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बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन और भारत के लिए खतरे की घंटी: UAE के OPEC छोड़ने के क्या मायने?

ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | 10 मई 2026

दुनिया की शक्ति राजनीति तेजी से बदल रही है। कभी पश्चिम एशिया की ऊर्जा व्यवस्था पर पूरी पकड़ रखने वाला अमेरिका आज खुद नए संकटों में घिरा दिखाई दे रहा है। ईरान युद्ध ने सिर्फ सैन्य समीकरण नहीं बदले, बल्कि वैश्विक तेल बाजार, डॉलर व्यवस्था और OPEC की ताकत को भी झकझोर दिया है। इसी बीच संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE का OPEC छोड़ने का फैसला एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

दशकों तक OPEC दुनिया के तेल बाजार का सबसे ताकतवर संगठन रहा। 1960 में बना यह संगठन तेल उत्पादन नियंत्रित करके कीमतों को प्रभावित करता था। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अमेरिका खुद दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन चुका है। ब्राजील और अन्य देश भी उत्पादन बढ़ा रहे हैं। ऊपर से ईरान युद्ध और होर्मुज संकट ने खाड़ी की राजनीति को नई दिशा दे दी है।

UAE का OPEC छोड़ना सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि रणनीतिक संकेत भी है। अबू धाबी लंबे समय से ज्यादा तेल उत्पादन करना चाहता था, लेकिन सऊदी अरब OPEC के जरिए उत्पादन सीमित रखकर तेल की कीमतें ऊंची बनाए रखना चाहता था। ईरान युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच मतभेद और खुलकर सामने आ गए।

दरअसल UAE अब खुद को केवल सऊदी नेतृत्व वाली तेल राजनीति तक सीमित नहीं रखना चाहता। वह अमेरिका, चीन और वैश्विक बाजार के साथ ज्यादा स्वतंत्र तरीके से तेल व्यापार करना चाहता है। खास बात यह भी है कि UAE उन देशों में शामिल है जो भविष्य में डॉलर के बजाय दूसरी मुद्राओं, खासकर चीनी Yuan, में तेल व्यापार के विकल्प तलाश रहे हैं।

यह अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती है। दशकों तक “Petrodollar System” अमेरिकी ताकत की रीढ़ रहा। तेल खरीदने-बेचने के लिए दुनिया को डॉलर की जरूरत पड़ती थी, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी लाभ मिलता था। लेकिन अब अगर खाड़ी देश धीरे-धीरे डॉलर से दूरी बनाते हैं, तो वैश्विक आर्थिक संतुलन बदल सकता है।

भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। भारत अपनी लगभग 85 प्रतिशत तेल जरूरत आयात करता है। ऐसे में तेल कीमतों में हर उछाल सीधे आम आदमी की जेब पर असर डालता है। पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, परिवहन लागत बढ़ती है, खाद और बिजली महंगी होती है और महंगाई बढ़ जाती है।

ईरान युद्ध और होर्मुज संकट के बीच Brent crude पहले ही 110 डॉलर प्रति बैरल पार कर चुका है। अब UAE के OPEC से बाहर जाने से बाजार में और अनिश्चितता बढ़ सकती है। क्योंकि OPEC की पकड़ कमजोर होने का मतलब है कि तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव ज्यादा होगा।

हालांकि दूसरी तरफ कुछ संभावित फायदे भी हैं। UAE दुनिया के सबसे कम लागत वाले तेल उत्पादकों में है। अगर वह OPEC की पाबंदियों से बाहर निकलकर ज्यादा तेल बेचता है, तो भविष्य में सप्लाई बढ़ सकती है और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। भारत जैसे देशों को इससे राहत मिल सकती है।

फुजैराह पोर्ट भी भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम है। यह ऐसा मार्ग है जहां से कुछ तेल सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट को बायपास करके भेजी जा सकती है। अगर होर्मुज में तनाव बढ़ता है, तो यह विकल्प भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

लेकिन फिलहाल राहत की उम्मीद जल्द नहीं दिखती। युद्ध, जहाजों पर हमले, बढ़ती इंश्योरेंस लागत और समुद्री मार्गों की असुरक्षा ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को तनाव में डाल दिया है। अमेरिका अब केवल मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ बढ़ते अमेरिकी रक्षा संबंध इसी रणनीति का हिस्सा हैं।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस बदलते वैश्विक ऊर्जा और शक्ति संतुलन में अपनी रणनीतिक स्थिति कैसे मजबूत करे। केवल तेल खरीदना अब पर्याप्त नहीं होगा। भारत को ऊर्जा सुरक्षा, वैकल्पिक सप्लाई मार्ग, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और बहुध्रुवीय कूटनीति—इन सब पर एक साथ काम करना होगा।

दुनिया एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहां युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि तेल, डॉलर, समुद्री रास्तों और आर्थिक नियंत्रण पर भी लड़े जा रहे हैं। UAE का OPEC छोड़ना इसी बड़े बदलाव का संकेत है। सवाल अब यह नहीं कि दुनिया बदल रही है या नहीं, बल्कि यह है कि भारत इस बदलती दुनिया के लिए कितना तैयार है।

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