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“कॉकरोच जनता पार्टी” पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, डिजिटल आंदोलन से बढ़ी सियासी बेचैनी

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 मई 2026

सोशल मीडिया पर युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP) अब देश की सबसे चर्चित डिजिटल राजनीतिक बहस बनती जा रही है। इस विवाद ने रविवार को नया मोड़ तब ले लिया जब सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर CJP के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और CBI जांच की मांग की गई।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम से चलाए जा रहे अभियान ने सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों का “गलत और व्यावसायिक इस्तेमाल” किया है। साथ ही कुछ कथित फर्जी वकीलों और डिजिटल नेटवर्क के जरिए लोगों को प्रभावित करने का आरोप भी लगाया गया है। याचिकाकर्ता ने मामले की निष्पक्ष जांच के लिए CBI जांच की मांग की है।

दरअसल, यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब मुख्य न्यायाधीश की एक कथित टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर “कॉकरोच” शब्द को लेकर मीम्स और व्यंग्यात्मक पोस्ट वायरल होने लगे। इसके बाद राजनीतिक कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट अभिजीत डिपके ने “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम से ऑनलाइन अभियान शुरू किया। देखते ही देखते यह आंदोलन बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों, महंगाई और युवाओं की नाराजगी का प्रतीक बन गया।

CJP खुद को “बेरोजगार और व्यवस्था से निराश युवाओं की आवाज” बताती है। खासकर NEET-UG पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार संकट जैसे मुद्दों पर इसके व्यंग्यात्मक पोस्ट सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुंचे। यही वजह है कि यह अभियान Gen-Z और मिलेनियल्स के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ।

हालांकि, अब इस पूरे अभियान पर कानूनी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि न्यायपालिका की टिप्पणियों को डिजिटल लामबंदी, प्रचार और राजनीतिक ब्रांडिंग के लिए इस्तेमाल करना “संवैधानिक प्रक्रियाओं का खतरनाक वस्तुकरण” है।

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इस बीच CJP के समर्थक इसे युवाओं की रचनात्मक लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर युवा मीम्स और व्यंग्य के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, तो क्या उसे दबाने की कोशिश लोकतांत्रिक आवाजों को कमजोर करने जैसा नहीं होगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ एक ऑनलाइन ट्रेंड नहीं, बल्कि बदलती डिजिटल राजनीति का संकेत है। आने वाले समय में “मीम पॉलिटिक्स”, सोशल मीडिया एक्टिविज्म और संस्थागत नियंत्रण के बीच टकराव और तेज हो सकता है।

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