ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | 23 अप्रैल 2026
सीटें बढ़ीं, आवाज़ घटी: लोकतंत्र में बहस क्यों हो रही है कमजोर?
राजनीति में कई बार असली कहानी आंकड़ों से नहीं, माहौल से समझ आती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। विपक्ष अपनी जगह पर अड़ा रहा—न झुका, न पीछे हटा। दूसरी तरफ सवाल उठता है कि क्या एनडीए और उसके बड़े नेता, जैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह, विपक्ष को साधने में असफल रहे? जब “नारी शक्ति वंदन बिल” पेश हुआ, उसी समय वोटों के बंटवारे ने साफ कर दिया कि मामला आसान नहीं है। नाम सुनने में जितना आकर्षक लगता है, उतना ही इसमें एक अजीब सा भाव भी छिपा है—जैसे महिलाओं को कोई विशेष कृपा दी जा रही हो।
तीन साल पहले, 2023 में, महिला आरक्षण बिल पास किया गया था। उस समय इसे बड़े जोर-शोर से पेश किया गया, लेकिन लोगों को यह ज्यादा चुनावी कदम लगा। 2024 के चुनाव से पहले यह दिखाने की कोशिश थी कि सरकार महिलाओं के पक्ष में है। लेकिन नतीजे बताते हैं कि इसका बहुत बड़ा असर नहीं पड़ा। बीजेपी को सरकार बनाने के लिए सहयोगियों का सहारा लेना पड़ा—आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और बिहार में नीतीश कुमार जैसे नेताओं का। अब हालात ऐसे हैं कि ये समीकरण भी बदल चुके हैं।
राजनीतिक गलियारों में एक और दिलचस्प चर्चा सुनने को मिली—कि शायद सरकार खुद चाहती थी कि यह बिल पास न हो, ताकि बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों में इसे मुद्दा बनाया जा सके। यानी हार भी कभी-कभी रणनीति का हिस्सा हो सकती है।
कहा गया कि 18 अप्रैल तक सरकार ने विपक्ष से बातचीत की कोशिश की, लेकिन विपक्ष अपने रुख पर कायम रहा। यहां एक बड़ा सवाल यह भी है कि 2023 में पास हुए बिल को 2024 के चुनावों में लागू क्यों नहीं किया गया। अगर वह इतना जरूरी था, तो फिर वह सिर्फ कागज़ तक ही क्यों सीमित रह गया?
असल बात यह है कि जब किसी बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए जरूरी संख्या ही आपके पास न हो, तब भी उसे आगे बढ़ाना एक तरह का राजनीतिक जोखिम होता है। ऊपर से इसे खास सत्र बुलाकर, चुनावी माहौल के बीच पेश करना—यह सब इसे एक गंभीर कानून से ज्यादा एक राजनीतिक प्रदर्शन जैसा बना देता है।
सरकार के समर्थकों ने इसे एक बड़ी चाल बताया—जैसे विपक्ष को घेरने की रणनीति। लोकसभा की सीटें बढ़ाने और परिसीमन के साथ महिला आरक्षण जोड़कर यह संदेश दिया गया कि अगर कोई इसका विरोध करेगा, तो वह महिलाओं के खिलाफ दिखेगा। यानी बहस से ज्यादा दबाव बनाने की कोशिश।
इतिहास पर नजर डालें तो एक दिलचस्प तुलना सामने आती है। इंदिरा गांधी, जिनका नाम आपातकाल के साथ जुड़ा है, उन्होंने भी 1977 में चुनाव स्वतंत्र रूप से होने दिए। विपक्ष ने खुलकर आलोचना की, रैलियां कीं, लेकिन उन्हें रोका नहीं गया। यह बात आज के हालात में सोचने पर मजबूर करती है।
लोकसभा में 17 अप्रैल को हुए मतदान में 298 वोट पक्ष में और 230 विरोध में पड़े। लेकिन दो-तिहाई बहुमत के लिए जो संख्या चाहिए थी, उससे 54 वोट कम रह गए। यह सिर्फ एक हार नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत है।
18 अप्रैल को प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन भी कुछ अलग ही लगा। यह ज्यादा एक राजनीतिक जवाब जैसा था, जिसमें विपक्षी दलों—कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, समाजवादी पार्टी—पर निशाना साधा गया। इसमें एक तरह की बेचैनी झलकती है, जैसे कोई मजबूत दिखने वाली व्यवस्था अब चुनौती महसूस कर रही हो।
अब हालात यह हैं कि बीजेपी पहले की तरह आसानी से माहौल नहीं बना पा रही है। जो लोग बीच में खड़े होते हैं, उन्हें अपने पक्ष में करना अब आसान नहीं रहा। राजनीति अब ज्यादा बंटी हुई दिखती है, जहां सहमति बनाना मुश्किल होता जा रहा है।
सरकार अगर चाहती, तो इसे एक सामान्य परिसीमन प्रक्रिया के रूप में पेश कर सकती थी। लेकिन इसे “नारी वंदन” जैसे भावनात्मक नाम से पेश किया गया। जबकि जमीन पर सच्चाई यह है कि मणिपुर, हाथरस, उन्नाव, ऋषिकेश और दिल्ली जैसे मामलों में महिलाओं की समस्याएं आज भी गंभीर हैं। ऐसे में यह कानून लोगों को ज्यादा दिखावे जैसा लगता है।
चुनाव के मंच पर बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है, लेकिन संसद के अंदर सहमति बनाना अलग बात है। वहां भरोसा, बातचीत और स्पष्टता की जरूरत होती है।
2023 हो या 2026—इस तरह की जल्दबाज़ी समझ से परे लगती है। सरकार अपने समर्थन को बढ़ा नहीं पाई, और यही बताता है कि अब हर जीत आसान नहीं रही।
अब सवाल यह भी है कि क्या इससे बीजेपी को बंगाल या तमिलनाडु में फायदा मिलेगा? खुद पार्टी के लोग भी इस पर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। बंगाल में माहौल अब भी अनिश्चित है और चुनाव की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठते रहते हैं।
लोग चाहते हैं कि संसद अपनी ताकत खुद दिखाए—स्वतंत्र होकर काम करे। अगर संसद मजबूत होगी, तो न्यायपालिका जैसी संस्थाएं भी और आत्मविश्वास से काम कर पाएंगी। अभी संतुलन ज्यादा सरकार के पक्ष में झुका हुआ दिखता है।
बहस या सिर्फ शोर?
अब एक बड़ा सवाल—अगर 300 और सांसद जोड़ दिए जाएं, तो क्या संसद में बहस बेहतर हो जाएगी? शायद नहीं। अभी भी बहुत कम सांसदों को बोलने का मौका मिलता है। जो बोलते हैं, उन्हें भी बार-बार रोका जाता है।
लोकसभा में 74 महिला सांसद हैं, जिनमें 37 बीजेपी की हैं। लेकिन क्या उन्होंने महिलाओं के मुद्दों को उतनी मजबूती से उठाया? यह सवाल बना हुआ है। कई बार तो चर्चा की अनुमति ही नहीं मिलती।
असल जरूरत संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच बदलने की है। आज हालात ऐसे हैं कि कई बार सही मुद्दे उठाने का साहस भी कम दिखता है। गरीबों और बुजुर्गों को मिलने वाली सुविधाएं जो 2021 में बंद हुईं, वे अब तक वापस नहीं आईं।
मजदूरों की स्थिति भी गंभीर है—नोएडा, गुरुग्राम, बिहार, महाराष्ट्र—हर जगह लोग संकट में पलायन करने को मजबूर होते हैं। लेकिन उनकी आवाज़ संसद में कम सुनाई देती है। सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत भी चिंता का विषय है।
इसके साथ ही सांसदों की संख्या बढ़ाने का खर्च भी बहुत बड़ा है। वेतन, सुविधाएं, यात्रा, आवास—सब मिलाकर हजारों करोड़ रुपये का बोझ जनता पर पड़ता है।
देश को अब असली सुधारों की जरूरत है—जो संविधान की भावना को मजबूत करें। शायद इसमें लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल पर भी विचार करना चाहिए।
आखिर में बात साफ है—मुद्दे गंभीर हैं, और जनता का भरोसा सबसे अहम है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सिर्फ रणनीति नहीं, ईमानदारी भी जरूरी है। यह बहस यहीं खत्म नहीं होगी—यह आगे भी चलती रहेगी, जब तक सच में बदलाव नहीं आता।




