राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली। चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का गुस्सा मंगलवार को दिल्ली की सड़कों पर फूट पड़ा। संसद से चुनाव आयोग मुख्यालय तक निकला INDIA bloc का मार्च पुलिस बैरिकेडिंग से टकराया। कई विपक्षी सांसदों को हिरासत में लिया गया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा समेत विपक्ष के कई नेता आकाशवाणी भवन परिसर में जा बैठे और वहीं से चुनाव आयोग को सीधी चुनौती दे दी। संदेश साफ था—सवालों का जवाब चाहिए, चुनाव आयुक्तों से मुलाकात चाहिए और जब तक बात नहीं होगी, विपक्ष पीछे नहीं हटेगा।
यह महज एक मार्च नहीं था। SIR यानी Special Intensive Revision, मतदाता सूचियों और Form-6 में कथित बदलावों को लेकर विपक्ष ने चुनाव आयोग पर अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक दबाव बनाया। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और नामों को हटाए जाने की प्रक्रिया से करोड़ों नागरिकों के मतदान अधिकार पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी को लेकर करीब 237 विपक्षी सांसद संसद से चुनाव आयोग की ओर निकले। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बीजेडी समेत कई दलों के नेता इस मार्च में शामिल हुए। कुछ विपक्षी दलों की गैरमौजूदगी के बावजूद प्रदर्शन ने राजधानी की राजनीति को पूरी तरह गर्म कर दिया।
संसद मार्ग से आगे बढ़ते ही विपक्षी सांसदों का रास्ता रोक दिया गया। विजय चौक, रायसीना रोड, संसद मार्ग और आकाशवाणी भवन के आसपास भारी पुलिस बल और RAF की तैनाती थी। कई स्तरों पर बैरिकेड लगाए गए थे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की गतिविधियों को रिकॉर्ड करने के लिए बॉडी कैमरों का भी इस्तेमाल किया। जैसे ही सांसदों ने आगे बढ़ने की कोशिश की, नारेबाजी तेज हो गई। राहुल गांधी और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी बैरिकेड पर चढ़ गए। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की और कई सांसदों को हिरासत में लेकर बसों में बैठा दिया।
हिरासत में लिए गए नेताओं में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, टीएमसी के अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी और डेरेक ओ’ब्रायन समेत कई विपक्षी सांसद शामिल रहे। लेकिन पुलिस की कार्रवाई से आंदोलन थमा नहीं, बल्कि और भड़क गया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कांग्रेस के कई नेता आकाशवाणी भवन परिसर में पहुंच गए। पवन खेड़ा, चरणजीत सिंह चन्नी और दीपेंद्र हुड्डा समेत अन्य नेता भी वहां डटे रहे। बाद में टीएमसी के डेरेक ओ’ब्रायन और महुआ मोइत्रा भी वहां पहुंच गए। आकाशवाणी भवन देखते ही देखते विपक्ष के धरने का नया राजनीतिक केंद्र बन गया।
यहीं से राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और सरकार पर सबसे तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि विपक्ष यहां किसी टकराव के लिए नहीं आया है। “हम सिर्फ चुनाव आयुक्तों से मिलना चाहते हैं।” राहुल का सवाल था कि जब विपक्षी सांसद करोड़ों मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उन्हें चुनाव आयोग के सामने अपनी बात रखने से क्यों रोका जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग विपक्ष से बात नहीं करना चाहता। राहुल ने कहा कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को देश की चुनावी संस्था से सवाल पूछने का अधिकार है और इस अधिकार को दबाया नहीं जा सकता।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, RSS प्रमुख मोहन भागवत और CEC ज्ञानेश कुमार पर भी गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए। उन्होंने कथित “वोट चोरी” के जरिए चुनावों को प्रभावित करने का आरोप लगाया और कहा कि विपक्ष लोकतंत्र बचाने के लिए लड़ रहा है। ये राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। लेकिन उनके बयानों ने यह साफ कर दिया कि विपक्ष अब इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं है।
धरने के दौरान राहुल गांधी ने पुलिस को भी सीधे घेरा। उन्होंने सवाल किया—“मैं बैठूं तो कहां बैठूं?” राहुल के मुताबिक, पहले उन्हें एक स्थान से हटाया गया और अब आकाशवाणी भवन में बैठने पर भी आपत्ति की जा रही है। उन्होंने पुलिस से कहा कि यदि यहां बैठना गलत है तो उन्हें कोई ऐसी जगह बता दी जाए जहां वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकें। उन्होंने भारत गेट, जंतर-मंतर और सड़क पर बैठने तक का विकल्प गिनाया। उनका कहना था कि जगह बता दीजिए, विपक्ष वहां बैठ जाएगा। बाद में राहुल ने साफ कर दिया कि जरूरत पड़ी तो सांसद लंबे समय तक वहीं बैठे रहेंगे।
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी विपक्ष का रुख स्पष्ट कर दिया। उनका कहना था कि विपक्ष आकाशवाणी भवन से तब तक नहीं जाएगा जब तक ज्ञानेश कुमार से मुलाकात नहीं होती। यानी अब विवाद सिर्फ मार्च रोकने या हिरासत तक सीमित नहीं है। विपक्ष ने इसे CEC की जवाबदेही और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता की लड़ाई का रूप दे दिया है।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने विपक्ष के दावे को चुनौती देते हुए कहा कि उसे किसी राजनीतिक दल से बैठक के लिए कोई औपचारिक अनुरोध प्राप्त नहीं हुआ। यहीं से विवाद और उलझ गया। विपक्ष का कहना है कि वह चुनाव आयुक्तों से मिलने के लिए खुद चुनाव आयोग तक पहुंचा, जबकि आयोग का कहना है कि औपचारिक बैठक का अनुरोध नहीं मिला। सवाल अब यह है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद की पहल कौन करेगा और क्या इस टकराव का रास्ता बातचीत से निकलेगा।
बीजेपी ने विपक्ष के आंदोलन को खारिज करते हुए राहुल गांधी पर राजनीतिक ड्रामा करने का आरोप लगाया। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस से प्रदर्शन खत्म करने और संवैधानिक संस्थाओं को निशाना नहीं बनाने की अपील की। बीजेपी नेताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने Form-6 को अवैध घोषित नहीं किया है और विपक्ष अदालत की टिप्पणियों को राजनीतिक हथियार बना रहा है। सत्ता पक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उस पर राजनीतिक दबाव डालना लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करेगा।
लेकिन विपक्ष Form-6 और SIR के मुद्दे से पीछे हटने को तैयार नहीं है। उसका कहना है कि यदि चुनाव आयोग की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो सवालों के जवाब देने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। विपक्ष ने मतदाता सूची में कथित बदलावों, नाम हटाए जाने की प्रक्रिया और Form-6 से जुड़े सवालों पर जवाबदेही तय करने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों के बाद इस मुद्दे को विपक्ष ने और आक्रामक तरीके से उठाया है।
इस राजनीतिक घमासान का असर दिल्ली की सड़कों पर भी पड़ा। संसद मार्ग, कनॉट प्लेस, पटेल चौक, अशोका रोड, रफी मार्ग और जंतर-मंतर रोड समेत कई इलाकों में यातायात प्रभावित रहा। भारी बैरिकेडिंग और सुरक्षा व्यवस्था के कारण कई मार्गों पर लंबा जाम लगा। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस को लोगों से प्रभावित रास्तों से बचने और मेट्रो का इस्तेमाल करने की अपील करनी पड़ी।
अब यह लड़ाई दिल्ली तक सीमित नहीं दिख रही। कर्नाटक, तेलंगाना समेत कई राज्यों में विपक्षी दलों ने CEC के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किए। बीजेडी ने भी अपने नेताओं को दिल्ली भेजकर विपक्षी आंदोलन में भागीदारी की। छात्र संगठनों और Cockroach Janta Party ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। CJP ने अपने कार्यकर्ताओं को पुलिस नोटिस दिए जाने और प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने के दबाव का आरोप लगाया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
मंगलवार की सबसे बड़ी राजनीतिक तस्वीर यही रही—संसद से निकला विपक्ष चुनाव आयोग के दरवाजे तक पहुंचा, रास्ते में रोका गया, हिरासत में लिया गया और फिर आकाशवाणी भवन में धरने पर बैठ गया। विपक्ष इसे लोकतंत्र और वोट के अधिकार की लड़ाई बता रहा है, जबकि बीजेपी इसे संवैधानिक संस्थाओं पर राजनीतिक हमला कह रही है। चुनाव आयोग अपने स्तर पर औपचारिक बैठक के अनुरोध से इनकार कर रहा है। लेकिन राजनीतिक टकराव लगातार बढ़ रहा है।
चुनाव केवल मतदान की तारीख और नतीजे का नाम नहीं है। मतदाता सूची से लेकर वोट की गिनती तक पूरी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा लोकतंत्र की असली ताकत है। इसलिए SIR और Form-6 को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान नारेबाजी से नहीं, दस्तावेज, तथ्य और पारदर्शी जवाब से होना चाहिए। आरोप गलत हैं तो उन्हें तथ्य के साथ खारिज किया जाए; प्रक्रिया में खामी है तो उसे सुधारा जाए। यही चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता बचाने का रास्ता है।
फिलहाल विपक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं, बीजेपी आरोपों को खारिज कर रही है और चुनाव आयोग पर जवाब देने का राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा है। दिल्ली में मंगलवार को जो हुआ, वह केवल एक दिन का विरोध प्रदर्शन नहीं था। यह आने वाले दिनों के बड़े राजनीतिक संघर्ष का संकेत है। अब देखना यह है कि यह टकराव बातचीत की मेज तक पहुंचता है या ‘वोट चोरी’ के आरोपों के साथ दिल्ली की सड़कों पर संघर्ष का अगला दौर और ज्यादा तीखा होता है।



