राजनीति/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 सितंबर 2026
इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की ताजा जांच रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर दर्ज उन आपत्तियों को सामने ला दिया है, जिनमें 2 चुनाव आयुक्तों ने नए मतदाताओं के Form 6 में किए गए बदलाव को “अनधिकृत” और “अवैध” बताया था। रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया था कि कानून में निर्धारित Form 6 को Registration of Electors Rules, 1960 में बदलाव किए बिना कैसे बदला जा सकता है। इसी खुलासे के बाद अब दिसंबर 2023 में बनाए गए उस कानून पर भी नए सिरे से सवाल उठ रहे हैं, जिसके Section 16 में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम से जुड़े कृत्यों के लिए सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा दी गई है।
यहां सबसे बड़ा सवाल कानून के अस्तित्व पर नहीं, बल्कि उसके समय और उसके असर पर उठाया जा रहा है। यह कानून 28 दिसंबर 2023 को पारित हुआ था और इसमें साफ लिखा गया कि किसी मौजूदा या पूर्व CEC अथवा Election Commissioner के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्य निभाते हुए किए गए किसी कार्य, बात या कदम को लेकर कोई अदालत सिविल या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकती। कानून 2 जनवरी 2024 से लागू हुआ।
दिलचस्प बात यह है कि इसी दिसंबर 2023 में संसद के भीतर विपक्ष की मौजूदगी बेहद कम हो गई थी। 19 दिसंबर 2023 की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 49 और विपक्षी सांसदों के निलंबन के बाद कुल 141 सांसद निलंबित हो चुके थे—लोकसभा के 95 और राज्यसभा के 46। रिपोर्ट के अनुसार, उस समय विपक्षी बेंच लगभग खाली हो गई थीं और संसद में कई महत्वपूर्ण विधेयक आगे बढ़ रहे थे।
यहीं से राजनीतिक सवाल उठता है—जब संसद में विपक्ष के इतने बड़े हिस्से के निलंबन के बीच चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उनके कामकाज से जुड़ा नया कानून आगे बढ़ाया गया, तो क्या सरकार ने उस समय यह अनुमान लगाया था कि भविष्य में चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर गंभीर विवाद पैदा हो सकते हैं? यह एक राजनीतिक सवाल है, जिसका जवाब उपलब्ध दस्तावेजों से तय नहीं होता। यह कहना कि सरकार ने निश्चित रूप से भविष्य में किसी चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी या कार्रवाई को रोकने के लिए जानबूझकर यह प्रावधान बनाया था, फिलहाल उपलब्ध कानून या आधिकारिक रिकॉर्ड से साबित नहीं होता।
लेकिन कानून में मौजूद सुरक्षा को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। Section 16 में सामान्य शब्दों में यह सुरक्षा दी गई है कि किसी CEC या Election Commissioner के आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए “किसी act, thing or word” के संबंध में अदालत सिविल या आपराधिक कार्यवाही को स्वीकार या जारी नहीं रखेगी। यानी प्रावधान केवल एक खास मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि आधिकारिक काम से जुड़े कृत्यों पर व्यापक कानूनी सुरक्षा देता है।
अब इसे Form 6 विवाद के साथ रखकर देखने पर सवाल और गंभीर हो जाता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 16 मई को विवेक जोशी ने कहा था कि Form 6 वैधानिक फॉर्म है और इसमें बदलाव के लिए नियमों में संशोधन जरूरी है। 19 मई को सुखबीर सिंह संधू ने भी इस राय से सहमति जताई। इसके बाद 13 अगस्त को संधू ने फिर लिखा कि दोनों आयुक्तों की स्पष्ट आपत्तियों के बावजूद Form 6 में बदलाव हटाया नहीं गया। उन्होंने इसे “unauthorised/illegal” बताते हुए तत्काल मूल फॉर्म बहाल करने की मांग की। यह आरोप चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों में दर्ज है; इसे किसी अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
और यही वह बिंदु है जहां लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल सामने आता है। अगर चुनाव आयोग जैसा संवैधानिक संस्थान देश की चुनावी प्रक्रिया से जुड़े फैसले करता है और उसी संस्था के भीतर उसके 3 में से 2 सदस्य किसी कदम पर लिखित कानूनी आपत्ति दर्ज करते हैं, तो जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उस आपत्ति पर क्या कार्रवाई हुई, किसने अंतिम निर्णय लिया और किस कानूनी आधार पर लिया। सिर्फ यह कहना कि संस्थाओं के भीतर मतभेद सामान्य हैं, इन सवालों का पूरा जवाब नहीं है।
दूसरी तरफ, 2023 का कानून खुद यह व्यवस्था करता है कि चुनाव आयोग के कामकाज में मतभेद होने पर बहुमत के आधार पर फैसला हो सकता है। Section 18 के मुताबिक आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होगा और मतभेद होने पर बहुमत की राय मान्य होगी। इसलिए 2 आयुक्तों की आपत्ति अपने आप में किसी फैसले को अवैध साबित नहीं करती। लेकिन उनकी लिखित आपत्तियां यह जरूर दिखाती हैं कि आयोग के भीतर गंभीर कानूनी और प्रक्रियागत सवाल उठाए गए थे।
सबसे बड़ा सवाल इसलिए अब यह नहीं है कि “किसे गिरफ्तार किया जाएगा”, बल्कि यह है कि चुनाव आयोग के फैसलों पर जवाबदेही की सीमा क्या होनी चाहिए? चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि फैसलों की पारदर्शिता, कानून का पालन और संस्थागत जवाबदेही से बनता है। Form 6 विवाद और 2023 के Section 16 को साथ रखकर देखने पर सरकार और चुनाव आयोग—दोनों के सामने यही सवाल खड़ा होता है कि जब संस्था के भीतर ही गंभीर आपत्तियां दर्ज हों, तो जनता को पूरी प्रक्रिया, निर्णय का आधार और आपत्तियों पर हुई कार्रवाई की जानकारी कितनी स्पष्टता से दी जानी चाहिए।
इसलिए “मोदी सरकार ने पहले से गिरफ्तारी रोकने के लिए कानून बनाया” कहना अभी एक राजनीतिक निष्कर्ष है, स्थापित तथ्य नहीं। लेकिन यह स्थापित तथ्य जरूर है कि दिसंबर 2023 में ऐसा कानून बना, उसमें चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कार्यों के संबंध में सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा दी गई, और उसी महीने 141 विपक्षी सांसद निलंबित हुए। आज जब चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां सार्वजनिक हो रही हैं, तो 2023 के इस कानून की जरूरत, उसकी व्यापकता और उसके समय—तीनों पर सार्वजनिक बहस होना स्वाभाविक है।



