीं बन सका? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या जन सुराज का वास्तविक असर बीजेपी विरोधी वोटों के बिखराव तक सीमित रहा। टंडन के अनुसार बिहार में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता थे जो बीजेपी के खिलाफ विकल्प तलाश रहे थे, लेकिन वे विभाजित हो गए। उनका व्यंग्यात्मक सवाल है कि क्या यह महज संयोग था या रणनीति का हिस्सा? क्या सेक्युलर और विपक्षी वोटों का विभाजन ही वास्तविक राजनीतिक लक्ष्य था?
चुनावी सलाहकार या लोकतंत्र के नए ठेकेदार?
टंडन का कहना है कि भारत में चुनावी रणनीतिकारों की भूमिका अब लोकतांत्रिक विमर्श का विषय बन चुकी है। वे कहते हैं कि राजनीतिक दलों को तय करना होगा कि वे विचारधारा, संघर्ष और संगठन के दम पर राजनीति करेंगे या फिर चुनावी कंपनियों के भरोसे। उनका आरोप है कि आज कुछ रणनीतिकार राजनीतिक दलों से ज्यादा शक्तिशाली दिखाई देने लगे हैं। टिकट कौन पाएगा, नारा क्या होगा, गठबंधन किससे होगा और चुनावी मुद्दा क्या होगा—सब कुछ कुछ चुनिंदा सलाहकार तय कर रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।
बड़ा सवाल अभी भी कायम
प्रशांत टंडन के आरोपों ने एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है जो वर्षों से राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट के रूप में मौजूद है—क्या प्रशांत किशोर वास्तव में निष्पक्ष चुनावी रणनीतिकार हैं या भारतीय राजनीति के सबसे रहस्यमय खिलाड़ी? क्या वे विपक्ष को जीतना सिखाते हैं या उसे धीरे-धीरे बीजेपी के सामने कमजोर करते हैं? फिलहाल इन सवालों का जवाब भविष्य देगा, लेकिन इतना तय है कि टंडन के आरोपों ने भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चुनावी ब्रांड पर एक बार फिर बहस की आग भड़का दी है।




