अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बिश्केक | 1 सितंबर 2026
दुनिया के कई हिस्से जब युद्ध, बारूद और बढ़ते सैन्य तनाव की चपेट में हैं, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मुलाकात में भारत की उस सभ्यतागत सोच को सामने रखा, जो हजारों वर्षों से शांति, संवाद और मानवता का संदेश देती आई है। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में SCO शिखर सम्मेलन से इतर हुई मोदी-पुतिन मुलाकात में प्रधानमंत्री ने एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश दिया कि मानवता के हित में दुनिया को ‘अंतहीन युद्ध’ से निकलकर ‘युद्ध के अंत’ की ओर बढ़ना होगा। मोदी ने संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को ही आगे बढ़ने का रास्ता बताया। यह संदेश ऐसे समय आया है जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युद्ध की लपटें केवल सीमाओं को नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और आम इंसान की जिंदगी को भी प्रभावित कर रही हैं।
मोदी और पुतिन की मुलाकात ऐसे दौर में हुई जब पश्चिम एशिया में तनाव फिर बढ़ रहा है और रूस-यूक्रेन संघर्ष का असर काला सागर क्षेत्र की सुरक्षा और समुद्री व्यापार पर भी दिखाई दे रहा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए और गंभीर है क्योंकि इन संघर्षों का असर भारतीय समुद्री यात्रियों की सुरक्षा तक पहुंच रहा है। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया और काला सागर क्षेत्र के संघर्षों पर विस्तार से विचार साझा किए। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर भारत की चिंता भी सामने रखी। उनका संदेश स्पष्ट था कि युद्ध का विस्तार किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं को जन्म देता है और इसलिए संवाद तथा कूटनीति को प्राथमिकता देना जरूरी है।
प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत में भारत-रूस संबंधों की मजबूती भी प्रमुख विषय रही। उन्होंने कहा कि दोनों देशों की ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ लगातार मजबूत हो रही है और विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। ऊर्जा, नवाचार, अंतरिक्ष, उर्वरक और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क भारत-रूस मित्रता के प्रमुख आधार बने हुए हैं। वैश्विक शक्ति-संतुलन तेजी से बदल रहा है, लेकिन इस बदलती दुनिया में भारत और रूस अपने पुराने रणनीतिक संबंधों को नई परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यानी बातचीत की मेज पर एक तरफ शांति और युद्ध समाप्त करने की जरूरत थी तो दूसरी तरफ भारत के राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बनाए रखने की चुनौती भी थी।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी भारत के साथ संबंधों को लेकर सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहा है। उनके मुताबिक दोनों देशों का व्यापार 2 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है, जबकि वर्ष 2025 में भारत और रूस के बीच पर्यटन आदान-प्रदान में 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई। शिक्षा के क्षेत्र में भी दोनों देशों के संबंध लगातार गहरे हुए हैं। पुतिन ने बताया कि पिछले एक दशक में रूस में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या लगभग सात गुना बढ़ी है और वर्तमान में करीब 40 हजार भारतीय छात्र रूस में अध्ययन कर रहे हैं। यह तस्वीर बताती है कि भारत-रूस संबंध केवल राजनीतिक या सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, पर्यटन, व्यापार और लोगों के बीच संपर्क तक उनका विस्तार हो चुका है।
दोनों नेताओं की बातचीत में आगामी BRICS शिखर सम्मेलन भी महत्वपूर्ण मुद्दा रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वह 12 और 13 सितंबर को दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति पुतिन का स्वागत करने के लिए उत्सुक हैं। बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और आर्थिक दबावों के बीच BRICS की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में दिल्ली में होने वाली यह बैठक भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण की बदलती भूमिका और भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं को सामने रखने का महत्वपूर्ण मंच भी होगी। मोदी-पुतिन की बिश्केक बातचीत ने इस आगामी बैठक के लिए भी माहौल तैयार कर दिया है।
इस मुलाकात की पृष्ठभूमि में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की 24 अगस्त की मॉस्को यात्रा भी महत्वपूर्ण रही थी। उस दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने संकेत दिया था कि वह SCO सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात करेंगे और इसके बाद दिल्ली में होने वाले BRICS सम्मेलन में भी दोनों नेताओं की बातचीत होगी। अब बिश्केक में मोदी और पुतिन की मुलाकात हो चुकी है और सितंबर में दिल्ली में दोनों नेताओं की अगली मुलाकात की संभावनाओं ने इस कूटनीतिक संवाद को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
राष्ट्रपति पुतिन ने SCO की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संगठन ग्लोबल साउथ और पूर्व के देशों के बीच संपर्क मजबूत करने, क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा देने तथा एक न्यायपूर्ण बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण में योगदान देता है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अगले वर्ष भारत और रूस के राजनयिक संबंधों की स्थापना के 80 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। यह अवसर दोनों देशों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि भारत और रूस के रिश्तों ने शीत युद्ध से लेकर आज की बहुध्रुवीय दुनिया तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं। परिस्थितियां बदलीं, वैश्विक समीकरण बदले, लेकिन दोनों देशों के बीच संवाद और रणनीतिक संबंध कायम रहे।
हालांकि, पूरी मुलाकात में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला संदेश प्रधानमंत्री मोदी का युद्ध को लेकर बयान रहा। ‘Endless War’ से ‘End of War’ की ओर बढ़ने का आह्वान केवल कूटनीतिक शब्दों का इस्तेमाल नहीं था, बल्कि युद्ध से परेशान दुनिया के सामने एक वैकल्पिक रास्ते की जरूरत को रेखांकित करता है। युद्ध शुरू करना शायद आसान हो सकता है, लेकिन युद्ध को समाप्त करना कहीं अधिक कठिन होता है। इसके बीच सैनिकों की जान जाती है, नागरिक उजड़ते हैं, परिवार बिखरते हैं, अर्थव्यवस्थाएं कमजोर होती हैं और आने वाली पीढ़ियों तक संघर्ष के घाव पहुंचते हैं। ऐसे समय में भारत का संवाद और कूटनीति पर जोर दुनिया को यह याद दिलाता है कि किसी भी विवाद का अंतिम लक्ष्य जीत नहीं, बल्कि टिकाऊ शांति होना चाहिए।
भारत की यह सोच उसकी सभ्यतागत विरासत से भी जुड़ती है। महात्मा गांधी का अहिंसा का संदेश और भगवान बुद्ध का करुणा, शांति और मानवता का मार्ग भारत की उस परंपरा को सामने रखते हैं जिसमें शक्ति का अर्थ केवल हथियारों की ताकत नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी संवाद का रास्ता खुला रखने की क्षमता है। प्रधानमंत्री मोदी का ‘युद्ध के अंत’ की ओर बढ़ने का संदेश इसी व्यापक भारतीय दृष्टिकोण की आधुनिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। दुनिया टकराव में उलझी हो, तब भी बातचीत का दरवाजा बंद नहीं होना चाहिए।
पश्चिम एशिया का संकट हो या काला सागर में जारी तनाव, आज के दौर में किसी एक क्षेत्र का युद्ध केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। समुद्री व्यापार प्रभावित होता है, ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है, खाद्य और ईंधन की कीमतों पर असर पड़ता है और अंततः इसका बोझ आम आदमी की जिंदगी पर आता है। भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। इसलिए भारत के लिए शांति केवल एक नैतिक अपील नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित, आर्थिक सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और मानवीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
मोदी-पुतिन की बिश्केक मुलाकात ने इसी व्यापक तस्वीर को सामने रखा—एक ओर दुनिया में बढ़ता तनाव और युद्ध, दूसरी ओर भारत और रूस के बीच मजबूत रणनीतिक साझेदारी और तीसरी ओर भारत की ओर से शांति तथा संवाद का स्पष्ट संदेश। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह ‘अंतहीन युद्ध’ से ‘युद्ध के अंत’ की बात कही, उसमें एक सीधा और मानवीय संदेश छिपा है—युद्ध जितना लंबा होगा, उसकी कीमत उतनी ही बड़ी होगी और संवाद जितनी जल्दी शुरू होगा, शांति की संभावना उतनी ही मजबूत होगी।
आखिरकार मोदी-पुतिन मुलाकात की सबसे बड़ी तस्वीर यही है कि जब दुनिया के कई हिस्सों में हथियार बोल रहे हैं, तब भारत बातचीत की आवाज को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। गांधी की अहिंसा, बुद्ध की करुणा और भारत की संवाद की परंपरा से निकलता यह संदेश आज की दुनिया के लिए बेहद प्रासंगिक है—मानवता की असली जीत किसी दूसरे देश को हराने में नहीं, बल्कि युद्ध को रोकने और शांति को कायम करने में है।




