राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 अगस्त 2026
सोनिया की किताब ने मचा दिया सियासी भूचाल
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित संस्मरण पुस्तक ‘Belonging: A Journey of Love’ रिलीज से पहले ही राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में इस किताब के प्रकाशन को लेकर सोनिया गांधी और पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के बीच ऐसे मतभेद पैदा हुए कि प्रकाशन समझौता ही आगे नहीं बढ़ सका। आरोप है कि किताब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारत-चीन सीमा से जुड़े जिन हिस्सों को शामिल किया गया था, उनमें बदलाव या कटौती की मांग की गई। सोनिया गांधी ने कथित तौर पर इन हिस्सों को हटाने या अपनी कहानी को बदलने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि जिस किताब को भारत में पेंगुइन के जरिए पाठकों तक पहुंचना था, उसकी डील खत्म हो गई। हालांकि पेंगुइन ने इस पूरे घटनाक्रम की अलग व्याख्या करते हुए कहा है कि तथ्य-जांच और संपादकीय सुझाव प्रकाशन प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और वह पुस्तक प्रकाशित करने को इच्छुक था।
सोनिया का कथित संदेश—मेरी कहानी है, तो मेरी शर्तों पर होगी
मामले से परिचित सूत्रों के अनुसार, सोनिया गांधी का रुख बिल्कुल स्पष्ट था कि संस्मरण उनकी जिंदगी, उनके अनुभवों और उनके राजनीतिक सफर की कहानी है। इसलिए उसमें लिखी गई बातों को केवल इसलिए हटाया या बदला नहीं जा सकता क्योंकि वे किसी शक्तिशाली राजनीतिक व्यक्ति, संगठन या संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दे से जुड़ी हैं। बताया गया है कि पुस्तक में सोनिया गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन के दौरान नरेंद्र मोदी के साथ हुई मुलाकातों और उनसे जुड़े अनुभवों को भी जगह दी है। उनके एक सहयोगी के मुताबिक, इन अंशों को लेकर प्रकाशक की ओर से सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट में यह भी दावा है कि किताब में 2004 में गुजरात की एक चुनावी सभा के दौरान नरेंद्र मोदी द्वारा सोनिया गांधी को कथित तौर पर “जर्सी गाय” कहे जाने का उल्लेख किया गया है। हालांकि पुस्तक अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, इसलिए इसके पूरे पाठ और संदर्भों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल संभव नहीं है।
मोदी पर लिखे हिस्से बने सबसे बड़ा टकराव
सोनिया गांधी का राजनीतिक जीवन भारत की राजनीति के कई बड़े दौर का गवाह रहा है। ऐसे में उनके संस्मरण में नरेंद्र मोदी के साथ उनके राजनीतिक संबंधों, मुलाकातों और मतभेदों का उल्लेख होना स्वाभाविक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार, सोनिया गांधी ने मोदी की तुलना दूसरे प्रधानमंत्रियों से भी की है और कुछ राजनीतिक घटनाओं पर अपना व्यक्तिगत दृष्टिकोण दर्ज किया है। यही वे हिस्से बताए जा रहे हैं जिन पर प्रकाशक की ओर से आपत्ति जताई गई। सवाल यह है कि किसी पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और लंबे समय तक भारतीय राजनीति के केंद्र में रही नेता की अपनी राजनीतिक स्मृतियों को कितना बदला जा सकता है? यही सवाल अब इस विवाद को सिर्फ एक प्रकाशन विवाद नहीं, बल्कि राजनीतिक अभिव्यक्ति और संपादकीय स्वतंत्रता की बहस में बदल रहा है।
RSS का जिक्र भी बना विवाद की वजह
रिपोर्ट के मुताबिक, पुस्तक में RSS से जुड़े संदर्भों को लेकर भी प्रकाशक की ओर से आपत्ति जताई गई थी। हालांकि इन हिस्सों में सोनिया गांधी ने वास्तव में क्या लिखा है, इसकी पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि फिलहाल सामने आई जानकारी मुख्य रूप से सूत्रों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। लेकिन इतना जरूर है कि RSS का नाम भारतीय राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील राजनीतिक संदर्भ रखता है। सोनिया गांधी की नजर से इस संगठन और उसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर पुस्तक में क्या लिखा गया है, यह किताब के सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा। अगर रिपोर्टों में बताए गए अंश वास्तव में पुस्तक का हिस्सा हैं, तो उनके सार्वजनिक होने के बाद राजनीतिक बहस और तेज होने की पूरी संभावना है।
चीन और सीमा विवाद पर भी कथित तौर पर तीखे सवाल
विवाद का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा भारत-चीन संबंधों और सीमा पर चीनी गतिविधियों से जुड़ा बताया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, सोनिया गांधी ने वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC और भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ से जुड़े मुद्दों पर भी अपने अनुभव और राजनीतिक विचार लिखे हैं। कांग्रेस लंबे समय से केंद्र सरकार से चीन के साथ सीमा विवाद और वहां की स्थिति को लेकर अधिक पारदर्शिता की मांग करती रही है। ऐसे में सोनिया गांधी की पुस्तक में इस विषय को जगह मिलना राजनीतिक रूप से खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कथित तौर पर पेंगुइन की ओर से इन अंशों को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। हालांकि चीन से संबंधित पुस्तक के वास्तविक अंश अभी सार्वजनिक नहीं हैं और उनके प्रकाशित होने के बाद ही उनके संदर्भ और भाषा का सही आकलन किया जा सकेगा।
पेंगुइन का बचाव—हम सच से नहीं डरे, यह सामान्य संपादकीय प्रक्रिया है
दूसरी तरफ पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने उन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है कि सोनिया गांधी के बदलाव से इनकार करने के कारण उसने पुस्तक प्रकाशित करने से कदम पीछे खींचे। प्रकाशक का कहना है कि किसी भी पुस्तक को प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की जांच करना, संदिग्ध दावों की पुष्टि करना और लेखक को संपादकीय सुझाव देना उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। पेंगुइन ने यह भी कहा कि पूरी बातचीत के दौरान वह पुस्तक प्रकाशित करने के लिए इच्छुक और उत्सुक था। यानी कहानी का दूसरा पक्ष यह है कि प्रकाशक इसे किसी राजनीतिक दबाव या सच से डरने का मामला नहीं, बल्कि सामान्य संपादकीय प्रक्रिया बता रहा है। लेकिन विवाद इसलिए गंभीर है क्योंकि दूसरी तरफ सोनिया गांधी के करीबी सूत्र दावा कर रहे हैं कि कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों को हटाने की मांग ही डील टूटने की वजह बनी।
कांग्रेस का पलटवार—अगर बाहर छप सकती है तो भारत में क्यों नहीं?
पेंगुइन के बयान के बाद कांग्रेस ने भी तीखा पलटवार किया। कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया कि यदि दुनिया के दूसरे हिस्सों में यही पुस्तक प्रकाशित की जा रही है, तो भारत में इसके प्रकाशन को लेकर इतनी आपत्ति क्यों है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने पेंगुइन की स्थिति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि प्रकाशक पहले RSS और भाजपा से जुड़े विषयों पर किताबें प्रकाशित करता रहा है, लेकिन सोनिया गांधी की किताब के मामले में अलग रवैया दिखाई दे रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि पुस्तक के भारत में आने से कुछ लोगों को राजनीतिक असहजता हो सकती है। हालांकि यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है और पेंगुइन ने इसे स्वीकार नहीं किया है।
दुनिया में 10 नवंबर को दस्तक देगी किताब
इस पूरे विवाद के बीच सोनिया गांधी की किताब की वैश्विक रिलीज की तैयारी जारी है। ‘Belonging: A Journey of Love’ को अल्फ्रेड ए. नॉफ के जरिए 10 नवंबर 2026 को दुनिया भर में जारी किए जाने की तैयारी है। भारत में इसके प्रकाशन और वितरण के लिए हार्परकॉलिंस के साथ बातचीत अंतिम चरण में होने की खबर है। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो भारत के पाठकों के सामने सोनिया गांधी की राजनीतिक यात्रा और उनके व्यक्तिगत अनुभवों का एक विस्तृत संस्करण आ सकता है। सबसे बड़ी दिलचस्पी उन हिस्सों को लेकर होगी जिनमें नरेंद्र मोदी, RSS, चीन और भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का जिक्र होने की बात कही जा रही है।
अब असली फैसला किताब करेगी
फिलहाल इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किताब अभी जनता के हाथ में नहीं आई है। इसलिए मोदी, RSS और चीन से जुड़े कथित अंशों को लेकर सामने आई जानकारी को अंतिम सत्य मानने से पहले पुस्तक के प्रकाशित संस्करण का इंतजार जरूरी है। लेकिन विवाद ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या किसी राजनीतिक नेता की आत्मकथा में उसके अपने अनुभवों और राजनीतिक घटनाओं को संपादकीय दबाव में बदला जाना चाहिए? पेंगुइन इसे फैक्ट-चेकिंग और संपादकीय जिम्मेदारी बता रहा है, जबकि सोनिया गांधी के पक्ष से सामने आया रुख यह है कि उनकी कहानी को उनकी सहमति के बिना बदला नहीं जा सकता।
सोनिया नहीं झुकीं, अब किताब बोलेगी
एक तरफ प्रकाशक की दलील है कि वह केवल संपादकीय प्रक्रिया का पालन कर रहा था, दूसरी तरफ सोनिया गांधी के कथित रुख ने साफ कर दिया कि वह अपनी राजनीतिक स्मृतियों को अपनी शर्तों पर सामने रखना चाहती हैं। यही टकराव इस किताब को रिलीज से पहले ही सुर्खियों में ले आया है। अब नजर 10 नवंबर पर है, जब दुनिया के सामने सोनिया गांधी की कहानी आएगी। उस दिन यह भी पता चलेगा कि मोदी, RSS, चीन और भारतीय राजनीति से जुड़े वे विवादित अंश वास्तव में क्या कहते हैं और आखिर भारत में पेंगुइन के साथ प्रकाशन की डील क्यों टूट गई।




