राष्ट्रीय/ अपराध | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 सितंबर 2026
सुप्रीम कोर्ट में Marital Rape पर संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को लेकर अहम सुनवाई
वैवाहिक बलात्कार यानी Marital Rape को अपराध के दायरे में लाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले में एक बुनियादी कानूनी सवाल उठाया—अगर मौजूदा दंड कानून पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध को ‘बलात्कार’ के अपराध के रूप में परिभाषित नहीं करता, तो क्या अदालत अपने स्तर पर पति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाने का निर्देश दे सकती है? अदालत की यह टिप्पणी इस पूरे विवाद के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू को सामने लाती है।
जबरन यौन संबंध में महिला पीड़ित है—इस पर सवाल नहीं
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की। उनके अनुसार, विवाह के भीतर किसी व्यक्ति के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाया जाता है तो वह निश्चित रूप से पीड़ित है। लेकिन इसके साथ अदालत ने यह भी सवाल रखा कि कानूनी रूप से उस कृत्य को ‘बलात्कार’ के अपराध के रूप में परिभाषित करने का अधिकार किसके पास है। यानी मुद्दा यह नहीं है कि जबरन यौन संबंध महिला के लिए हिंसा या उत्पीड़न है या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा कानून के तहत इसे आपराधिक अपराध के रूप में किस तरह परिभाषित किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने असली संवैधानिक पेच
मामले में अदालत के सामने एक तरफ महिलाओं की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता, निजता और सहमति जैसे मौलिक अधिकारों का प्रश्न है, तो दूसरी तरफ आपराधिक कानून बनाने की संसद की भूमिका का सवाल है। अदालत ने इसी सीमा की ओर संकेत करते हुए पूछा कि जब राज्य के बनाए दंड कानून में कोई कृत्य किसी विशेष अपराध के रूप में परिभाषित नहीं है, तब क्या संवैधानिक अदालत उस पर सीधे आपराधिक अभियोजन का रास्ता खोल सकती है।
यही वह बिंदु है जहां न्यायपालिका और विधायिका की संवैधानिक भूमिकाएं एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं। अदालत कानून की व्याख्या कर सकती है, लेकिन किसी नए आपराधिक अपराध को परिभाषित करने की सीमा कहां तक है—यह प्रश्न इस सुनवाई को बेहद महत्वपूर्ण बना देता है।
महिलाओं की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाहित महिलाओं की सुरक्षा और यौन हिंसा से उनकी रक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यानी विवाह अपने आप में किसी महिला की सहमति को समाप्त नहीं कर देता। लेकिन अदालत के सामने यह तय करने की चुनौती है कि मौजूदा कानूनी ढांचे में ऐसी घटनाओं पर कौन-सा आपराधिक प्रावधान लागू हो सकता है और क्या बलात्कार कानून के तहत मुकदमा चलाने का रास्ता न्यायपालिका स्वयं खोल सकती है।
कानून बदलने का अधिकार संसद का या व्याख्या का अधिकार अदालत का?
यही इस मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। यदि संसद ने वैवाहिक संबंधों के भीतर बलात्कार को अलग तरीके से कानूनी दर्जा दिया है, तो क्या अदालत उस व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा करते हुए उसे बदल सकती है? या फिर ऐसा महत्वपूर्ण आपराधिक बदलाव संसद द्वारा कानून में संशोधन के माध्यम से ही होना चाहिए?
इस बहस का सीधा असर लाखों विवाहित महिलाओं के अधिकारों, घरेलू हिंसा के मामलों और आपराधिक न्याय व्यवस्था पर पड़ सकता है। एक तरफ यह तर्क है कि सहमति विवाह के बाद भी जरूरी है और पत्नी की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध को कानूनी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। दूसरी तरफ सवाल यह है कि अपराध की नई श्रेणी बनाना न्यायपालिका का काम है या विधायिका का।
अब नजर सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर
सुप्रीम कोर्ट की बुधवार की सुनवाई ने फिलहाल किसी अंतिम निष्कर्ष की घोषणा नहीं की है। लेकिन अदालत की टिप्पणियों ने यह बहस और तेज कर दी है कि क्या विवाह किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की यौन सहमति से ऊपर कोई विशेष कानूनी अधिकार देता है? और यदि नहीं, तो उस अधिकार की रक्षा के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त है या कानून में बदलाव जरूरी है?
Marital Rape पर सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई इसलिए भी अहम है क्योंकि फैसला केवल एक कानूनी प्रावधान की व्याख्या तक सीमित नहीं रहेगा। इसके केंद्र में सहमति, वैवाहिक संस्था, महिला की गरिमा, मौलिक अधिकार और संसद बनाम न्यायपालिका की संवैधानिक सीमाएं—इन सभी सवालों का भविष्य जुड़ा हुआ है।




