राष्ट्रीय/ शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 जुलाई 2026
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव के लिए लाए गए ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक-2025’ को लेकर अब नई बहस शुरू हो गई है। खास बात यह है कि इस बार सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि बीजेपी शासित कुछ राज्यों ने भी इस विधेयक पर सवाल उठाए हैं।
आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और मेघालय सरकार ने संसद की समिति के सामने कहा है कि इस बिल के कुछ प्रावधानों से उच्च शिक्षा पर केंद्र सरकार का नियंत्रण बहुत ज्यादा बढ़ सकता है। राज्यों का मानना है कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय में राज्यों की भूमिका भी बनी रहनी चाहिए।
दरअसल, केंद्र सरकार इस नए बिल के जरिए यूजीसी (UGC), एआईसीटीई (AICTE) और एनसीटीई (NCTE) जैसी अलग-अलग संस्थाओं को खत्म करके उनकी जगह एक नई संस्था ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA)’ बनाना चाहती है। सरकार का कहना है कि इससे काम आसान होगा, फैसले जल्दी होंगे और पूरे देश में एक जैसी व्यवस्था लागू होगी।
लेकिन कई राज्यों और विश्वविद्यालयों को डर है कि सारी ताकत एक ही संस्था के हाथ में आ जाएगी। उनका कहना है कि इससे राज्यों और विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) ने भी इस बिल पर चिंता जताई है। विश्वविद्यालय का कहना है कि नई व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे एक स्वतंत्र नियामक संस्था सीधे केंद्र सरकार के प्रभाव में आ जाए। विश्वविद्यालय ने सुझाव दिया है कि संस्था को स्वतंत्र रखने के लिए मजबूत नियम बनाए जाएं।
कुछ अन्य विश्वविद्यालयों ने भी कहा है कि नई संस्था के अधिकार स्पष्ट होने चाहिए। उसके फैसलों पर निगरानी की व्यवस्था भी होनी चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे और किसी तरह का मनमाना फैसला न हो।
राज्यों का कहना है कि शिक्षा केवल केंद्र का विषय नहीं है। इसमें राज्यों की भी बराबर जिम्मेदारी और भूमिका है। इसलिए ऐसा कोई भी कानून बनाते समय राज्यों से सलाह लेना और उनकी बात को महत्व देना जरूरी है।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि यह बिल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत लाया गया है। सरकार का दावा है कि अभी कई संस्थाएं अलग-अलग नियमों के तहत काम करती हैं, जिससे छात्रों और विश्वविद्यालयों को दिक्कत होती है। एक ही संस्था बनने से व्यवस्था सरल होगी और फैसले जल्दी लिए जा सकेंगे।
हालांकि, शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार जरूरी हैं, लेकिन सुधार के नाम पर सारी शक्तियां एक ही संस्था को देना भी ठीक नहीं होगा। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और राज्यों की भागीदारी बनी रहनी चाहिए।
अब यह विधेयक संसद की समिति के पास है। समिति राज्यों, विश्वविद्यालयों और शिक्षा विशेषज्ञों की राय पर विचार करेगी। इसके बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को देगी। संभव है कि सुझावों के आधार पर बिल में कुछ बदलाव भी किए जाएं।
फिलहाल इतना तय है कि यह विधेयक आने वाले समय में देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को बदल सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई व्यवस्था शिक्षा को बेहतर बनाएगी या फिर राज्यों और विश्वविद्यालयों की भूमिका सीमित कर देगी? इसी मुद्दे पर अब बहस तेज होती जा रही है।




