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ओपिनियन पोल: भागवत के ज्ञान से ज़्यादा ज़मीन पर दिखती है संघ की मनुवादी मानसिकता

बेंगलुरु/ मुंबई/ कोलकाता/ हैदराबाद/ नई दिल्ली | 9 नवंबर 2025

मोहन भागवत चाहे मंचों पर कितनी ही बड़ी बातें कर लें—“सब भारत माता के पुत्र हैं”, “शाखा में कोई पहचान नहीं पूछी जाती”, “हम पूरे समाज को जोड़ना चाहते हैं”—लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। जो लोग संघ के कार्य-तंत्र और विचारधारा को समझते हैं, वे जानते हैं कि संघ की आत्मा में जो दर्शन बैठा हुआ है, वह बराबरी का नहीं, बल्कि मनुवादी ढांचे का है।

इस ओपिनियन पोल में जनता ने साफ-साफ कहा है कि भागवत के भाषण सुनने में अच्छे लगते हैं, लेकिन उनके संगठन में व्यवहार वही है जो दशकों से चला आ रहा है—ऊपर से सबको साथ, भीतर मनुवादी सोच।

ओपिनियन पोल—जनता क्या सोचती है?

प्रश्न 1 — क्या RSS वास्तव में जाति-मज़हब से ऊपर है?

71% लोगों ने कहा: “नहीं, संघ की विचारधारा मनुवादी ढांचे पर आधारित है।”

18% ने कहा: “कागज़ों पर हाँ, व्यवहार में नहीं।”

सिर्फ़ 11% ने विश्वास जताया कि संघ जाति-मज़हब से ऊपर है।

प्रश्न 2 — क्या “मुसलमान और ईसाई शाखा में आते हैं” वाला बयान सच्चाई है?

67%: “यह सिर्फ़ छवि सुधारने का प्रयास है।”

22%: “किसी-किसी जगह प्रतीकात्मक उपस्थिति हो सकती है, पर वास्तविक सहभागिता नहीं।”

11%: “हाँ, ये पूरी तरह सही है।”

प्रश्न 3 — क्या RSS का अंतिम लक्ष्य समाज को संगठित करना है या मानसिक वर्चस्व कायम करना?

74%: “मनुवादी वर्चस्व स्थापित करना ही संघ का मूल एजेंडा है।”

16%: “दोनों बातें साथ-साथ चलती हैं।”

10%: “सिर्फ़ समाज को जोड़ना।”

प्रश्न 4 — जनता भागवत के भाषणों को कैसे देखती है?

69%: “शब्द बड़े हैं, व्यवहार छोटा।”

21%: “ये सिर्फ़ सौम्य चेहरा दिखाने की रणनीति है।”

10%: “उनके बयान ईमानदार प्रयास हैं।”

इस ओपिनियन पोल से जनता की सोच बिल्कुल साफ़ है—

भागवत चाहे जितना भी समरसता का पाठ पढ़ाएँ, लेकिन लोगों का भरोसा अब भी यही कहता है कि RSS एक मनुवादी सोच पर टिके संगठन के रूप में दिखता है—जहाँ बराबरी की बात मंच से होती है, और जमीनी स्तर पर भेदभाव की परंपरा कायम रहती है।

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