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5 महीने की NSA हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, नोएडा DM से ₹5 लाख वसूली का आदेश थमा

राष्ट्रीय/ न्यायपालिका | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 सितंबर 2026

सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा की छात्रा आकृति चौधरी की करीब 5 महीने की NSA हिरासत के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम और अन्य अधिकारियों के वेतन से ₹5 लाख की वसूली कर छात्रा को मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट ने छात्रा की हिरासत को अवैध ठहराते हुए मुआवजे की रकम अधिकारियों से वसूलने का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है। मामला नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार, 23 सितंबर को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले पर रोक लगाई। हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी की करीब 5 महीने की हिरासत को गैरकानूनी माना था। इसके बाद अदालत ने अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करते हुए ₹5 लाख की राशि उनके वेतन से वसूलकर छात्रा को मुआवजे के रूप में देने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से फिलहाल उस वसूली पर रोक लग गई है।

मामला दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत से जुड़ा है। उन्हें नोएडा में श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया था। हाई कोर्ट ने इस हिरासत की वैधता की समीक्षा करते हुए इसे गैरकानूनी माना और छात्रा को राहत दी। इसी फैसले में अदालत ने हिरासत के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों से ₹5 लाख की वसूली का निर्देश भी दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील रखी। उन्होंने अदालत के सामने कहा कि ऐसे प्रशासनिक फैसले किसी एक अधिकारी के स्तर पर नहीं लिए जाते, बल्कि कई स्तरों की प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं। इसलिए उनकी दलील थी कि इस मामले में केवल जिलाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से आर्थिक दंड का जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।

रोहतगी ने यह भी तर्क दिया कि प्रशासनिक स्तर पर लिए गए ऐसे फैसलों में अलग-अलग अधिकारियों और विभागों की भूमिका होती है। इसलिए किसी एक अधिकारी के वेतन से मुआवजे की रकम वसूलना उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाई कोर्ट के आदेश के उस हिस्से के अमल पर रोक लगा दी है, जिसमें ₹5 लाख की वसूली का निर्देश दिया गया था।

इस मामले का दूसरा अहम पहलू खुद हिरासत की वैधता है। हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी की करीब 5 महीने की NSA हिरासत को गैरकानूनी बताया था। यानी अदालत के सामने यह सवाल था कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे कठोर कानून के तहत किसी व्यक्ति को इतनी लंबी अवधि तक हिरासत में रखने के लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया और आधार पूरे किए गए थे या नहीं।

NSA यानी National Security Act के तहत प्रशासन को कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की शक्ति मिलती है। लेकिन ऐसी हिरासत न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं होती। हिरासत के खिलाफ अदालत में चुनौती दी जा सकती है और अदालत यह देख सकती है कि संबंधित कानूनी शर्तों और प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।

इस मामले में हाई कोर्ट के आदेश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी था कि हिरासत से प्रभावित छात्रा को मुआवजा दिया जाए। अदालत ने इसके लिए ₹5 लाख की राशि तय की और इसे अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने उस निर्देश के अमल पर रोक लगा दी है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल हाई कोर्ट के इस हिस्से का आदेश लागू नहीं होगा; मामले पर सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई में तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक तरफ प्रशासन की ओर से NSA जैसे कानून के इस्तेमाल का सवाल है और दूसरी तरफ अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने का मुद्दा। अगर प्रशासनिक फैसला कई स्तरों की प्रक्रिया के बाद लिया गया हो, तो किसी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से आर्थिक रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए किस स्तर की जवाबदेही तय की जानी चाहिए—यह सवाल भी सुप्रीम कोर्ट के सामने है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल हाई कोर्ट द्वारा अधिकारियों के वेतन से ₹5 लाख की वसूली के निर्देश पर रोक से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने छात्रा की हिरासत को अवैध ठहराया था और उस फैसले की पृष्ठभूमि में ही मुआवजे का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की आगे की सुनवाई के दौरान हिरासत की प्रक्रिया, अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी और मुआवजे से जुड़े सवालों पर तस्वीर और साफ होगी।

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