कानून | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 जुलाई 2026
गंगा में नाव पर बैठकर चिकन बिरयानी खाना क्या अपराध है? अगर नहीं, तो इसके लिए युवाओं को गिरफ्तार कर जेल भेजने का आधार क्या था? सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी ने एक सामान्य दिखने वाले मामले के जरिए पुलिस कार्रवाई, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून के शासन पर असहज करने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं। जस्टिस भुइयां ने मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए साफ कहा कि गंगा में चिकन खाने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है और चिकन बिरयानी खाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। उनकी टिप्पणी का अर्थ बेहद गंभीर है—अगर कानून किसी काम को अपराध घोषित नहीं करता तो महज सामाजिक या धार्मिक आपत्ति के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता कैसे छीनी जा सकती है?
मामला वाराणसी का बताया गया है, जहां गंगा में नाव पर इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाने को लेकर मुस्लिम युवाओं के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई थी। विवाद बढ़ा और मामला गिरफ्तारी तक पहुंच गया। अब सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश ने सार्वजनिक मंच से इस प्रकरण को नागरिक स्वतंत्रता के संदर्भ में उठाया है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उन युवाओं ने क्या खाया। ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी नागरिक को गिरफ्तार करने के लिए कानून में अपराध होना जरूरी है या भीड़ की नाराजगी और किसी वर्ग की भावनाएं ही पर्याप्त हो जाएंगी?
भारत संविधान से चलता है। संविधान नागरिक की थाली तय नहीं करता और पुलिस को भी यह अधिकार नहीं देता कि वह बिना वैधानिक आधार के किसी की व्यक्तिगत पसंद को अपराध में बदल दे। धार्मिक आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन आस्था और आपराधिक कानून के बीच की सीमा भी उतनी ही स्पष्ट रहनी चाहिए। किसी कार्य से असहमति होना अलग बात है और उसका अपराध होना बिल्कुल अलग। यदि उस सीमा को मिटा दिया गया तो कल किसी की पोशाक, किसी की भाषा, किसी की किताब और किसी के भोजन को लेकर भी गिरफ्तारी का रास्ता खुल सकता है।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बात केवल चिकन बिरयानी तक सीमित नहीं रखी। उन्होंने असहमति, शांतिपूर्ण विरोध और नागरिक स्वतंत्रताओं के सवाल भी उठाए। लोकतंत्र की असली परीक्षा उस आवाज के साथ होती है जिससे सत्ता, प्रशासन या बहुसंख्यक समाज सहमत नहीं है। लोकप्रिय विचार को संरक्षण की जरूरत कम पड़ती है; संवैधानिक संरक्षण की असली जरूरत उस व्यक्ति को होती है जिसका विचार, जीवनशैली या चुनाव दूसरों को पसंद नहीं है—बशर्ते वह कानून न तोड़ रहा हो।
यहीं पुलिस और न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी सबसे बड़ी हो जाती है। गिरफ्तारी स्वयं सजा नहीं हो सकती। किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना उसकी स्वतंत्रता पर राज्य का सबसे कठोर हस्तक्षेप है। इसलिए पुलिस की शक्ति जितनी बड़ी है, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। यदि किसी मामले में वास्तविक अपराध हुआ है तो कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए; लेकिन यदि कार्रवाई का आधार ही अस्पष्ट हो, तो प्रश्न पुलिस से भी पूछा जाएगा और उस व्यवस्था से भी जो ऐसी कार्रवाई को संभव बनाती है।
इस मामले का सांप्रदायिक पहलू इसे और संवेदनशील बनाता है। गिरफ्तार किए गए युवाओं की मुस्लिम पहचान को लेकर मामला चर्चा में आया। इसलिए प्रशासन पर यह अतिरिक्त जिम्मेदारी थी कि उसकी कार्रवाई कानून की कसौटी पर इतनी स्पष्ट हो कि धार्मिक भेदभाव का कोई संदेह पैदा न हो। कानून की आंखों पर पट्टी इसलिए बांधी गई है कि उसे नागरिक का धर्म नहीं, उसका कृत्य दिखाई दे। यदि एक ही व्यवहार को करने वाले दो नागरिकों के साथ उनकी पहचान के कारण अलग व्यवहार होने लगे, तो समानता का संवैधानिक सिद्धांत खोखला हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी पुलिस और प्रशासन के लिए एक चेतावनी की तरह भी पढ़ी जानी चाहिए। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर हर विवाद को आपराधिक मुकदमे और गिरफ्तारी में बदल देना आसान प्रशासन हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह न्यायपूर्ण प्रशासन भी हो। कई बार पुलिस को भीड़ की मांग के सामने खड़े होकर कहना पड़ता है—जो आपको पसंद नहीं, वह जरूरी नहीं कि गैरकानूनी भी हो। यही कानून के शासन और भीड़ के शासन के बीच का फर्क है।
इस पूरे विवाद ने अंततः एक बेहद सीधा प्रश्न हमारे सामने रख दिया है—अगर गंगा में चिकन खाने पर कोई कानून रोक नहीं लगाता, तो गिरफ्तारी किस कानून की रक्षा के लिए हुई? इस सवाल का जवाब इसलिए जरूरी है क्योंकि मामला केवल कुछ मुस्लिम युवाओं का नहीं है। मामला उस संवैधानिक सुरक्षा का है जिसके भरोसे हर भारतीय नागरिक यह मानता है कि राज्य उसकी स्वतंत्रता तभी छीन सकता है जब उसने कानून तोड़ा हो।
आज सवाल चिकन बिरयानी का है; कल सवाल किसी और नागरिक की पसंद का हो सकता है। लोकतंत्र में सरकार की ताकत इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितने लोगों को गिरफ्तार कर सकती है, बल्कि इससे मापी जाती है कि कानून तोड़े बिना जी रहे नागरिक की स्वतंत्रता की वह कितनी मजबूती से रक्षा करती है।




