राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अक्टूबर 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के एक फैसले ने उसके पुराने कार्यकर्ताओं के बीच नए सवाल खड़े कर दिए हैं। पूर्व तृणमूल कांग्रेस सांसद रुक्मिणी मल्लिक उर्फ कोएल मल्लिक को बीजेपी ने राज्यसभा के लिए नामित कर दिया है। दिलचस्प यह है कि कोएल मल्लिक इसी साल अप्रैल में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा पहुंची थीं और 16 जुलाई 2026 को उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। अब कुछ ही महीनों बाद बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार बना दिया है।
यह फैसला सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं माना जा रहा। पश्चिम बंगाल बीजेपी के भीतर इसे लेकर ‘तृणमूलाइजेशन ऑफ बीजेपी’ यानी बीजेपी में तृणमूल नेताओं के बढ़ते प्रभाव की बहस फिर तेज हो गई है। पार्टी के एक वर्ग का सवाल है कि जिन नेताओं ने लंबे समय तक बीजेपी के खिलाफ राजनीति की, उन्हें सत्ता में आने के बाद पार्टी में जगह और महत्वपूर्ण पद क्यों दिए जा रहे हैं?
पहले TMC, अब BJP का राज्यसभा टिकट
कोएल मल्लिक को अप्रैल 2026 में तृणमूल कांग्रेस ने राज्यसभा भेजा था। लेकिन महज कुछ महीनों बाद उन्होंने उच्च सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद अब बीजेपी की ओर से राज्यसभा के लिए उनका नाम सामने आया है।
राजनीतिक रूप से देखें तो यह घटनाक्रम बंगाल में दल-बदल की उस राजनीति को फिर सामने लाता है जिसमें चुनाव के पहले और बाद में नेताओं का पाला बदलना आम राजनीतिक रणनीति बनता जा रहा है।
बीजेपी लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अवसरवाद के आरोप लगाती रही है। दूसरी ओर, अब बीजेपी के भीतर से ही यह सवाल उठ रहा है कि क्या सत्ता की राजनीति में वही पैमाना बीजेपी पर भी लागू नहीं होना चाहिए?
पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी क्यों?
बीजेपी के संगठन में लंबे समय से काम कर रहे कार्यकर्ताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी के लिए वर्षों तक संघर्ष करने वालों की भूमिका क्या रह गई है।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी को मजबूत करने के लिए जिन कार्यकर्ताओं ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सड़क से लेकर चुनावी मैदान तक संघर्ष किया, वे यदि देखते हैं कि कल तक दूसरी पार्टी में रहे नेताओं को सीधे महत्वपूर्ण राजनीतिक पद मिल रहे हैं, तो स्वाभाविक रूप से असंतोष पैदा हो सकता है।
यही वजह है कि कोएल मल्लिक का राज्यसभा नामांकन केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि बीजेपी की बंगाल रणनीति और संगठनात्मक प्राथमिकताओं पर बहस का विषय बन गया है।
क्या बीजेपी बदल रही है अपनी रणनीति?
बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल लंबे समय से विस्तार का बड़ा राजनीतिक मैदान रहा है। पार्टी ने राज्य में तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ लगातार आक्रामक राजनीति की है। लेकिन सत्ता के करीब पहुंचने की रणनीति में उसने दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को भी जगह दी है।
समर्थकों का तर्क हो सकता है कि राजनीति में कोई भी नेता स्थायी रूप से किसी एक खेमे का नहीं होता और पार्टी अपने विस्तार के लिए लोकप्रिय चेहरों को साथ ला सकती है। लेकिन आलोचकों का सवाल इससे आगे जाता है—क्या विचारधारा और संगठनात्मक संघर्ष से ज्यादा महत्व अब चुनावी उपयोगिता का हो गया है?
यही बहस कोएल मल्लिक के नामांकन के बाद फिर तेज हुई है।
बंगाल की राजनीति में संदेश क्या?
बीजेपी के इस फैसले का एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी है। पार्टी पश्चिम बंगाल में अपने प्रभाव का विस्तार करने के लिए ऐसे चेहरों को साथ लेने से परहेज नहीं कर रही, जिनका राजनीतिक अतीत तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा रहा है।
लेकिन यही रणनीति बीजेपी के लिए राजनीतिक जोखिम भी पैदा कर सकती है। पार्टी को यह जवाब देना पड़ सकता है कि क्या सत्ता और चुनावी गणित के लिए पुराने राजनीतिक विरोधियों को अपनाना अब उसकी नई नीति है?
दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस भी इस फैसले को बीजेपी की वैचारिक कमजोरी के रूप में पेश कर सकती है।
सवाल सिर्फ कोएल मल्लिक का नहीं
मामला सिर्फ कोएल मल्लिक के राज्यसभा पहुंचने का नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि भारतीय राजनीति में विचारधारा, राजनीतिक निष्ठा और संगठनात्मक संघर्ष की कीमत आखिर कितनी रह गई है?
एक पार्टी में सांसद, दूसरी पार्टी में इस्तीफा और फिर तीसरी राजनीतिक भूमिका—यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र की तस्वीर भी पेश करता है।
बीजेपी के सामने अब दोहरी चुनौती है। उसे एक तरफ बंगाल में राजनीतिक विस्तार करना है और दूसरी तरफ अपने पुराने कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाना है कि दशकों का संगठनात्मक संघर्ष किसी बाहरी राजनीतिक चेहरे के सामने छोटा नहीं पड़ गया है।
कोएल मल्लिक का राज्यसभा नामांकन इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि यह सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि बीजेपी की बंगाल रणनीति, तृणमूल से आए नेताओं की भूमिका और पार्टी के भीतर पुराने बनाम नए चेहरों की लड़ाई को सामने ला रहा है।
राजनीति में सवाल हमेशा यह नहीं होता कि कौन किस पार्टी में गया। असली सवाल यह होता है कि पार्टी ने उसे क्यों अपनाया और बदले में अपने पुराने कार्यकर्ताओं को क्या दिया। यही सवाल अब बीजेपी से भी पूछा जा रहा है।


