ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 अक्टूबर 2026
देश के बच्चे तक आज यह सवाल पूछ रहे हैं कि लोकतंत्र में जनता के वोट की कीमत क्या रह गई है और अगर मतदाता सूची पर ही सवाल उठने लगें, तो आम नागरिक अपने अधिकारों पर भरोसा कैसे करे? SIR के नाम पर मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर उठी चिंताओं, राहुल गांधी के वोट चोरी संबंधी आरोपों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही की मांग ने देश की राजनीति को गरमा दिया है। कांग्रेस, विपक्षी दल, CJP और सड़कों पर उतर रहे जन आंदोलन ने इस मुद्दे को अलग-अलग मोर्चों पर उठाया है। अब यह केवल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली का सवाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता के भरोसे का सवाल बन चुका है।
जब बच्चों तक को समझ आने लगे सवाल
लोकतंत्र का भविष्य केवल आज की सरकार से नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से तय होता है। अगर बच्चे यह पूछने लगें कि वोट क्यों कटते हैं, चुनावी प्रक्रिया पर विवाद क्यों होता है और अपनी बात रखने के लिए लोगों को सड़कों पर क्यों उतरना पड़ता है, तो यह समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। सरकार किसी भी दल की हो, उसकी पहली जिम्मेदारी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। सत्ता की असली परीक्षा आलोचना सुनने, सवालों का जवाब देने और गलतियों को सुधारने में होती है।
आज विपक्ष का कहना है कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े विवादों ने चुनावी निष्पक्षता पर संदेह पैदा किया है। इस संदेह को दूर करना चुनाव आयोग और सरकार की जिम्मेदारी है। जनता को भाषण नहीं, स्पष्ट आंकड़े चाहिए—कितने नाम हटाए गए, किन आधारों पर हटाए गए, कितने पात्र मतदाताओं ने शिकायत की और कितनों के नाम बहाल हुए। जब तक इन सवालों का भरोसेमंद जवाब नहीं मिलता, विवाद खत्म होने वाला नहीं है।
राहुल गांधी से CJP तक, कई मोर्चों पर चुनौती
राहुल गांधी ने महादेवपुरा और अलंद में कथित वोट अनियमितताओं के उदाहरण देकर पहले भी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। अब SIR को लेकर उनका और कांग्रेस का विरोध तेज हुआ है। विपक्षी दल ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही और इस्तीफे की मांग उठा रहे हैं, जबकि CJP और जन आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारी भी सड़कों पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। विपक्ष ने न्यायिक रास्ता अपनाने की बात भी आगे बढ़ाई है।
इस तरह सरकार के सामने राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक—तीनों स्तरों पर सवाल खड़े हैं। इन सभी समूहों के विचार और रणनीतियां एक जैसी हों, यह जरूरी नहीं; लेकिन मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का मुद्दा उन्हें एक साझा बहस में ला रहा है। सरकार यदि इस आवाज को केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज करती है, तो वह उस मूल सवाल से बच नहीं सकती कि हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित कैसे रहेगा।
जन आंदोलन को कुचलने की कोशिश क्यों?
जब नागरिक अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं, तो प्रशासन की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ उनके अधिकारों की रक्षा करना भी है। यदि प्रदर्शनकारियों या पत्रकारों के साथ गैरकानूनी कार्रवाई हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होनी चाहिए। विरोध की आवाज को दबाने के बजाय उससे उठे सवालों का जवाब देना ही लोकतांत्रिक रास्ता है।
सरकार की आलोचना करने वाले इसे जन आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। उनका सवाल है कि यदि चुनाव आयोग की प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी है, तो हर गंभीर शिकायत का तथ्यात्मक जवाब देने और जांच कराने में हिचकिचाहट क्यों होनी चाहिए? सरकार और आयोग को इस सवाल का उत्तर व्यवहार से देना होगा—नागरिकों के अधिकार सुरक्षित करके, पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से काम करने देकर और शिकायतों पर कार्रवाई करके।
‘राजा की जान तोते में है’—यह सवाल क्यों उठ रहा है?
राजनीतिक बहस में यह कहावत तब इस्तेमाल होती है, जब किसी ताकतवर व्यक्ति की पूरी चिंता किसी एक कमजोर कड़ी या किसी खास व्यक्ति को बचाने के इर्द-गिर्द दिखाई देने लगे। मौजूदा विवाद में विपक्ष का सवाल है कि ज्ञानेश कुमार की भूमिका और चुनावी प्रक्रिया पर उठे सवालों को लेकर केंद्र सरकार का रुख इतना महत्वपूर्ण क्यों बन गया है। क्या सरकार और आयोग स्वतंत्र जांच तथा पारदर्शी जवाब देने को तैयार हैं? यही वह कसौटी है, जिस पर उनकी विश्वसनीयता परखी जाएगी।
यह कहना कि किसी व्यक्ति को बचाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लगी है, एक गंभीर राजनीतिक आरोप है। इसे साबित करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। लेकिन इतना जरूर है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ सवाल उठने पर पद की प्रतिष्ठा का हवाला देकर जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता। यदि ज्ञानेश कुमार के फैसलों में कोई अनियमितता हुई है, तो जांच होनी चाहिए; यदि नहीं हुई, तो आयोग को दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
क्या बीजेपी को सत्ता से हटाना ही समाधान है?
बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने की मांग विपक्षी राजनीति का हिस्सा हो सकती है, लेकिन किसी सरकार का बने रहना या बदलना अंततः लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाताओं के फैसले से तय होता है। देश के भविष्य की रक्षा का वास्तविक आधार निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र संस्थाएं, जवाबदेह सरकार और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा है। सत्ता परिवर्तन की मांग करने वालों को भी अपने तर्क और कार्यक्रम जनता के सामने रखने होंगे; वहीं सत्तारूढ़ दल को यह सुनिश्चित करना होगा कि चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कायम रहे।
यदि मतदाता सूची में जानबूझकर गड़बड़ी के प्रमाण मिलते हैं, तो जिम्मेदार लोगों पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी चुनाव के नतीजे गंभीर अनियमितताओं से प्रभावित हुए हों, तो सक्षम संस्थाओं को कानून के तहत उचित फैसला करना चाहिए। लोकतंत्र में न किसी नेता को विशेष छूट है, न किसी पार्टी को स्थायी अधिकार।
फैसला जनता के अधिकार का होगा
राहुल गांधी, कांग्रेस, विपक्ष, CJP और जन आंदोलन ने SIR तथा चुनाव आयोग की जवाबदेही के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। यह दबाव आगे कितना बढ़ेगा और उसका राजनीतिक परिणाम क्या होगा, यह अभी तय नहीं है। लेकिन सरकार के लिए यह स्पष्ट है कि मतदाता सूची और चुनावी निष्पक्षता पर उठे सवालों को अनदेखा करके जनता का भरोसा नहीं जीता जा सकता।
राजा की जान तोते में है या नहीं, इसका फैसला नारों से नहीं, तथ्यों और जवाबदेही से होगा। लेकिन लोकतंत्र की जान जनता के वोट में है—और उस वोट की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।



