राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 24 अक्टूबर 2026
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कामकाजी लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को मुंबई विश्वविद्यालय के कलिना परिसर के बाहर हुए इस प्रदर्शन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी, SIR प्रक्रिया को पूरी तरह वापस लेने और पुरानी मतदाता सूची के आधार पर नए चुनाव कराने की मांग उठाई गई।
यह प्रदर्शन दिशा स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन और भगत सिंह जन अधिकार यात्रा (BSJAY) की ओर से आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले 2023 के कानून को भी रद्द करने की मांग की। उनका कहना था कि मौजूदा चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिनका जवाब दिया जाना जरूरी है।
SIR को लेकर क्यों नाराज हैं प्रदर्शनकारी?
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया से लोगों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। उन्होंने खास तौर पर वंचित और हाशिये पर रहने वाले समुदायों के मताधिकार को लेकर चिंता जताई।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें किसी योग्य मतदाता का नाम गलती से न कटे। उनका तर्क था कि यदि किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची से हट जाता है, तो उसके लिए चुनाव में भाग लेना मुश्किल हो सकता है।
इसी आधार पर उन्होंने SIR को पूरी तरह वापस लेने की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि नए चुनाव पुरानी मतदाता सूचियों के आधार पर कराए जाने चाहिए।
हालांकि, प्रदर्शन के दौरान लगाए गए आरोप प्रदर्शनकारियों का पक्ष हैं। मतदाता सूची में बदलाव और किसी मतदाता के नाम को हटाने से जुड़े मामलों की वास्तविक स्थिति का आकलन आधिकारिक आंकड़ों और संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना जरूरी है।
ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग
प्रदर्शन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भी नारे लगाए गए और उनकी गिरफ्तारी की मांग की गई। प्रदर्शनकारियों ने भारतीय चुनाव आयोग पर बीजेपी के हित में काम करने का आरोप लगाया।
उनका कहना था कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बुनियादी शर्त है और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता होनी चाहिए। उन्होंने मांग की कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों की जांच की जाए और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो।
चुनाव आयोग की भूमिका और निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक दलों तथा सामाजिक संगठनों के बीच पहले भी बहस होती रही है। ऐसे मामलों में किसी संस्था पर लगाए गए आरोपों और जांच में सामने आए तथ्यों के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण है। मुंबई में हुआ प्रदर्शन इस मुद्दे पर बढ़ती सार्वजनिक चिंता को सामने लाता है।
2023 के कानून को रद्द करने की मांग
प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को भी रद्द करने की मांग की। उनका विरोध नियुक्ति व्यवस्था को लेकर था और वे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता को मजबूत करने की मांग कर रहे थे।
चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। चुनावों का संचालन, मतदाता सूची का प्रबंधन और चुनावी प्रक्रिया की निगरानी उसकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल हैं। इसलिए आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर होने वाली बहस का सीधा संबंध चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वास से है।
प्रदर्शनकारियों का मानना था कि नियुक्ति व्यवस्था में बदलाव और SIR की वापसी से जुड़े सवालों पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में सरकार या चुनाव आयोग की ओर से मुंबई में उठाई गई इन मांगों पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है।
देश के अन्य हिस्सों में भी जारी है विरोध
मुंबई विश्वविद्यालय के बाहर हुआ प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ है, जब SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन की खबरें सामने आ रही हैं। छात्र संगठनों और नागरिक समूहों की भागीदारी से यह मुद्दा केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि मताधिकार और चुनावी पारदर्शिता को लेकर सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें स्पष्ट थीं—SIR को वापस लिया जाए, पुरानी मतदाता सूची के आधार पर नए चुनाव कराए जाएं, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई हो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को रद्द किया जाए।
अब इस मुद्दे पर आगे की स्थिति चुनाव आयोग और सरकार की प्रतिक्रिया, मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े तथ्यों तथा कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी। इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करते हुए हर योग्य नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा कैसे की जाए और चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास कैसे बनाए रखा जाए।



