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बीजेपी के गढ़ बांकीपुर में प्रशांत किशोर की बड़ी सेंध, जन सुराज ने रचा इतिहास

18,953 वोटों से बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को हराया; तीन दशक से बीजेपी के कब्जे वाली सीट पर जन सुराज की पहली चुनावी जीत, कम मतदान के बावजूद प्रशांत किशोर ने बदला राजनीतिक समीकरण

राजनीति/ राष्ट्रीय/ बिहार | ABC NATIONAL NEWS | पटना | 3 अगस्त 2026

बिहार की राजनीति में सोमवार को एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला। चुनावी रणनीतिकार से सक्रिय राजनेता बने प्रशांत किशोर ने पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जीत दर्ज कर बीजेपी के करीब तीन दशक पुराने गढ़ में सेंध लगा दी। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी के नीरज कुमार सिन्हा को 18,953 वोटों से हराया। 31 दौर की मतगणना के बाद उनकी जीत ने जन सुराज को अपनी पहली चुनावी सफलता भी दिला दी।

बांकीपुर का परिणाम सामान्य उपचुनाव का नतीजा भर नहीं है। यह सीट 1995 से बीजेपी और उसके राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में रही थी। मौजूदा बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के गठन के बाद भी बीजेपी का दबदबा कायम रहा और नितिन नबीन लगातार यहां से चुनाव जीतते रहे। 2026 का उपचुनाव नितिन नबीन के अप्रैल में राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद कराया गया था।

पहला कारण: बीजेपी का तीन दशक पुराना किला

इस जीत को बड़ा बनाने वाला सबसे महत्वपूर्ण तथ्य बांकीपुर का राजनीतिक इतिहास है। पटना की यह शहरी सीट लंबे समय से बीजेपी की सुरक्षित सीटों में गिनी जाती रही है। पिछले चुनावों में यहां बीजेपी को मजबूत समर्थन मिलता रहा। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में किसी नई पार्टी के नेता का उतरना और पहले ही प्रयास में बीजेपी को लगभग 19 हजार मतों से हराना जन सुराज के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है।

प्रशांत किशोर ने परिणाम के दौरान दावा किया कि “30 साल का गढ़ 30 दिनों में गिर गया।” चुनाव परिणाम ने कम-से-कम बांकीपुर के स्तर पर उनके इस आक्रामक चुनाव अभियान को मजबूती दी है।

दूसरा कारण: उम्मीदवार बदलने से बीजेपी की रणनीति पर असर

उपचुनाव से पहले बीजेपी को अप्रत्याशित स्थिति का सामना करना पड़ा था। प्रशांत किशोर के खिलाफ पहले उम्मीदवार बनाए गए अभिषेक कुमार सिन्हा ने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए चुनाव मैदान से हटने की घोषणा कर दी। इसके बाद बीजेपी को उम्मीदवार बदलना पड़ा। चुनाव के इतने करीब प्रत्याशी बदलने से संगठन और प्रचार अभियान की निरंतरता प्रभावित होना स्वाभाविक था।

आखिरकार बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा पर दांव लगाया, लेकिन वह प्रशांत किशोर को रोक नहीं सके।

तीसरा कारण: प्रशांत किशोर खुद बने चुनाव का केंद्रीय चेहरा

प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर चुनाव केवल एक सीट जीतने की लड़ाई नहीं था। वर्षों तक अलग-अलग राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति बनाने के बाद यह उनका अपना चुनावी पदार्पण था। इसलिए मुकाबला स्थानीय उम्मीदवारों से आगे बढ़कर प्रशांत किशोर की राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया।

उनकी व्यक्तिगत पहचान, लगातार जनसंपर्क और जन सुराज के नए राजनीतिक विकल्प के संदेश ने चुनाव को PK बनाम बीजेपी के सीधे राजनीतिक मुकाबले का रूप देने में मदद की। NDTV ने भी इसे प्रशांत किशोर का प्रभावशाली चुनावी पदार्पण बताया।

चौथा कारण: कम मतदान में समर्थकों को बूथ तक पहुंचाना

बांकीपुर उपचुनाव में मतदान प्रतिशत महज 34.24% रहा, जो पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में सात प्रतिशत से अधिक कम था। कुल 26 उम्मीदवार मैदान में थे।

कम मतदान वाले चुनावों में मजबूत बूथ प्रबंधन और अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाना निर्णायक साबित हो सकता है। ऐसे माहौल में प्रशांत किशोर का करीब 19 हजार वोटों से जीतना बताता है कि जन सुराज अपने समर्थक मतदाताओं को प्रभावी ढंग से संगठित करने में सफल रही।

पांचवां कारण: तीसरे विकल्प के लिए राजनीतिक जगह

बांकीपुर में बीजेपी के अलावा आरजेडी भी मैदान में थी। मतगणना के 21वें दौर तक ही तस्वीर काफी साफ हो चुकी थी—उस समय प्रशांत किशोर को 42,169 वोट, बीजेपी उम्मीदवार को 30,276 और आरजेडी उम्मीदवार को 10,309 वोट मिले थे। इससे स्पष्ट था कि मुख्य मुकाबला जन सुराज और बीजेपी के बीच सिमट चुका था।

इसने प्रशांत किशोर को उस मतदाता वर्ग को अपने पक्ष में जोड़ने का अवसर दिया जो बीजेपी से अलग विकल्प चाहता था, लेकिन परंपरागत विपक्ष के साथ जाना नहीं चाहता था।

जन सुराज की पहली जीत, लेकिन असली परीक्षा आगे

बांकीपुर की जीत ने प्रशांत किशोर को विधायक बनाने के साथ जन सुराज को उसकी पहली चुनावी जीत दिलाई है। बीजेपी के तीन दशक पुराने गढ़ का टूटना निश्चित रूप से बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बनेगा।

लेकिन एक उपचुनाव के परिणाम को पूरे बिहार के राजनीतिक रुझान का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। पटना की शहरी बांकीपुर सीट की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां बिहार के ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्रों से अलग हैं। असली परीक्षा यह होगी कि प्रशांत किशोर बांकीपुर की इस जीत को संगठनात्मक विस्तार और दूसरे क्षेत्रों में वोटों में बदल पाते हैं या नहीं।

फिलहाल इतना साफ है कि बांकीपुर ने जन सुराज को वह चीज दे दी है जिसकी किसी नई राजनीतिक पार्टी को सबसे ज्यादा जरूरत होती है—पहली बड़ी चुनावी जीत और यह संदेश कि स्थापित राजनीतिक गढ़ भी चुनौती से परे नहीं हैं।

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