राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 9 मई 2026
पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बनने के साथ ही राज्य की राजनीति ही नहीं बल्कि नौकरशाही में भी बड़े बदलावों की आहट सुनाई देने लगी है। इसी बीच पश्चिम बंगाल कैडर के 1990 बैच के वरिष्ठ IAS अधिकारी और वर्तमान राज्य चुनाव आयोग के CEO मनोज अग्रवाल का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। सूत्रों के मुताबिक नई बीजेपी सरकार उन्हें राज्य का नया मुख्य सचिव बना सकती है। इतना ही नहीं, जुलाई 2026 में रिटायर होने जा रहे मनोज अग्रवाल को सेवा विस्तार दिए जाने की चर्चाएं भी प्रशासनिक गलियारों में तेजी से चल रही हैं। लेकिन इस संभावित नियुक्ति ने राजनीतिक विवाद भी खड़ा कर दिया है, क्योंकि मनोज अग्रवाल का नाम पहले आय से अधिक संपत्ति के CBI मामले में सामने आ चुका है। उनकी पत्नी और ससुर से भी पूछताछ हुई थी, लेकिन बाद में मामला ठंडे बस्ते में चला गया। अब विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या सत्ता परिवर्तन के साथ पुराने मामले भी “उड़नछू” हो गए हैं?
सूत्रों के अनुसार नई बीजेपी सरकार बंगाल में प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह नए तरीके से संगठित करना चाहती है। पार्टी नेतृत्व ऐसे अधिकारियों पर भरोसा करना चाहता है जिनका अनुभव लंबा हो, केंद्र सरकार के साथ बेहतर तालमेल हो और जो तेजी से फैसलों को लागू कराने की क्षमता रखते हों। मनोज अग्रवाल को इसी रणनीति के तहत एक मजबूत विकल्प माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बनने के बाद नौकरशाही का चरित्र भी बदल सकता है। लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस सरकार के साथ काम करने वाले कई अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा की जा सकती है, जबकि कुछ ऐसे अधिकारियों को आगे लाया जा सकता है जिनकी छवि “प्रशासनिक रूप से प्रभावी” मानी जाती है। मनोज अग्रवाल का नाम इसी सूची में सबसे ऊपर बताया जा रहा है।
हालांकि विपक्ष इस संभावित नियुक्ति को लेकर हमलावर हो सकता है। तृणमूल कांग्रेस से जुड़े नेताओं का कहना है कि जिन अधिकारियों पर कभी भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति जैसे गंभीर आरोप लगे हों, उन्हें राज्य की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कुर्सी सौंपना कई सवाल खड़े करता है। विपक्ष यह भी पूछ रहा है कि जिस मामले में कभी CBI सक्रिय थी, वह अचानक शांत कैसे पड़ गया।
दूसरी तरफ बीजेपी समर्थक खेमे का कहना है कि किसी भी अधिकारी का मूल्यांकन उसके अनुभव, प्रशासनिक क्षमता और कामकाज के रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर किसी मामले में अदालत या जांच एजेंसी ने आगे कार्रवाई नहीं की, तो केवल पुराने आरोपों के आधार पर किसी अधिकारी को अयोग्य नहीं माना जा सकता।
मनोज अग्रवाल फिलहाल राज्य चुनाव आयोग में CEO के तौर पर कार्यरत हैं और चुनावी प्रक्रियाओं के संचालन में उनकी भूमिका अहम रही है। अब अगर उन्हें मुख्य सचिव बनाया जाता है तो यह बंगाल की नौकरशाही में सबसे बड़ा बदलाव माना जाएगा। सेवा विस्तार की संभावना ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
अब सबकी नजर नई बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद होने वाले प्रशासनिक फैसलों पर टिकी है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि क्या मनोज अग्रवाल को वास्तव में सेवा विस्तार देकर बंगाल की नौकरशाही की कमान सौंपी जाती है या फिर सत्ता परिवर्तन के साथ कोई नया प्रशासनिक चेहरा सामने आता है।




