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दिल्ली में पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट पहुँचे सांसद ए.ए. रहीम—‘अवैध हिरासत, गुप्त परिवहन और यातना’ की स्वतंत्र जांच की मांग

DYFI के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ 11 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस में हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर राज्यसभा सांसद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी बनाया पक्षकार; दिशानिर्देश, स्वतंत्र जांच और मुआवजे की मांग।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 अक्टूबर 2026

दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम ने 11 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) के पदाधिकारियों, केंद्रीय समिति के सदस्यों और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने के मामले में याचिका दाखिल की है। याचिका में अवैध हिरासत, विशेष रूप से तैयार किए गए अलग-अलग खानों वाले वाहनों में गुप्त रूप से ले जाने और हिरासत के दौरान यातना दिए जाने के आरोप लगाए गए हैं। सांसद ने इस कार्रवाई को किसी एक अधिकारी की अचानक की गई हरकत के बजाय सुनियोजित और जानबूझकर की गई कार्रवाई बताया है।

गृह मंत्रालय को बनाया पक्षकार

ए.ए. रहीम ने अधिवक्ता सुभाष चंद्रन के.आर. के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। याचिका में केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को पक्षकार बनाया गया है। सांसद ने अदालत से इस मामले में स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने, स्वतंत्र जांच कराने और प्रभावित लोगों को मुआवजा देने की मांग की है।

याचिका का मुख्य सवाल यह है कि क्या पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने और उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के दौरान कानून और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया। यदि हिरासत अवैध थी या हिरासत में किसी तरह की शारीरिक प्रताड़ना हुई, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग की गई है।

‘सुनियोजित कार्रवाई’ का आरोप

सांसद की याचिका में कहा गया है कि 11 अक्टूबर को हुई कार्रवाई कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि शारीरिक प्रताड़ना देने के उद्देश्य से योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दी गई। याचिका में विशेष वाहनों के जरिए प्रदर्शनकारियों को ले जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र जांच महत्वपूर्ण होगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि हिरासत किन परिस्थितियों में हुई, पुलिस ने कौन-सी कानूनी प्रक्रिया अपनाई और हिरासत में लिए गए लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया गया। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामले में तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच जरूरी है।

प्रदर्शन और नागरिक अधिकारों पर बढ़ती बहस

दिल्ली में 10 और 11 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के बाद पुलिस कार्रवाई, हिरासत और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के बीच विपक्षी दलों तथा विभिन्न संगठनों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल यह याचिका ऐसे समय आई है, जब प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और पुलिस की जवाबदेही को लेकर कई स्तरों पर सवाल उठ रहे हैं। अदालत पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था और कानून का पालन भी जरूरी है।

अब जांच और जवाबदेही पर नजर

ए.ए. रहीम की याचिका में स्वतंत्र जांच, बाध्यकारी दिशानिर्देश और मुआवजे की मांग की गई है। अब इस मामले में अदालत की कार्यवाही और संबंधित पक्षों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे। स्वतंत्र जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि हिरासत और परिवहन की प्रक्रिया में कोई कानूनी उल्लंघन हुआ या नहीं और यदि हुआ, तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है।

लोकतंत्र में पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कानून की सीमाओं के भीतर ही इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि अवैध हिरासत या हिरासत में यातना के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई और पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए।

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