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फैक्ट्रियों की रफ्तार बढ़ी, विदेशी पैसा घटा: भारत की अर्थव्यवस्था में उभर रही नई तस्वीर

जून में औद्योगिक उत्पादन ने पकड़ी तेज रफ्तार, मैन्युफैक्चरिंग में मजबूती; दूसरी तरफ विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से निकाला बड़ा पैसा, लेकिन घरेलू निवेशकों और SIP ने संभाला मोर्चा

ओपिनियन/ बिजनेस | प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अगस्त 2026

फैक्ट्रियों से आई अच्छी खबर, लेकिन क्या जश्न मनाने का वक्त आ गया?

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर लंबे समय बाद उद्योग जगत से एक ऐसी खबर आई है जो उम्मीद जगाती है। जून 2026 में भारत का औद्योगिक उत्पादन 7.3 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में इसकी वृद्धि केवल 2.2 प्रतिशत थी। इसे पिछले करीब 22 महीनों की सबसे तेज औद्योगिक वृद्धि बताया जा रहा है। इससे भी अच्छी बात यह है कि मैन्युफैक्चरिंग यानी कारखानों में बनने वाले सामान का उत्पादन 7.8 प्रतिशत बढ़ा। 23 प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों में से 19 ने वृद्धि दर्ज की। टेक्सटाइल उत्पादन 18.7 प्रतिशत, मोटर वाहन और ट्रेलर 17.5 प्रतिशत, पेय पदार्थ 12.5 प्रतिशत और खाद्य उत्पाद 10.8 प्रतिशत बढ़े। बिजली उत्पादन में भी 10.6 प्रतिशत की मजबूत बढ़ोतरी हुई। पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिकी टैरिफ को लेकर चिंता, महंगे कच्चे तेल और कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच ये आंकड़े निश्चित रूप से राहत देते हैं। लेकिन सवाल है—क्या भारत के उद्योगों ने वास्तव में लंबी दौड़ की रफ्तार पकड़ ली है, या जून का शानदार आंकड़ा कुछ समय की तेजी भर है?

मशीनें चल रही हैं, नए निवेश का संकेत भी उत्साह बढ़ा रहा है

जून के आंकड़ों में सबसे उत्साहजनक बात केवल यह नहीं है कि उत्पादन बढ़ा, बल्कि यह भी है कि कैपिटल गुड्स का उत्पादन 14.2 प्रतिशत बढ़ा। आसान भाषा में कहें तो कैपिटल गुड्स वे मशीनें और उपकरण हैं जिनका इस्तेमाल आगे और सामान बनाने के लिए होता है। इनकी मांग बढ़ना अक्सर इस बात का संकेत माना जाता है कि कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में पैसा लगा रही हैं। इलेक्ट्रिकल उपकरणों के उत्पादन में करीब 34 प्रतिशत की तेज वृद्धि भी इसी सकारात्मक तस्वीर का हिस्सा है। मोटर वाहन उद्योग की 17.5 प्रतिशत वृद्धि बताती है कि अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्सों में मांग मजबूत है। सरकार द्वारा सड़कों, रेलवे, बिजली और दूसरी बड़ी परियोजनाओं पर किया जा रहा पूंजीगत खर्च भी उद्योगों को सहारा दे रहा है। इसलिए जून की 7.3 प्रतिशत औद्योगिक वृद्धि को पूरी तरह संयोग या आंकड़ों का खेल कहना उचित नहीं होगा। अर्थव्यवस्था में वास्तविक गतिविधि बढ़ी है और उद्योगों के कुछ हिस्सों में नई जान दिखाई दे रही है।

फिर भी एक महीने की तेजी को नई आर्थिक क्रांति समझना जल्दबाजी होगी

अच्छे आंकड़ों के साथ सावधानी भी जरूरी है। जुलाई में औद्योगिक वृद्धि की रफ्तार घटकर करीब 5.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। जून की तेज वृद्धि में पिछले वर्ष के कमजोर आधार यानी ‘लो बेस इफेक्ट’ का भी कुछ योगदान हो सकता है। इसका सरल अर्थ है कि यदि पिछले साल उत्पादन कमजोर था तो इस साल सामान्य सुधार भी प्रतिशत में बहुत बड़ा दिखाई देता है। इससे पहले मई में आठ प्रमुख बुनियादी उद्योगों की वृद्धि सात महीने के निचले स्तर पर पहुंचने की खबर आई थी। पेट्रोलियम से जुड़े कुछ क्षेत्रों में कमजोरी चिंता का कारण रही, क्योंकि पेट्रोकेमिकल अर्थव्यवस्था केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। प्लास्टिक, पेंट, घरेलू सामान, सड़क निर्माण और कई दूसरे उद्योग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े हैं। इसलिए जून की शानदार तस्वीर को मई की कमजोरी के साथ रखकर देखना होगा। एक अच्छा महीना उम्मीद पैदा करता है, लेकिन मजबूत अर्थव्यवस्था लगातार अच्छे महीनों से बनती है।

बिजली की तेज वृद्धि में गर्मी का भी हाथ

जून में बिजली उत्पादन का 10.6 प्रतिशत बढ़ना पहली नजर में बहुत मजबूत आर्थिक गतिविधि का संकेत लगता है, लेकिन यहां भी पूरी कहानी समझना जरूरी है। भीषण गर्मी के कारण एयर कंडीशनर, कूलर, पंखे और दूसरी बिजली की जरूरत तेजी से बढ़ी। इसलिए बिजली उत्पादन में हुई वृद्धि का पूरा श्रेय उद्योगों को नहीं दिया जा सकता। इसका एक हिस्सा मौसम से पैदा हुई असाधारण मांग का परिणाम था। इसी तरह अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में वृद्धि समान नहीं है। मैन्युफैक्चरिंग और सरकारी निवेश अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन यदि गांवों में मांग कमजोर रहती है, खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं और परिवारों के रोजमर्रा के खर्च बढ़ते हैं तो उद्योगों की तेजी आखिरकार प्रभावित होगी। फैक्ट्री तभी लंबे समय तक ज्यादा माल बनाएगी जब बाजार में उसे खरीदने वाला ग्राहक मौजूद होगा।

महंगाई जेब काटेगी तो फैक्ट्री की रफ्तार भी आखिर धीमी होगी

भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है, लेकिन यही बाजार महंगाई के दबाव में आया तो उद्योगों की तेजी टिकाना मुश्किल होगा। खाने-पीने की वस्तुओं और ईंधन की कीमत बढ़ती है तो परिवार सबसे पहले गैर-जरूरी खरीदारी कम करते हैं। साबुन, शैम्पू, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, बाहर खाना और दूसरी वस्तुओं पर खर्च धीरे-धीरे घटने लगता है। इसका असर कंपनियों की बिक्री पर पड़ता है। हिंदुस्तान यूनिलीवर यानी HUL का उदाहरण इस चिंता को समझने में मदद करता है। कंपनी का राजस्व बढ़कर करीब ₹17,141 करोड़ पहुंचा, लेकिन मुनाफा पिछले साल के लगभग ₹2,768 करोड़ से घटकर करीब ₹2,680 करोड़ रह गया। लागत का दबाव बढ़ने पर कंपनी ने कुछ उत्पादों की कीमत बढ़ाने का रास्ता अपनाया। लेकिन यहीं ग्राहक पूछता है—अगर कंपनियां हर बढ़ी हुई लागत ग्राहक पर डालेंगी तो आम आदमी आखिर कितना खरीदेगा? अर्थव्यवस्था का पहिया केवल उत्पादन से नहीं, लोगों की खरीदने की क्षमता से चलता है।

एक तरफ फैक्ट्रियों में तेजी, दूसरी तरफ विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं

भारत की आर्थिक कहानी का दूसरा चेहरा शेयर बाजार में दिखाई देता है। जनवरी 2026 से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI ने भारतीय शेयरों से ₹2.6 लाख करोड़ से अधिक की रकम निकाली है। विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी भी लंबे समय के निचले स्तर तक पहुंचने की बात सामने आई है। इसके पीछे केवल भारत की घरेलू स्थिति जिम्मेदार नहीं है। पश्चिम एशिया का तनाव, कच्चे तेल की कीमतों का खतरा, अमेरिका में ऊंची बॉन्ड यील्ड और दक्षिण कोरिया तथा ताइवान जैसे बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों के प्रति बढ़ा आकर्षण भी पैसा भारत से बाहर खींच रहा है। इसके अलावा लंबे समय तक भारतीय शेयरों की कीमतें काफी ऊंची रहने के बाद विदेशी निवेशक यह भी देख रहे हैं कि उन्हें अपने पैसे पर बेहतर लाभ कहां मिल सकता है। इसलिए फैक्ट्रियों के अच्छे आंकड़े आने के बावजूद विदेशी निवेशकों का भरोसा उसी गति से वापस नहीं आया है।

क्या विदेशी पैसा निकलना भारत के लिए खतरे की घंटी है?

₹2.6 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी बिकवाली को मामूली घटना नहीं कहा जा सकता। विदेशी पैसा तेजी से बाहर जाता है तो शेयर बाजार पर दबाव बढ़ता है, कंपनियों के लिए बाजार से पूंजी जुटाना कठिन हो सकता है और रुपये पर भी असर पड़ सकता है। बैंकिंग, IT और बड़ी कंपनियों के शेयरों पर विदेशी बिकवाली का दबाव विशेष रूप से दिखाई दिया। लेकिन 2026 की कहानी में एक बहुत महत्वपूर्ण बदलाव भी छिपा है—विदेशी निवेशक बेच रहे हैं, फिर भी भारतीय बाजार टूटकर बिखरा नहीं। कुछ वर्ष पहले इतनी बड़ी विदेशी बिकवाली शायद बाजार को कहीं ज्यादा गंभीर चोट पहुंचाती। इस बार घरेलू निवेशकों ने विदेशी बिकवाली का बड़ा हिस्सा अपने पैसे से संभाल लिया। यही भारतीय पूंजी बाजार में हो रहे एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है।

विदेशी गए तो भारतीय निवेशक सामने आ गए

घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी DII ने बाजार में जबरदस्त खरीदारी की है। म्यूचुअल फंड और दूसरे घरेलू संस्थानों में आने वाला पैसा लगातार बढ़ रहा है। मई 2026 में DII ने करीब ₹82,600 करोड़ और जून में लगभग ₹85,800 करोड़ का निवेश किया। सबसे बड़ी ताकत आम भारतीयों की SIP बनकर उभरी है। हर महीने लगभग ₹30,000 से ₹31,000 करोड़ तक SIP के जरिए म्यूचुअल फंड में पहुंचने की बात सामने आई है। छोटी-छोटी मासिक बचत मिलकर इतनी बड़ी रकम बन रही है कि विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली का असर काफी हद तक संभाला जा रहा है। यह केवल शेयर बाजार की कहानी नहीं है। यह भारतीय मध्यम वर्ग की बचत के तरीके में हो रहे बदलाव की कहानी भी है। बैंक FD, सोना और जमीन के साथ अब करोड़ों भारतीय परिवार म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार को भी अपनी लंबी अवधि की बचत का हिस्सा बना रहे हैं।

पहली बार बाजार की ताकत का केंद्र बदलता दिखाई दे रहा है

सबसे दिलचस्प बदलाव भारतीय शेयर बाजार के मालिकाना ढांचे में दिखाई दे रहा है। घरेलू संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी लगभग 19.2 प्रतिशत और विदेशी संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी करीब 18.8 प्रतिशत बताई जा रही है। यानी पहली बार घरेलू संस्थागत हिस्सेदारी विदेशी संस्थागत हिस्सेदारी से आगे निकलने की स्थिति बनी है। यह केवल दो प्रतिशत आंकड़ों की तुलना नहीं है; इसके पीछे एक बड़ा आर्थिक बदलाव छिपा है। दशकों तक भारतीय बाजार की दिशा तय करने में विदेशी निवेशकों की खरीद और बिक्री का बहुत बड़ा प्रभाव रहा। विदेशी पैसा आया तो बाजार चढ़ा, पैसा निकला तो बाजार गिरा। अब घरेलू बचत धीरे-धीरे इतनी बड़ी ताकत बन रही है कि विदेशी निवेशकों का प्रभाव कुछ कम किया जा सकता है। इसे भारत के वित्तीय बाजार की परिपक्वता का संकेत माना जा सकता है।

बैंकिंग और IT में विदेशी बेच रहे हैं, घरेलू निवेशक मौका देख रहे हैं

विदेशी निवेशकों की बिकवाली का बड़ा असर बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और IT कंपनियों पर पड़ा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने इसी गिरावट को खरीदारी के अवसर के रूप में देखा। HDFC Bank, ICICI Bank, Axis Bank और SBI जैसे बड़े बैंकों की कीमतें अपने ऐतिहासिक मूल्यांकन की तुलना में कई निवेशकों को आकर्षक लग रही हैं। बैंकिंग क्षेत्र में खराब कर्ज यानी NPA भी लंबे समय के निचले स्तर के आसपास हैं। फिर भी निवेशकों को जमा की धीमी वृद्धि, बैंकों के लिए पैसा जुटाने की बढ़ती लागत और ब्याज से होने वाली कमाई के मार्जिन को लेकर चिंता है। यानी बैंक मजबूत जरूर हैं, लेकिन बाजार भविष्य की चुनौतियों को भी कीमत में शामिल कर रहा है। घरेलू निवेशकों का दांव यह है कि वर्तमान कमजोरी अस्थायी है और मजबूत बैंकों की बुनियादी स्थिति अभी भी अच्छी है।

विदेशी निवेशकों का जाना फिर भी चिंता की बात क्यों है?

यह मान लेना भी गलत होगा कि अब भारत को विदेशी निवेश की जरूरत ही नहीं है। घरेलू SIP कितनी भी मजबूत हो जाए, दुनिया की वित्तीय व्यवस्था से भारत अलग नहीं रह सकता। यदि विदेशी निवेशक लंबे समय तक लगातार पैसा निकालते रहे तो बाजार की नकदी, रुपये, कंपनियों की फंड जुटाने की क्षमता और शेयरों के मूल्यांकन पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर यदि पश्चिम एशिया का तनाव लंबा चलता है और कच्चा तेल महंगा होता है तो भारत के लिए समस्या बढ़ सकती है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल विदेश से खरीदता है। अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजार में जोखिम लेने के बजाय अमेरिकी बॉन्ड में अपेक्षाकृत सुरक्षित रिटर्न पसंद कर सकते हैं। इसलिए घरेलू निवेश ने भारत को मजबूत कवच जरूर दिया है, लेकिन यह कवच दुनिया के हर आर्थिक झटके से पूरी सुरक्षा नहीं दे सकता।

भारत की रिकवरी का नया चेहरा—फैक्ट्री और घरेलू पैसा

आज भारतीय अर्थव्यवस्था में दो तस्वीरें एक साथ दिखाई दे रही हैं। पहली तस्वीर फैक्ट्रियों की है—मशीनें चल रही हैं, मैन्युफैक्चरिंग बढ़ रही है, कैपिटल गुड्स की मांग मजबूत है और कुछ उद्योग दो अंकों की रफ्तार से बढ़ रहे हैं। दूसरी तस्वीर शेयर बाजार की है—विदेशी पैसा बाहर जा रहा है, लेकिन भारतीय निवेशक अपने पैसे से बाजार को संभाल रहे हैं। इन दोनों को जोड़कर देखें तो भारत की रिकवरी का एक नया चेहरा उभरता है। विकास को सरकारी पूंजीगत खर्च और घरेलू उत्पादन सहारा दे रहे हैं, जबकि वित्तीय बाजार को घरेलू बचत की नई ताकत मिल रही है। इसका मतलब यह नहीं कि सारी समस्याएं खत्म हो गईं। बल्कि इसका मतलब यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर अपने पैरों पर खड़े होने की क्षमता पहले से कुछ मजबूत हुई है।

असली परीक्षा अब यह है कि आम आदमी तक यह तेजी कब पहुंचेगी

आखिर में किसी भी अर्थव्यवस्था की सफलता Sensex, Nifty, IIP या मैन्युफैक्चरिंग के प्रतिशत से नहीं मापी जा सकती। आम आदमी के लिए अर्थव्यवस्था का अर्थ बहुत सीधा है—नौकरी मिल रही है या नहीं, वेतन बढ़ रहा है या नहीं, राशन कितना महंगा है, बच्चों की पढ़ाई और इलाज का खर्च कितना है और महीने के अंत में जेब में कुछ बच रहा है या नहीं। यदि फैक्ट्रियों का उत्पादन 7.3 प्रतिशत बढ़े लेकिन रोजगार उसी गति से न बढ़े, यदि कंपनियों की बिक्री बढ़े लेकिन परिवार महंगाई से परेशान रहें, तो आंकड़ों की चमक जमीन पर फीकी पड़ जाती है। इसलिए जून के आंकड़ों पर खुश होना चाहिए, लेकिन संतुष्ट नहीं होना चाहिए। भारत को ऐसी औद्योगिक वृद्धि चाहिए जो रोजगार पैदा करे, छोटे उद्योगों तक पहुंचे, गांवों की आय बढ़ाए और मध्यम वर्ग की खरीदने की ताकत मजबूत करे।

कहानी अच्छी है, लेकिन अभी इसका अंत लिखना बाकी है

जून 2026 के औद्योगिक आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में दम है। विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद घरेलू निवेशकों का बाजार संभालना बताता है कि भारत की वित्तीय ताकत भी बदल रही है। लेकिन पश्चिम एशिया का संकट, महंगा तेल, अमेरिकी ब्याज दरें, कमजोर वैश्विक मांग, महंगाई और ग्रामीण खपत जैसी चुनौतियां सामने खड़ी हैं। इसलिए आज न तो निराश होने की जरूरत है और न विजय का ढोल पीटने की। फैक्ट्रियों का बढ़ता उत्पादन अच्छी खबर है, विदेशी पैसे पर घटती निर्भरता उससे भी महत्वपूर्ण बदलाव है, लेकिन भारत की आर्थिक रिकवरी तभी मजबूत मानी जाएगी जब फैक्ट्री की तेजी बाजार की मांग, रोजगार और आम परिवार की जेब तक पहुंचे।

यही भारत की अर्थव्यवस्था की नई कहानी है—फैक्ट्रियां बढ़ रही हैं, विदेशी पैसा घट रहा है और घरेलू निवेशक पहले से कहीं बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। सवाल केवल इतना है कि क्या यह नई ताकत लंबे समय तक टिक पाएगी? आने वाले कुछ महीने इसका जवाब देंगे।

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