ओपिनियन | शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 अक्टूबर 2026
भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना चाहता है। सरकार की योजना है कि 2047 तक देश में परमाणु बिजली बनाने की क्षमता 100 गीगावाट तक पहुंचाई जाए। यह लक्ष्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश को बढ़ती आबादी, उद्योगों, शहरों और खेती के लिए लगातार ज्यादा बिजली की जरूरत होगी। परमाणु बिजली से कोयले पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिल सकती है।
लेकिन इस बड़ी योजना के सामने कुछ ऐसे सवाल हैं, जिन पर उतनी चर्चा नहीं हो रही, जितनी होनी चाहिए। क्या भारत के पास पर्याप्त यूरेनियम है? अगर दुनिया में यूरेनियम की कमी बढ़ी, तो परमाणु बिजली कितनी महंगी होगी? निजी कंपनियां इस क्षेत्र में आएंगी, तो दुर्घटना और परमाणु कचरे की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? क्या बिजली से कमाई निजी कंपनियों को मिलेगी और लंबे समय तक चलने वाले जोखिम का खर्च सरकार यानी जनता उठाएगी?
यही इस पूरी बहस का सबसे अहम सवाल है।
दुनिया में ऊर्जा संकट, भारत के सामने नई चुनौती
दुनिया पहले ही तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना कर रही है। खाड़ी क्षेत्र और लाल सागर में तनाव बढ़ने से जहाजों की आवाजाही, ईंधन की आपूर्ति और माल ढुलाई पर असर पड़ सकता है। जब जहाजों का रास्ता लंबा होता है या बीमा और परिवहन का खर्च बढ़ता है, तो उसका असर सामान की कीमतों पर भी पड़ता है।
ऊर्जा की कमी लंबे समय तक बनी रहे, तो महंगाई बढ़ सकती है। सरकारों को खेती, अस्पतालों, आपात सेवाओं और जरूरी सामान की आपूर्ति के लिए ईंधन को प्राथमिकता देनी पड़ सकती है। उद्योगों की लागत बढ़ सकती है और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है।
ऐसे समय में परमाणु बिजली एक उपयोगी विकल्प बन सकती है। यह मौसम पर उसी तरह निर्भर नहीं करती, जैसे सौर और पवन ऊर्जा करती हैं। लेकिन परमाणु बिजली की अपनी मुश्किलें हैं। इसके लिए सुरक्षित परमाणु ईंधन, महंगे संयंत्र, प्रशिक्षित कर्मचारी और कचरे को सुरक्षित रखने की लंबी व्यवस्था चाहिए।
यानी केवल परमाणु संयंत्र बना देने से ऊर्जा सुरक्षा नहीं मिलती। उसके लिए जरूरी ईंधन भी लगातार उपलब्ध होना चाहिए।
यूरेनियम की कमी से बढ़ सकती है लागत
परमाणु बिजली बनाने के लिए यूरेनियम एक महत्वपूर्ण ईंधन है। भारत के पास यूरेनियम के भंडार हैं, लेकिन घरेलू उत्पादन देश की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता। इसी वजह से भारत को कजाकिस्तान, कनाडा, रूस, ऑस्ट्रेलिया, उज्बेकिस्तान और फ्रांस जैसे देशों से यूरेनियम की आपूर्ति पर भी निर्भर रहना पड़ता है।
अगर दुनिया में यूरेनियम की मांग तेजी से बढ़ती है और उत्पादन उसके हिसाब से नहीं बढ़ता, तो कीमतें ऊपर जा सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने के साथ भारत के लिए परमाणु बिजली बनाना भी महंगा हो सकता है।
यूरेनियम की नई खदान खोलना कोई छोटा काम नहीं है। इसके लिए जमीन, तकनीक, निवेश, पर्यावरण संबंधी मंजूरी और सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत होती है। एक नई खदान को उत्पादन शुरू करने में 15 से 20 साल तक लग सकते हैं। इसलिए आज की जरूरत के लिए कल खुलने वाली खदानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) से जुड़े वैश्विक अनुमानों में 2050 तक यूरेनियम की मांग में बड़ी बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। लेकिन भविष्य की मांग और आपूर्ति का सही अंतर इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने परमाणु संयंत्र बनते हैं, कितनी नई खदानें खुलती हैं और पुराने संयंत्रों के लिए कितना ईंधन चाहिए।
भारत के लिए इसका सीधा मतलब है कि परमाणु बिजली का विस्तार करने से पहले ईंधन की दीर्घकालीन व्यवस्था मजबूत करनी होगी। केवल संयंत्र बनाने का लक्ष्य तय कर देना काफी नहीं है।
थोरियम के बड़े भंडार, लेकिन समाधान अभी दूर
भारत के पास थोरियम के बड़े भंडार हैं। दुनिया के कुल थोरियम संसाधनों में भारत की हिस्सेदारी करीब एक चौथाई मानी जाती है। इस वजह से थोरियम को भारत की परमाणु ऊर्जा योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता रहा है।
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। थोरियम को सीधे सामान्य परमाणु ईंधन की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। रिएक्टर के भीतर एक प्रक्रिया से इसे यूरेनियम-233 में बदलना पड़ता है। इसके लिए खास तरह की तकनीक, ईंधन तैयार करने की व्यवस्था और रेडियोधर्मी पदार्थों की सुरक्षित निगरानी चाहिए।
यही कारण है कि भारत के पास थोरियम होने के बावजूद इससे बड़े स्तर पर व्यावसायिक बिजली उत्पादन शुरू नहीं हो पाया है।
भारत अपने परमाणु कार्यक्रम को अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ा रहा है। कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर से जुड़ी प्रगति इस दिशा में महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2026 में इसके पहली बार क्रिटिकल होने की घटना को भारत के दूसरे चरण के परमाणु कार्यक्रम की दिशा में एक कदम माना गया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि थोरियम से बड़े पैमाने पर सस्ती बिजली तत्काल मिलने लगेगी।
थोरियम भविष्य में यूरेनियम पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन अभी की ईंधन समस्या का तुरंत समाधान नहीं है।
निजी कंपनियां आएंगी, तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
भारत ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया है। 2025 का SHANTI कानून इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य पात्र निजी कंपनियों और संयुक्त उपक्रमों के लिए नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भागीदारी का रास्ता खोलना है। हालांकि, परमाणु ईंधन संवर्धन और इस्तेमाल किए गए ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण जैसी संवेदनशील गतिविधियों पर सरकारी नियंत्रण बना रहता है।
निजी निवेश से पूंजी जुटाने, नई तकनीक लाने और परियोजनाओं का विस्तार करने में मदद मिल सकती है। लेकिन परमाणु ऊर्जा कोई सामान्य कारोबार नहीं है। इसमें दुर्घटना का जोखिम, रेडियोधर्मी कचरे का प्रबंधन और हजारों साल तक सुरक्षा बनाए रखने की चुनौती शामिल है।
यहीं से असली बहस शुरू होती है।
यदि कोई निजी कंपनी परमाणु संयंत्र चलाती है और उससे बिजली बेचकर कमाई करती है, तो दुर्घटना होने पर उसकी जिम्मेदारी कितनी होगी? अगर नुकसान तय सीमा से बहुत ज्यादा हो जाए, तो बाकी रकम कौन देगा? और यदि परमाणु कचरे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में भारी खर्च आए, तो उसका भुगतान किसकी जेब से होगा?
इन सवालों का जवाब कानून और व्यवस्था में साफ होना चाहिए। केवल निजी निवेश को बढ़ावा देना पर्याप्त नहीं है।
दुर्घटना की जिम्मेदारी और जनता का पैसा
SHANTI कानून के तहत परमाणु संयंत्र की क्षमता के आधार पर संचालक की देनदारी की अलग-अलग सीमाएं तय की गई हैं। दिए गए विवरण के अनुसार, माइक्रो-रिएक्टर के लिए यह सीमा ₹100 करोड़ से शुरू होकर बड़े संयंत्रों के लिए ₹3,000 करोड़ तक जाती है। तय सीमा से अधिक मुआवजे की स्थिति में सरकारी सहायता की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
इस व्यवस्था के समर्थकों का तर्क हो सकता है कि स्पष्ट देनदारी सीमा से निजी निवेशकों को जोखिम समझने और परियोजनाओं में पूंजी लगाने में मदद मिलती है। लेकिन आलोचकों की चिंता अलग है। उनका कहना है कि यदि दुर्घटना का नुकसान तय सीमा से बहुत अधिक हुआ, तो बड़ी रकम का बोझ आखिरकार सरकार और जनता पर आ सकता है।
परमाणु दुर्घटना की कीमत केवल संयंत्र की मरम्मत तक सीमित नहीं होती। इससे लोगों के स्वास्थ्य, खेती, जमीन, पानी, रोजगार और पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा में आने दिया जाए या नहीं। सवाल यह है कि उन्हें किस तरह की जिम्मेदारी के साथ काम करने दिया जाए।
अगर कंपनी मुनाफा कमाती है, तो उसे जोखिम के अनुपात में जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए। जनता के पैसे को किसी निजी कारोबार के नुकसान की भरपाई का आसान रास्ता नहीं बनाया जाना चाहिए।
परमाणु कचरा: हजारों साल की जिम्मेदारी
परमाणु बिजली बनाने के बाद इस्तेमाल किया गया ईंधन और रेडियोधर्मी कचरा बचता है। इस कचरे को सुरक्षित रखना साधारण औद्योगिक कचरे की तरह नहीं है। इसके कुछ हिस्से लंबे समय तक खतरनाक बने रह सकते हैं और उनके प्रबंधन के लिए बेहद सावधानी की जरूरत होती है।
भारत में उच्च स्तर के रेडियोधर्मी कचरे और इस्तेमाल किए गए ईंधन का प्रबंधन मुख्य रूप से सरकारी व्यवस्था के नियंत्रण में रहता है। इस्तेमाल किए गए ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण और बचे हुए रेडियोधर्मी कचरे को सुरक्षित रूप में रखने जैसी प्रक्रियाएं तकनीकी रूप से जटिल और महंगी हैं।
संयंत्र चलाने वाली कंपनियों से कचरा प्रबंधन और संयंत्र को बंद करने के बाद उसकी सफाई के लिए वित्तीय सुरक्षा की अपेक्षा की जाती है। लेकिन यदि इन खर्चों के लिए पर्याप्त, अलग और सुरक्षित कोष नहीं बनाया गया, तो भविष्य में सरकार पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
मान लीजिए, कोई कंपनी 40 या 60 साल तक बिजली बनाकर कमाई करती है। उसके बाद संयंत्र बंद करना पड़ता है और उस जगह को सुरक्षित बनाने में भारी खर्च आता है। अगर उस समय कंपनी के पास पर्याप्त पैसा नहीं हुआ, तो जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
यही कारण है कि हर परमाणु परियोजना के लिए शुरुआत से ही कचरा प्रबंधन, संयंत्र बंद करने और लंबे समय तक निगरानी की लागत का हिसाब होना चाहिए। इस काम के लिए अलग कोष बनाया जाना चाहिए और उसमें नियमित योगदान अनिवार्य होना चाहिए।
सवाल यह भी है कि क्या भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में सरकारी कंपनी न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) को और मजबूत करने की जरूरत नहीं है? देश के पास पहले से परमाणु संयंत्र चलाने और उनसे जुड़ी तकनीकी व्यवस्था का अनुभव है। निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाते समय इस अनुभव को कमजोर करने के बजाय मजबूत करना जरूरी है।
छोटे परमाणु रिएक्टर कितने उपयोगी होंगे?
भारत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR पर भी काम कर रहा है। सरकार के परमाणु ऊर्जा मिशन के लिए ₹20,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। योजना के तहत 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इनमें 220 मेगावाट क्षमता वाला भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर भी शामिल है।
छोटे रिएक्टरों का फायदा यह हो सकता है कि उन्हें अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से लगाया जा सके और बड़े संयंत्रों की तुलना में निर्माण का तरीका अधिक लचीला हो। लेकिन छोटा रिएक्टर अपने आप सस्ता रिएक्टर नहीं बन जाता।
उसकी लागत इस बात पर निर्भर करेगी कि उसे बनाने में कितना पैसा लगता है, सुरक्षा नियम कितने स्पष्ट हैं, ईंधन कितनी आसानी से मिलता है और उसके कचरे को सुरक्षित रखने की व्यवस्था कितनी महंगी है।
यदि तकनीक महंगी हुई या परियोजना समय पर पूरी नहीं हुई, तो बिजली की लागत बढ़ सकती है। इसलिए किसी भी नई तकनीक को केवल घोषणा या लक्ष्य के आधार पर सफल नहीं माना जा सकता। उसकी वास्तविक लागत, सुरक्षा और व्यावसायिक उपयोगिता का मूल्यांकन जरूरी है।
अगले 20 साल की तैयारी आज करनी होगी
भारत को परमाणु ऊर्जा की जरूरत है, लेकिन इसके लिए लंबी अवधि की योजना बनानी होगी। दुनिया में यूरेनियम के संसाधन मौजूद होने का मतलब यह नहीं है कि वह तुरंत सस्ती कीमत पर उपलब्ध हो जाएगा। खदान से ईंधन तैयार करने, उसे सुरक्षित तरीके से भारत तक पहुंचाने और संयंत्रों की जरूरत के मुताबिक उपलब्ध कराने में समय और पैसा लगता है।
भारत को दूसरे देशों के साथ दीर्घकालीन आपूर्ति समझौते करने चाहिए। जरूरत के अनुसार रणनीतिक भंडार भी तैयार किए जा सकते हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय बिजली उत्पादन प्रभावित न हो। घरेलू खदानों के विकास और मौजूदा खदानों की क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा।
इसके साथ ही परमाणु ईंधन के पुनर्चक्रण, फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों और थोरियम पर शोध जारी रखना चाहिए। समुद्री पानी से यूरेनियम निकालने जैसी तकनीकों पर भी दुनिया में काम हुआ है, लेकिन इन्हें बड़े स्तर पर सस्ता और व्यावहारिक बनाने में अभी चुनौतियां हैं।
इसलिए भारत को आज की जरूरत और भविष्य की तकनीक के बीच संतुलन बनाना होगा। जो तकनीक अभी व्यावसायिक रूप से तैयार नहीं है, उसके भरोसे वर्तमान की बिजली जरूरतें पूरी करने की योजना नहीं बनाई जा सकती।
मुनाफा निजी, जोखिम जनता के सिर क्यों?
परमाणु ऊर्जा पर बहस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा की कीमत कौन चुकाएगा। यदि निजी कंपनियों को इस क्षेत्र में निवेश करने का अवसर दिया जा रहा है, तो उनके लिए स्पष्ट नियम, मजबूत सुरक्षा मानक और जवाबदेही भी जरूरी है।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों को समय पर मुआवजा मिले, कचरे के प्रबंधन के लिए पर्याप्त पैसा पहले से जमा हो और संयंत्र बंद होने के बाद भी सुरक्षा की जिम्मेदारी अधूरी न रह जाए।
बिजली की कीमत तय करते समय भी इन सभी खर्चों को शामिल किया जाना चाहिए। आज बिजली सस्ती दिखे, लेकिन भविष्य में कचरा प्रबंधन और संयंत्र बंद करने का बिल जनता पर डाल दिया जाए, तो यह वास्तविक लागत को छिपाने जैसा होगा।
परमाणु ऊर्जा को केवल निवेश और उत्पादन के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। इसमें लोगों की सुरक्षा, पर्यावरण, आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी और सार्वजनिक धन का सवाल भी शामिल है।
भारत को परमाणु ऊर्जा से पीछे हटने की जरूरत नहीं है। लेकिन 2047 का लक्ष्य हासिल करने की दौड़ में यह नहीं भूलना चाहिए कि ऊर्जा सुरक्षा का मतलब सिर्फ ज्यादा बिजली बनाना नहीं है। इसका मतलब है ऐसी बिजली बनाना, जो लंबे समय तक उपलब्ध हो, जिसकी कीमत लोगों की पहुंच में रहे और जिसका जोखिम समाज पर न थोप दिया जाए।
निजी कंपनियां निवेश करें, तकनीक लाएं और बिजली उत्पादन में योगदान दें—लेकिन मुनाफे के साथ जिम्मेदारी भी उनकी होनी चाहिए। यूरेनियम की सुरक्षित आपूर्ति, घरेलू तकनीक, मजबूत NPCIL, पारदर्शी मुआवजा व्यवस्था और परमाणु कचरे के लिए पर्याप्त कोष, इन सबके बिना परमाणु ऊर्जा का विस्तार अधूरा रहेगा। आखिरकार, सवाल सिर्फ परमाणु बिजली का नहीं है। सवाल यह है कि विकास की कीमत कौन चुकाएगा—और उसका फायदा किसे मिलेगा?



