ओपिनियन/ खेल | ABC NATIONAL NEWS | 4 अगस्त 2026
खेलों की दुनिया बड़ी सीधी-सादी मानी जाती है। जो सबसे तेज दौड़ेगा, वही जीतेगा; जो सबसे ऊंचा कूदेगा, पदक उसी का होगा; जो मुकाबले में श्रेष्ठ होगा, पोडियम पर राष्ट्रगान उसी के लिए बजेगा। लेकिन खेलों के बाहर की दुनिया इतनी सरल कहां! कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की राज्यवार भारतीय पदक तस्वीर को देखें तो हरियाणा 11 पदकों के साथ सबसे आगे दिखाई देता है और दिए गए आंकड़ों के अनुसार भारत के 13 स्वर्ण पदकों में से अकेले 7 हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीते। फिर 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी की तरफ नजर घुमाइए—वह गुजरात के हिस्से में है। गुजरात की 2026 वाली इस सूची में पदक संख्या शून्य है। बस यहीं से खेल खत्म और व्यंग्य शुरू होता है। खिलाड़ी हरियाणा तैयार करे, मेडल हरियाणा लाए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय खेलों की बारात गुजरात में उतरे—इसे चाहें तो आधुनिक प्रशासनिक शब्दावली में ‘विकास का संतुलित वितरण’ भी कहा जा सकता है!
हरियाणा के सात गोल्ड और गुजरात का शून्य—लेकिन असली गोल्ड तो मेजबानी है
आंकड़ों के अनुसार हरियाणा 11 पदकों के साथ पहले स्थान पर है। इनमें 7 गोल्ड हैं। मणिपुर के खाते में 4 और तमिलनाडु के खाते में 3 पदक हैं। बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों के खिलाड़ी भी दो-दो पदक लेकर आए। त्रिपुरा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और कर्नाटक ने एक-एक पदक दिया। और गुजरात? शून्य। लेकिन इसे गुजरात की हार समझने की भूल मत कीजिए। खिलाड़ियों के पदक की चमक कुछ वर्षों में रिकॉर्ड बुक के पन्नों में चली जाती है, मगर कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे आयोजन की मेजबानी में स्टेडियम आते हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर आता है, निवेश आता है, अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग आती है और शहर को दुनिया के सामने पेश करने का मौका आता है। यानी दूसरे राज्यों ने पदक जीते, गुजरात ने भविष्य का पूरा आयोजन जीत लिया। राजनीति में शायद इसी को लंबी रेस का खिलाड़ी होना कहते हैं।
खिलाड़ी पैदा करने वाले प्रदेश अलग, खेलों की राजधानी बनने वाला प्रदेश अलग
हरियाणा की खेल संस्कृति किसी सरकारी विज्ञापन की मोहताज नहीं है। गांवों के अखाड़ों से लेकर अंतरराष्ट्रीय पोडियम तक उसके खिलाड़ियों की मौजूदगी लंबे समय से दिखाई देती रही है। मणिपुर जैसे छोटे राज्य ने भी अपनी आबादी और संसाधनों की तुलना में भारतीय खेलों को असाधारण प्रतिभाएं दी हैं। पंजाब, केरल, तमिलनाडु और दूसरे राज्यों की अपनी मजबूत खेल परंपराएं हैं। इसलिए स्वाभाविक सवाल उठता है कि बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से बनने वाला खेल इंफ्रास्ट्रक्चर उन क्षेत्रों तक कितनी प्राथमिकता से पहुंचता है जहां खिलाड़ी वास्तव में तैयार हो रहे हैं? निश्चित रूप से मेजबानी केवल पदक संख्या देखकर तय नहीं की जाती। अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, होटल, परिवहन, सुरक्षा, स्टेडियम, वित्तीय क्षमता और आयोजन प्रबंधन जैसे अनेक पैमाने होते हैं। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना भी खेल भावना का हिस्सा होना चाहिए—अगर प्रतिभा का भूगोल इतना व्यापक है तो खेल निवेश का भूगोल भी उतना ही व्यापक क्यों न हो?
हरियाणा वालों, आप गोल्ड जीतिए—स्टेडियम की चिंता मत कीजिए!
व्यंग्य में तस्वीर कुछ यूं बनती है—हरियाणा के पहलवान, मुक्केबाज और एथलीट सुबह चार बजे उठें, दूध-दही खाएं, अखाड़े में पसीना बहाएं, चोट सहें, ट्रायल दें, राष्ट्रीय शिविर जाएं और फिर भारत के लिए गोल्ड जीतकर तिरंगा ऊपर उठाएं। उसके बाद घर लौटकर टीवी पर देखें कि अगले बड़े खेल आयोजन के लिए चमचमाता इंफ्रास्ट्रक्चर कहीं और तैयार हो रहा है। उनसे कहा जा सकता है—भाई, आपका काम पदक लाना है, मेजबानी जैसे प्रशासनिक विषयों में क्यों पड़ते हो? लोकतंत्र में हर व्यक्ति का अपना विभाग होता है; खिलाड़ी का विभाग मेडल और सरकार का विभाग मेगा इवेंट!
गुजरात को मेजबानी मिलना अपने आप में गलत नहीं, लेकिन सवाल जरूर बनता है
व्यंग्य अपनी जगह है, तथ्य अपनी। गुजरात को 2030 की मेजबानी मिलना अपने आप में किसी अनुचित निर्णय का प्रमाण नहीं है। किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन की मेजबानी के लिए विशाल बुनियादी ढांचे, वित्तीय संसाधनों, परिवहन व्यवस्था और दीर्घकालीन तैयारी की जरूरत होती है। गुजरात इन क्षेत्रों में अपनी दावेदारी पेश कर सकता है। इसलिए केवल यह कहना कि 2026 में पदक शून्य हैं, अतः वहां आयोजन नहीं होना चाहिए, खेल प्रशासन की वास्तविकताओं को बहुत सरल बना देना होगा। लेकिन सवाल यह जरूर है कि इतनी बड़ी सार्वजनिक और संस्थागत ऊर्जा का फायदा देश के खेल पारिस्थितिकी तंत्र को कैसे मिलेगा? क्या इसका लाभ हरियाणा के गांव, मणिपुर की अकादमियां, पंजाब के मैदान और देश के दूसरे प्रतिभा केंद्र भी महसूस करेंगे, या मेगा स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर कुछ चुनिंदा शहरों तक सिमटता जाएगा?
पदक तालिका में संघवाद और आयोजन में केंद्रीकरण?
भारत के पदक नक्शे की खूबसूरती यही है कि सफलता किसी एक राज्य की जागीर नहीं है। हरियाणा आगे है तो मणिपुर भी चमक रहा है; तमिलनाडु योगदान दे रहा है तो बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड भी पीछे नहीं हैं। यही भारतीय खेलों का वास्तविक संघवाद है—प्रतिभा अलग-अलग भाषाओं, संस्कृतियों और भौगोलिक क्षेत्रों से निकलकर तिरंगे के नीचे एक हो जाती है। ऐसे में बड़े आयोजनों की नीति में भी यही संघीय भावना दिखाई देनी चाहिए। जरूरी नहीं कि हर राज्य कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित करे, लेकिन राष्ट्रीय खेल निवेश का लाभ उन राज्यों तक जरूर पहुंचना चाहिए जो लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार कर रहे हैं।
‘राजधर्म’ का असली अर्थ शायद यही होना चाहिए
‘राजधर्म’ का अर्थ गुजरात को मेजबानी न देना नहीं हो सकता। राजधर्म का अर्थ यह होना चाहिए कि गुजरात में विश्वस्तरीय आयोजन हो तो हरियाणा के अखाड़े भी विश्वस्तरीय बनें; अहमदाबाद में आधुनिक स्टेडियम बने तो मणिपुर के प्रतिभाशाली खिलाड़ी को ट्रेनिंग के लिए संसाधनों की कमी न हो; अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के लिए शानदार सुविधाएं बनें तो देश के गांवों में भविष्य के चैंपियन को अच्छे कोच, न्यूट्रिशन, स्पोर्ट्स साइंस और प्रशिक्षण सुविधाएं भी मिलें। मेजबानी किसी एक प्रदेश की हो सकती है, लेकिन उसकी विरासत पूरे भारत की होनी चाहिए।
और अंत में—मेडल का पता और मेजबानी का पता
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की इस राज्यवार तस्वीर को एक लाइन में समेटना हो तो व्यंग्य शायद यही कहेगा—“मेडल का पता हरियाणा, मणिपुर और बाकी भारत; मेजबानी का पता गुजरात।” इसमें समस्या गुजरात नहीं है, असली बहस प्राथमिकताओं की है। खिलाड़ी देश के लिए खेलते हैं, किसी राज्य सरकार के लिए नहीं; उसी तरह अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन भी किसी प्रदेश की प्रतिष्ठा परियोजना भर नहीं होने चाहिए। 2030 में अगर दुनिया गुजरात आए, तो उसे केवल शानदार स्टेडियम और चौड़ी सड़कें ही नहीं, बल्कि ऐसा भारतीय खेल मॉडल भी दिखाई देना चाहिए जिसने हरियाणा से मणिपुर और तमिलनाडु से त्रिपुरा तक प्रतिभा को संसाधन दिए हों। वरना खिलाड़ी गोल्ड जीतते रहेंगे, सरकारें मेजबानी जीतती रहेंगी—और हम तालियां बजाकर इसे ‘राजधर्म’ कहते रहेंगे।




