Home » Blog » जंतर-मंतर के बाद की लड़ाई: क्या Gen Z को अब ‘दुश्मन’ बनाकर घेरने की तैयारी है?

जंतर-मंतर के बाद की लड़ाई: क्या Gen Z को अब ‘दुश्मन’ बनाकर घेरने की तैयारी है?

ओपिनियन | मुकेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अगस्त 2026

शुरू में लगा था कि मोदी सरकार जंतर-मंतर के आंदोलन से घबराई हुई है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह अचानक खामोश हो गए। संसद का मानसून सत्र चल रहा है, विपक्ष आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठा रहा है, मगर सत्ता के शीर्ष से वह राजनीतिक जवाब सुनाई नहीं दे रहा जिसकी इतनी बड़ी घटना के बाद अपेक्षा की जाती है। खास तौर पर जंतर-मंतर पर आंदोलनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर सवाल अब भी सामने खड़े हैं। निहत्थे युवक-युवतियों के खिलाफ पैलेट गन के इस्तेमाल की बात सामने आई तो स्वाभाविक रूप से पूछा गया कि ऐसा क्यों हुआ, इसकी जरूरत किसने तय की और आदेश किस स्तर से आया? इन सवालों का स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब सरकार को देना चाहिए। लोकतंत्र में पुलिस की ताकत जितनी बड़ी होती है, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री की ‘क्षमा’ और जमीन पर जारी टकराव

प्रधानमंत्री मोदी ने आंदोलनकारियों को लेकर ‘क्षमा’ का संदेश देने वाला वीडियो जारी किया, लेकिन इसके बाद भी राजनीतिक तापमान नीचे नहीं आया। उलटे आंदोलन से जुड़े लोगों की शिकायतें हैं कि पुलिस कार्रवाई और पूछताछ अलग-अलग रूपों में जारी है। यही विरोधाभास सबसे ज्यादा सवाल पैदा करता है। यदि राजनीतिक नेतृत्व सचमुच संवाद और सुलह की दिशा में बढ़ना चाहता है, तो प्रशासनिक व्यवहार में भी उसका असर दिखाई देना चाहिए। केवल एक वीडियो से राजनीतिक विवाद समाप्त नहीं होता। आंदोलनकारी यह भी देखेंगे कि गिरफ्तारियों, मुकदमों, पुलिस पूछताछ और प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार को लेकर सरकार वास्तव में क्या रुख अपनाती है। सत्ता के लिए चुनौती यह है कि वह आलोचना को कानून-व्यवस्था की समस्या समझती है या लोकतंत्र के भीतर असहमति के रूप में स्वीकार करती है।

RSS के बयान ने बहस को नया मोड़ दिया

इस पूरे घटनाक्रम में RSS नेता अतुल लिमये की टिप्पणी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यदि आंदोलन को देश या संविधान विरोधी बताने जैसी राजनीतिक भाषा इस्तेमाल की जाती है तो इससे आंदोलन के मूल मुद्दों पर बहस पीछे छूटने का खतरा पैदा होता है। किसी आंदोलन में शामिल हर व्यक्ति की सोच एक जैसी नहीं होती और न ही किसी आंदोलन की हर गतिविधि का बचाव किया जा सकता है, लेकिन पूरे आंदोलन को एक व्यापक वैचारिक खांचे में डाल देना लोकतांत्रिक बहस को आसान नहीं, मुश्किल बनाता है। संघ परिवार के आलोचक इसी कारण आशंका जता रहे हैं कि Gen Z आंदोलन को अब केवल छात्रों या युवाओं की नाराजगी के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक-वैचारिक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो संघर्ष मुद्दों से हटकर पहचान और राष्ट्रवाद की बहस में फंस जाएगा।

सोशल मीडिया पर दूसरी लड़ाई पहले ही शुरू हो चुकी है

सड़क की लड़ाई से कहीं ज्यादा लंबी लड़ाई सोशल मीडिया पर चल सकती है। यहां आंदोलन के पक्ष और विपक्ष में नैरेटिव तेजी से बनाए जा रहे हैं। समर्थक इसे युवाओं की व्यवस्था से नाराजगी और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं के खिलाफ विद्रोह बता रहे हैं, जबकि विरोधी खेमे में इसके पीछे राजनीतिक शक्तियों, विदेशी प्रभाव या संगठित साजिश जैसी व्याख्याएं सामने आ रही हैं। ऐसी परिस्थितियों में तथ्य सबसे पहले घायल होते हैं। कोई पुराना वीडियो नए आंदोलन से जोड़ दिया जाता है, किसी व्यक्ति की पुरानी पोस्ट निकालकर पूरे आंदोलन की विचारधारा घोषित कर दी जाती है और कुछ लोगों की गतिविधियों के आधार पर हजारों प्रदर्शनकारियों पर एक ही लेबल चिपका दिया जाता है। Gen Z की असली परीक्षा शायद सड़क से ज्यादा इसी सूचना युद्ध में होने वाली है।

लेकिन सरकार के लिए भी खतरा कम नहीं है

सत्ता के रणनीतिकार अगर यह मानकर चल रहे हैं कि कठोर कार्रवाई से आंदोलन खत्म हो जाएगा तो बांकीपुर का हालिया चुनाव परिणाम उनके सामने एक राजनीतिक चेतावनी की तरह रखा जाएगा। प्रशांत किशोर की जीत को सीधे जंतर-मंतर आंदोलन का परिणाम घोषित करना अतिशयोक्ति होगी, क्योंकि किसी चुनाव को स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार, संगठन और कई दूसरे कारक प्रभावित करते हैं। फिर भी विपक्ष ने इस नतीजे को युवा असंतोष से जोड़ना शुरू कर दिया है। राजनीति में धारणा कई बार तथ्य जितनी महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर बड़ी संख्या में युवाओं के भीतर यह धारणा बनती है कि सरकार उनकी शिकायत सुनने के बजाय उन्हें संदेह की नजर से देख रही है, तो पुलिस कार्रवाई आंदोलन को समाप्त करने के बजाय उसकी राजनीतिक स्मृति को और मजबूत कर सकती है।

Cockroach Janta Party के सामने अब आंदोलन से बड़ी चुनौती

Cockroach Janta Party और उसके नेतृत्व के सामने भी असली परीक्षा अब शुरू होगी। आंदोलन खड़ा करना और उसे लंबे समय तक लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और मुद्दा-केंद्रित बनाए रखना दो अलग चीजें हैं। सड़क पर उमड़ी भीड़ उत्साह पैदा करती है, लेकिन राजनीतिक आंदोलन संगठन, अनुशासन और स्पष्ट कार्यक्रम मांगता है। अगर CJP केवल सत्ता-विरोधी गुस्से पर सवार रहती है तो सरकार और उसके विरोधियों के लिए उसे घेरना आसान होगा। उसे बार-बार स्पष्ट करना होगा कि उसका एजेंडा क्या है, उसकी मांगें क्या हैं और उसकी संवैधानिक राजनीति की सीमा कहां तक है। किसी भी हिंसक घटना, उत्तेजक बयान या संदिग्ध गतिविधि से स्पष्ट दूरी बनाना भी जरूरी होगा। आंदोलन जितना बड़ा होगा, उसे बदनाम करने के अवसर भी उतने ही अधिक पैदा होंगे।

विपक्ष को भी तय करना होगा—साथ देना है या सवारी करनी है

कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के सामने विचित्र परिस्थिति है। वे सरकार के खिलाफ युवा आंदोलन का समर्थन करना चाहेंगे, लेकिन अगर वे उसे अपने राजनीतिक मंच में बदलने की कोशिश करेंगे तो आंदोलन की स्वतंत्र पहचान कमजोर पड़ सकती है। Gen Z की राजनीति का आकर्षण ही यह है कि वह स्थापित राजनीतिक दलों से अलग दिखाई देती है। इसलिए विपक्ष को शायद मंच पर कब्जा करने के बजाय संसद, अदालत और सार्वजनिक विमर्श में आंदोलनकारियों के नागरिक अधिकारों की रक्षा पर ध्यान देना चाहिए। पुलिस कार्रवाई की जांच, पैलेट गन के इस्तेमाल की जवाबदेही, गिरफ्तार लोगों को कानूनी सहायता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार जैसे मुद्दों पर विपक्ष अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

सबसे बड़ा सवाल—क्या युवाओं को विरोधी मानना राजनीतिक भूल होगी?

किसी सरकार के लिए विपक्षी पार्टी से लड़ना आसान होता है। पार्टी का अध्यक्ष होता है, कार्यालय होता है, संगठन होता है और राजनीतिक इतिहास होता है। लेकिन एक पूरी पीढ़ी की बेचैनी से लड़ना कहीं ज्यादा मुश्किल है। Gen Z कोई राजनीतिक दल नहीं है। उसके भीतर दक्षिणपंथी भी होंगे, वामपंथी भी, उदारवादी भी और ऐसे युवा भी जिन्हें किसी विचारधारा से कोई मतलब नहीं। उन्हें एक ही राजनीतिक पहचान देकर ‘हम बनाम वे’ की लड़ाई खड़ी करना सरकार के लिए उलटा पड़ सकता है। उसी तरह आंदोलनकारियों के लिए भी हर सरकारी संस्था और हर असहमत नागरिक को दुश्मन समझना घातक होगा।

अब आंदोलन का क्या होगा?

यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। संभव है कि गिरफ्तारियां, मुकदमे, राजनीतिक आरोप, सोशल मीडिया अभियान और दूसरे मुद्दों की बाढ़ धीरे-धीरे जंतर-मंतर की ऊर्जा को कमजोर कर दे। भारतीय राजनीति में ऐसे अनेक आंदोलन हुए हैं जो कुछ सप्ताह सुर्खियों में रहने के बाद बिखर गए। लेकिन यह भी संभव है कि पुलिस कार्रवाई की स्मृति और युवाओं के भीतर मौजूद असंतोष इस आंदोलन को किसी नए राजनीतिक रूप में ढाल दे। इसका फैसला सरकार अकेले नहीं करेगी और न ही CJP या विपक्ष अकेले कर पाएंगे। फैसला इस बात से होगा कि आंदोलन अपनी नैतिक विश्वसनीयता कितने समय तक बचाए रखता है और सरकार लोकतांत्रिक असहमति को किस तरह संभालती है।

अंततः सत्ता को एक बात समझनी होगी—युवाओं से राजनीतिक बहस की जा सकती है, उनके आरोपों का जवाब दिया जा सकता है और उनकी राजनीति को चुनाव में हराया भी जा सकता है; लेकिन किसी पूरी पीढ़ी को संदेह के घेरे में डालकर लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। और आंदोलनकारियों को भी समझना होगा कि सरकार का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, मगर उस अधिकार की सबसे बड़ी ताकत अहिंसा, तथ्य और संवैधानिक मर्यादा है। जंतर-मंतर की अगली लड़ाई शायद सड़क पर नहीं होगी। वह इस बात की लड़ाई होगी कि Gen Z को देश अपनी लोकतांत्रिक ऊर्जा मानेगा या राजनीतिक खतरा।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted