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सुस्त विपक्ष और आक्रामक बीजेपी: क्या भारतीय राजनीति एकतरफा होती जा रही है?

ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | 10 मई 2026

2026 के विधानसभा चुनावों ने भारतीय विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी को पूरी तरह उजागर कर दिया है। बीजेपी सिर्फ चुनाव नहीं जीत रही, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव, संगठन, रणनीति और संस्थागत पकड़—हर स्तर पर विपक्ष से कई कदम आगे दिखाई दे रही है। दूसरी तरफ विपक्ष बिखरा हुआ, भयभीत और दिशाहीन नजर आ रहा है। सवाल यह नहीं रह गया कि बीजेपी क्यों जीत रही है, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि विपक्ष आखिर लड़ क्यों नहीं पा रहा। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद ऐसा लग रहा था कि INDIA गठबंधन बीजेपी को कड़ी चुनौती देगा। लेकिन वह गठबंधन कुछ महीनों में ही बिखरता दिखाई दिया। संसद से लेकर राज्यों तक विपक्षी दल एक-दूसरे से दूरी बनाते रहे। ममता बनर्जी ने कई बार INDIA लाइन से अलग रुख अपनाया। कांग्रेस अपने पुराने ढर्रे से बाहर नहीं निकल सकी। वाम दल सीमित दायरों में सिमट गए। नतीजा यह हुआ कि बीजेपी ने अपने संगठन और सहयोगी ढांचे को फिर से सक्रिय कर लिया।

पश्चिम बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया। बीजेपी ने सिर्फ चुनावी प्रचार नहीं किया, बल्कि पिछले डेढ़-दो वर्षों में गांव-गांव तक संगठन फैलाया। पुरुलिया से सुंदरबन तक पार्टी ने सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों को राजनीतिक हथियार बनाया। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस सत्ता के भरोसे चुनाव लड़ती रही। विपक्ष ने बूथ स्तर की तैयारी, मतदाता सूची और चुनावी मशीनरी को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई।

लेख में लगाए गए आरोप—जैसे मतदाता सूची से नाम हटाना, बड़े पैमाने पर केंद्रीय बलों की तैनाती और चुनाव आयोग की भूमिका—विपक्ष के एक बड़े नैरेटिव को सामने रखते हैं। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर विपक्ष को इतना बड़ा खतरा दिख रहा था, तो उसने देशव्यापी आंदोलन क्यों नहीं किया? सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पोस्ट से राजनीतिक लड़ाई नहीं जीती जाती।

बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसका निरंतर चुनावी मोड में रहना है। पार्टी चुनाव खत्म होने के अगले दिन से अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है। वहीं विपक्ष चुनाव के समय अचानक सक्रिय होता है। यही कारण है कि बीजेपी का कैडर गांवों तक पहुंचता है, जबकि विपक्ष का बड़ा हिस्सा टीवी स्टूडियो और दिल्ली की राजनीति तक सीमित रह जाता है।

उत्तर प्रदेश को लेकर भी यही चेतावनी दी जा रही है। समाजवादी पार्टी को लगता है कि उसका PDA समीकरण उसे सुरक्षित रखेगा, लेकिन बीजेपी लगातार सामाजिक समीकरणों में सेंध लगाने में जुटी है। अगर विपक्ष इसी तरह आत्मसंतुष्ट रहा, तो 2027 में यूपी की लड़ाई भी एकतरफा हो सकती है।

तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में भी विपक्षी दल अपने-अपने क्षेत्रीय अहंकार में उलझे दिखाई देते हैं। DMK हो या कांग्रेस, सब अपने-अपने राजनीतिक दायरे में सीमित हैं। राष्ट्रीय स्तर पर साझा संघर्ष की भावना लगभग गायब हो चुकी है। बीजेपी इसी कमजोरी का फायदा उठा रही है।

हालांकि विपक्ष के लिए मौके पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, उद्योगों में कथित कॉरपोरेट पक्षपात और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता जैसे मुद्दे आज भी जनता के बीच मौजूद हैं। V-Dem Institute की रिपोर्ट में भारत को “Electoral Autocracy” कहे जाने पर भी विपक्ष कोई बड़ा राष्ट्रीय अभियान खड़ा नहीं कर पाया।

असल समस्या यह है कि विपक्ष अभी भी बीजेपी को केवल एक राजनीतिक दल समझकर लड़ रहा है, जबकि बीजेपी एक विशाल वैचारिक, सामाजिक और संगठनात्मक ढांचे के रूप में काम कर रही है। उसके पास जमीनी कैडर, नैरेटिव निर्माण, डिजिटल प्रचार और संस्थागत नेटवर्क का ऐसा संयोजन है, जिसका मुकाबला बिखरे हुए विपक्ष के लिए आसान नहीं।

भारतीय राजनीति अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां सिर्फ सरकार विरोधी भावना से चुनाव नहीं जीते जा सकते। विपक्ष को साझा रणनीति, जमीनी आंदोलन और लगातार राजनीतिक संघर्ष की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भारतीय राजनीति में बीजेपी का प्रभुत्व और मजबूत होता जाएगा। हालात यही संकेत दे रहे हैं कि बीजेपी लगातार आगे बढ़ रही है और विपक्ष अब भी यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे लड़ाई कहां और कैसे लड़नी है।

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