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भावना आहत की राजनीति छोड़िए, क्रिएटिव विरोध को समझिए: चढ़ावा चोरी पर संसद का ‘नुक्कड़ नाटक’ क्यों चुभ गया?

विरोध सिर्फ नारे, तख्तियां और प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होता; भारतीय समाज में नाटक, स्वांग, व्यंग्य और प्रतीकों के जरिए सत्ता तथा सामाजिक बुराइयों पर सवाल उठाने की लंबी परंपरा रही है

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अगस्त 2026

चढ़ावा चोरी पर नाटक हुआ, फिर ‘भावना आहत’ की गठरी खुल गई

संसद परिसर में राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी को लेकर विपक्ष ने नुक्कड़ नाटक की शैली में एक क्रिएटिव विरोध प्रदर्शन किया और इसके बाद परिचित ‘भावना आहत’ विमर्श फिर शुरू हो गया। राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद के खिलाफ वाराणसी में धार्मिक भावनाएं आहत करने और सनातन धर्म के कथित अपमान को लेकर FIR तक दर्ज हो गई। दिलचस्प यह है कि आपत्ति केवल BJP या उसके समर्थक खेमे तक सीमित नहीं दिखाई दी; सोशल मीडिया पर स्वयं को उदार और प्रगतिशील बताने वाले कुछ लोगों ने भी प्रदर्शन के संदेश से अधिक उसकी वेशभूषा पर सवाल खड़े किए। यहीं असली समस्या है। किसी राजनीतिक प्रस्तुति को समझने से पहले उसके प्रतीकों से नाराज हो जाना आसान है, लेकिन कला, व्यंग्य और नाटक को समझने के लिए यह देखना पड़ता है कि कलाकार आखिर कहना क्या चाहता है। संसद के बाहर हुए उस प्रदर्शन का विषय भगवान राम नहीं थे, रामायण नहीं थी और न सनातन धर्म का उपहास उसका घोषित विषय था। मुद्दा था—मंदिर का चढ़ावा और उसमें कथित चोरी। इसलिए बहस भी सबसे पहले इसी पर होनी चाहिए कि नाटक ने किस पर प्रहार किया—आस्था पर या आस्था के नाम पर मिले पैसे की कथित हेराफेरी पर?

पहले तीन शब्दों पर गौर कीजिए—‘ढोंगी’, ‘पाखंडी’ और ‘दुराचारी’

थोड़ी देर के लिए राजनीति को किनारे रखिए और भाषा को समझिए। तीन शब्द हैं—ढोंगी, पाखंडी और दुराचारी। आंखें बंद करके इन शब्दों का उच्चारण कीजिए और देखिए कि भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति आपके दिमाग में कैसी छवि बनाती है। विशेष रूप से ‘ढोंगी’ और ‘पाखंडी’ जैसे शब्द लंबे समय से उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होते आए हैं जो बाहर से धर्म, नैतिकता या सदाचार का प्रदर्शन करे लेकिन आचरण उसके ठीक विपरीत हो। साहित्य, लोककथाओं, फिल्मों, कार्टून और व्यंग्य में ऐसे पात्रों की एक स्थापित दृश्य-भाषा विकसित हुई है। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि धार्मिक वेशभूषा पहनने वाला हर व्यक्ति ढोंगी या पाखंडी है—ऐसा सामान्यीकरण अनुचित होगा। लेकिन यदि किसी विशिष्ट कथित धार्मिक भ्रष्टाचार पर नाटक बनाया जा रहा है तो कलाकार उस सामाजिक भूमिका से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करेगा। अभिनय की यही प्रकृति है। एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी पर व्यंग्य होगा तो कलाकार पुलिस की वर्दी पहन सकता है; इससे पूरी पुलिस अपमानित नहीं हो जाती। भ्रष्ट डॉक्टर का पात्र सफेद कोट पहन सकता है; इससे चिकित्सा पेशे का अपमान नहीं होता। फिर किसी कथित चढ़ावा चोरी पर पुजारी जैसा पात्र आते ही पूरा सनातन धर्म कैसे अपमानित हो गया?

चढ़ावा चोरी का दृश्य है तो कलाकार आखिर दिखाए क्या?

मान लीजिए आप एक विजुअल आर्टिस्ट हैं। आपको मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी पर एक कार्टून, नुक्कड़ नाटक या स्क्रीनप्ले बनाना है। अब यदि आप एक कमरे में बैंक कर्मचारियों जैसे पैंट-शर्ट पहने चार लोगों को नोट गिनते हुए दिखा दें तो दर्शक तक कौन-सा संदेश पहुंचेगा? क्या वह समझ पाएगा कि व्यंग्य मंदिर के चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी पर है? शायद नहीं। दृश्य कला में प्रतीक इसलिए इस्तेमाल होते हैं क्योंकि दर्शक कुछ सेकंड में संदर्भ समझ सके। अदालत दिखानी हो तो काला कोट, अस्पताल दिखाना हो तो डॉक्टर का कोट, पुलिस तंत्र पर व्यंग्य हो तो वर्दी और राजनीति दिखानी हो तो नेता से जुड़े दृश्य संकेत इस्तेमाल किए जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उस पोशाक को पहनने वाला पूरा समुदाय अपराधी है। इसी तरह चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी को नाटकीय रूप देने के लिए पुजारी का पात्र इस्तेमाल करना अपने आप में पूरे धर्म या सभी पुजारियों पर आरोप नहीं बन जाता। सवाल पात्र के कृत्य और संदर्भ का है।

रामलीला में अभिनय आस्था है तो राजनीतिक स्किट में अभिनय अचानक अपराध कैसे?

भारत को अभिनय का अर्थ समझाने की शायद जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। हमारे यहां सदियों से रामलीला होती है। मंच पर एक कलाकार भगवान राम बनता है, दूसरा माता सीता, तीसरा हनुमान और चौथा रावण। दर्शकों को मालूम होता है कि सामने खड़ा व्यक्ति वास्तव में राम या रावण नहीं है। वह एक पात्र निभा रहा है। भारत की नाट्य परंपरा रामलीला तक सीमित नहीं है—स्वांग, नौटंकी, तमाशा, जात्रा, भवाई और आधुनिक नुक्कड़ नाटक तक दृश्य और प्रतीक के माध्यम से बात जन-जन तक पहुंचाने की परंपरा रही है। इसलिए संसद परिसर में किसी सांसद का पुजारी की भूमिका निभाना उसे वास्तविक पुजारी नहीं बना देता और न ही उस पात्र के आचरण को सभी पुजारियों पर आरोप माना जाना चाहिए। नाटक और वास्तविकता के इस बुनियादी अंतर को मिटा देंगे तो राजनीतिक कार्टून से लेकर सिनेमा तक आधी अभिव्यक्तियां ‘भावना आहत’ की अदालत में खड़ी मिलेंगी।

असली सवाल फिर गायब—चढ़ावा कथित तौर पर चोरी कैसे हुआ?

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस मुद्दे पर नाटक किया गया, वह पीछे चला गया और नाटक स्वयं मुद्दा बन गया। अगर मंदिर के चढ़ावे में चोरी या हेराफेरी हुई है तो धार्मिक दृष्टि से भी सबसे गंभीर प्रश्न वही होना चाहिए। श्रद्धालु मंदिर में अपनी मेहनत की कमाई इसलिए नहीं देता कि कोई उसे निजी लाभ के लिए इस्तेमाल करे। कोई गरीब भक्त दस रुपये देता है, कोई सौ रुपये, कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार हजारों या लाखों देता है—उसके लिए रकम से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा होती है। इसलिए यदि चढ़ावे में चोरी का आरोप सामने आया है तो पहला प्रश्न होना चाहिए कि पैसा कितना सुरक्षित था, कथित चोरी कैसे हुई, कौन जिम्मेदार था और व्यवस्था में क्या सुधार किए गए। लेकिन यदि हर सवाल का उत्तर ‘आपने हमारी भावना आहत कर दी’ बन जाएगा तो वास्तविक जवाबदेही पीछे छूट जाएगी।

विरोध केवल घिसे-पिटे नारे और प्रेस रिलीज का नाम नहीं

लोकतंत्र में विरोध की भी अपनी रचनात्मक भाषा होती है। हर प्रदर्शन में दस लोग तख्ती लेकर खड़े हों, एक नेता माइक पकड़े, बाकी पीछे नारे लगाएं और शाम को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी हो—विरोध का यही एकमात्र प्रारूप नहीं है। नुक्कड़ नाटक ने भारत में सामाजिक बुराइयों, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, लैंगिक भेदभाव, मजदूरों के अधिकार और सत्ता के दुरुपयोग जैसे विषयों को सड़क पर आम आदमी की भाषा में रखा है। व्यंग्य की शक्ति यही है कि जो बात पांच पन्नों के भाषण में नहीं पहुंचती, वह दो मिनट के अभिनय में दर्शक के दिमाग में बैठ जाती है। इस लिहाज से विपक्ष का चढ़ावा चोरी के आरोपों पर नाटकीय प्रदर्शन राजनीतिक संचार का एक प्रभावी और रचनात्मक तरीका था। उससे असहमति रखिए, उसके राजनीतिक उद्देश्य पर सवाल उठाइए, लेकिन केवल इसलिए उसे धार्मिक अपमान घोषित कर देना कि कलाकार ने पात्र के अनुरूप वेशभूषा पहनी, क्रिएटिव अभिव्यक्ति को बहुत संकीर्ण दायरे में बांधना है।

आधुनिकता महंगे कपड़ों और कारों से नहीं, विचारों की उदारता से आती है

हम स्मार्टफोन बदलते हैं, महंगे ब्रांड पहनते हैं, आधुनिक कारों में चलते हैं, दुनिया भर का खाना खाते हैं और स्वयं को आधुनिक समाज का हिस्सा मानते हैं। लेकिन आधुनिकता केवल उपभोग की आदत नहीं है। आधुनिक होने का अर्थ आलोचना सहने, व्यंग्य समझने और अपने सबसे प्रिय प्रतीकों पर भी सवाल तथा कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए कुछ लोकतांत्रिक जगह छोड़ने की क्षमता से है। यदि हमारा मोबाइल नवीनतम पीढ़ी का हो लेकिन विचार इतने असुरक्षित हों कि एक राजनीतिक स्किट से पूरा धर्म खतरे में दिखाई देने लगे, तो आधुनिकता केवल बाहरी आवरण रह जाती है। सनातन जैसी हजारों वर्ष पुरानी और विविध दार्शनिक परंपरा इतनी कमजोर नहीं हो सकती कि संसद परिसर में कुछ मिनट के नुक्कड़ नाटक से उसकी प्रतिष्ठा डगमगा जाए।

सिनेमा में संन्यासी पर गीत चले तो कला, राजनीतिक व्यंग्य हो तो भावना क्यों?

भारतीय लोकप्रिय संस्कृति में धार्मिक और सामाजिक पात्रों को लेकर हास्य, गीत, व्यंग्य और नाटकीय प्रस्तुतियां नई नहीं हैं। पुरानी हिंदी फिल्मों में भी साधु, संन्यासी, पुजारी और धार्मिक पात्र कभी गंभीर तो कभी हास्यपूर्ण परिस्थितियों में दिखाई देते रहे हैं। यहां तक कि लोकप्रिय गीत ‘चल संन्यासी मंदिर में…’ जैसी प्रस्तुतियों को दर्शकों ने मनोरंजन और सिनेमाई अभिनय के रूप में देखा। उसमें अभिनय करने वाली हेमा मालिनी बाद के वर्षों में BJP की सांसद भी बनीं। इसका उल्लेख किसी फिल्म या कलाकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि एक सामान्य सिद्धांत समझाने के लिए है—दर्शक अभिनय और वास्तविक धार्मिक आस्था के बीच अंतर समझता है। यही परिपक्वता राजनीतिक नाटक के मामले में भी होनी चाहिए। कला को कला और पात्र को पात्र की तरह देखने की क्षमता अचानक राजनीतिक सुविधा के अनुसार खत्म नहीं हो सकती।

भावना आहत होने का अधिकार है, लेकिन वही अंतिम फैसला नहीं

किसी व्यक्ति को संसद का प्रदर्शन खराब, असंवेदनशील या भद्दा लग सकता है। भावना व्यक्तिगत होती है और किसी को यह आदेश नहीं दिया जा सकता कि उसे बुरा न लगे। लेकिन किसी व्यक्ति की भावना आहत होना और किसी अभिव्यक्ति का वस्तुनिष्ठ रूप से पूरे धर्म का अपमान होना दो अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक समाज में हर आहत भावना अपने आप सेंसरशिप या आपराधिक कार्रवाई का पर्याप्त आधार बन जाए तो साहित्य, सिनेमा, कार्टून, व्यंग्य और राजनीतिक नाटक का अस्तित्व मुश्किल हो जाएगा। इसलिए कसौटी यह होनी चाहिए कि प्रस्तुति का वास्तविक लक्ष्य क्या था, संदर्भ क्या था और क्या किसी धर्म या समुदाय के प्रति जानबूझकर घृणा पैदा करने का प्रयास था। केवल वेशभूषा देखकर फैसला नहीं किया जा सकता।

‘भावना आहत’ की गठरी नीचे रखिए और क्रिएटिविटी को भी जगह दीजिए

इसलिए संसद के उस प्रदर्शन पर राजनीतिक बहस जरूर होनी चाहिए, लेकिन बहस का स्तर थोड़ा ऊंचा होना चाहिए। किसी को वह नाटक पसंद आया तो ठीक, किसी को खराब लगा तो वह भी ठीक। लेकिन हर असुविधाजनक व्यंग्य के सामने ‘धर्म खतरे में है’ की दीवार खड़ी कर देना एक जीवंत लोकतंत्र को कमजोर करता है। रूपक में कहें तो ‘भावना आहत’ की गठरी को हर वक्त सिर पर लेकर चलने के बजाय कभी उसे नीचे रखकर यह भी देखिए कि कलाकार कहना क्या चाहता है। शायद तब दिखाई देगा कि निशाना सनातन नहीं था, सवाल चढ़ावे की कथित चोरी पर था।

चढ़ावा चोरी पर सवाल पूछना राम का अपमान नहीं, श्रद्धालु के पैसे की जवाबदेही है

अंततः बात बेहद सीधी है। भगवान राम पर सवाल नहीं था। राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे की सुरक्षा और उसमें कथित चोरी पर सवाल था। यदि किसी ने उस मुद्दे को दो मिनट के नाटक में इस तरह प्रस्तुत किया कि पूरा देश उसकी चर्चा करने लगा, तो राजनीतिक संचार की दृष्टि से वह प्रस्तुति अपना उद्देश्य हासिल कर चुकी है। सत्ता पक्ष चाहे तो उसका जवाब बेहतर तथ्य, जांच की जानकारी और जवाबदेही से दे सकता है। लेकिन यदि बहस चोरी से हटाकर कपड़े और ‘भावना आहत’ पर पहुंचा दी जाए तो मूल सवाल फिर भी वहीं खड़ा रहेगा—श्रद्धालुओं का चढ़ावा कथित तौर पर चोरी कैसे हुआ और उसके लिए जिम्मेदार कौन है?

विरोध केवल नारा नहीं होता। कभी कविता विरोध करती है, कभी कार्टून, कभी गीत, कभी फिल्म और कभी सड़क पर खेला गया छोटा-सा नाटक। एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान यह नहीं कि वहां किसी की भावना कभी आहत न हो; उसकी पहचान यह है कि वहां असुविधाजनक सवालों और रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए भी जगह बची रहे।

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