राजनीति/ न्यायपालिका | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 सितंबर 2026
मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC और चुनाव आयुक्तों यानी ECs की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बुधवार को 2 जजों की पीठ की राय अलग-अलग हो गई। मामला उस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा है, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से CJI यानी भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट की 2 जजों की पीठ में शामिल जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा इस बात पर अलग-अलग राय रखते नजर आए कि मामले को बड़ी पीठ के पास किस तरीके से भेजा जाना चाहिए। हालांकि दोनों जज इस बात पर सहमत थे कि मामला CJI के सामने रखा जाना चाहिए, ताकि वह संविधान पीठ गठित करने पर विचार कर सकें।
मामले की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि चुनौती सीधे उस कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़ी है, जिसके तहत CEC और ECs की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था तय की गई है। याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति चयन प्रक्रिया में CJI को शामिल नहीं किए जाने को लेकर है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाई थी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI शामिल थे। बाद में संसद ने नया कानून बनाकर नियुक्ति की अलग व्यवस्था तय की।
बुधवार को सुनवाई के दौरान दोनों जजों के बीच इस बात पर मतभेद रहा कि मामले को पहले 3 जजों की पीठ के पास भेजा जाए या सीधे संविधान पीठ के गठन के लिए CJI के सामने रखा जाए। संयुक्त आदेश में कहा गया कि पहले 3 जजों की पीठ के पास भेजना ज्यादा उपयोगी नहीं होगा और इससे मामले में उठे महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर अंतिम निर्णय में देरी हो सकती है।
इसलिए दोनों जजों ने मामले को CJI के समक्ष रखने पर सहमति जताई। अब CJI इस बात पर विचार करेंगे कि क्या इस मामले की सुनवाई कम से कम 5 जजों वाली संविधान पीठ द्वारा की जानी चाहिए।
विवाद का एक बड़ा पहलू यह है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और CEC तथा ECs देश की चुनावी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया कितनी स्वतंत्र और संतुलित होनी चाहिए, यह सवाल लंबे समय से न्यायपालिका और राजनीति के बीच बहस का विषय रहा है।
2023 के कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। इस व्यवस्था में CJI की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है। इसी बदलाव को लेकर कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं में संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब चुनाव आयोग के कामकाज और उसकी संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर भी सार्वजनिक बहस तेज है। हाल में चुनाव आयोग के 2 आयुक्तों की ओर से विभिन्न चुनावी प्रक्रियाओं और तकनीकी व्यवस्था पर दर्ज लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई है। हालांकि नियुक्ति कानून की वैधता और आयोग के भीतर दर्ज इन आपत्तियों के बीच कानूनी रूप से कोई सीधा निष्कर्ष अभी नहीं निकाला गया है।
अब गेंद CJI के पाले में है। यदि संविधान पीठ गठित होती है, तो सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि 2023 का चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं, और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता तथा नियुक्ति प्रक्रिया के बीच संवैधानिक संतुलन किस तरह तय किया जाना चाहिए।



