स्वास्थ्य/ लाइफस्टाइल | मौबनि मजूमदार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली 5 अप्रैल 2025
भारत में मोबाइल और इंटरनेट: सुविधा से आदत, आदत से लत
मोबाइल फोन कभी सिर्फ सुविधा था, लेकिन आज यह हमारी दिनचर्या का ऐसा हिस्सा बन चुका है जिसके बिना जीवन अधूरा सा लगता है। सुबह आंख खुलते ही स्क्रीन देखना और रात को सोने से पहले आखिरी बार मोबाइल चेक करना अब आम व्यवहार बन गया है, जो धीरे-धीरे आदत से लत में बदल रहा है। भारत में डिजिटल क्रांति ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। आज लगभग 75–80% आबादी के पास मोबाइल है और करीब 55–60% लोग इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। सस्ते डेटा और सोशल मीडिया ने लोगों को हर समय ऑनलाइन रहने की आदत डाल दी है। औसतन एक भारतीय 4–5 घंटे रोज स्क्रीन पर बिताता है, जबकि युवाओं में यह समय 7–8 घंटे तक पहुंच जाता है। यही बढ़ता स्क्रीन टाइम अब मानसिक तनाव, नींद की कमी और ध्यान भटकने जैसी समस्याओं की बड़ी वजह बनता जा रहा है।
नींद और डिप्रेशन: भारत में कितनी गंभीर है स्थिति
भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। अध्ययनों के अनुसार:
1. लगभग 14–15% भारतीय किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित हैं
2. डिप्रेशन के मामले 5–7% आबादी में पाए जाते हैं
3. नींद न आने (इंसोम्निया) की समस्या 20–30% लोगों में देखी जा रही है
डॉक्टर काजी गजवान का कहना है कि इन समस्याओं में मोबाइल और स्क्रीन टाइम की बड़ी भूमिका है। देर रात तक मोबाइल चलाने से मेलाटोनिन हार्मोन प्रभावित होता है, जिससे नींद की गुणवत्ता खराब होती है और धीरे-धीरे व्यक्ति तनाव और डिप्रेशन की ओर बढ़ सकता है।
महिलाओं और पुरुषों में असर: किस पर ज्यादा प्रभाव?
मोबाइल एडिक्शन और सोशल मीडिया का असर महिलाओं और पुरुषों पर अलग-अलग तरीके से दिखता है:
1. महिलाओं में डिप्रेशन के लगभग 30–35% मामलों में सोशल मीडिया उपयोग एक बड़ा कारण माना जा रहा है
2. पुरुषों में यह आंकड़ा 20–25% के आसपास है
3. महिलाएं अक्सर सोशल तुलना (comparison), बॉडी इमेज और ऑनलाइन ट्रोलिंग से ज्यादा प्रभावित होती हैं
4. पुरुषों में गेमिंग एडिक्शन और डिजिटल ओवरलोड अधिक देखा जाता है
यानी मोबाइल का प्रभाव दोनों पर है, लेकिन कारण और असर का स्वरूप अलग-अलग है।
किस उम्र में सबसे ज्यादा खतरा?
1. मोबाइल एडिक्शन सबसे ज्यादा 15 से 35 वर्ष के लोगों में पाया जा रहा है।
2. टीनएजर्स (15–19 वर्ष): सोशल मीडिया और गेमिंग की लत
3. युवा (20–30 वर्ष): काम, रिलेशनशिप और डिजिटल लाइफ का दबाव
4. 30–40 वर्ष: वर्क फ्रॉम होम और लगातार ऑनलाइन रहने की मजबूरी
5. बच्चों में भी यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, जहां कम उम्र में ही स्क्रीन टाइम 3–4 घंटे तक पहुंच रहा है। इससे उनका मानसिक और सामाजिक विकास प्रभावित हो रहा है।
दुनिया बनाम भारत: कौन आगे, कौन पीछे? अगर वैश्विक आंकड़ों से तुलना करें तो भारत की स्थिति तेजी से बिगड़ती श्रेणी में है:
1. अमेरिका और यूरोप में औसत स्क्रीन टाइम 6–7 घंटे प्रतिदिन है
2. दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में डिजिटल एडिक्शन पहले से ही एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है
3. भारत में यह समस्या अभी “उभरती हुई” मानी जाती है, लेकिन इसकी रफ्तार बहुत तेज है
4. अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया में लगभग 25–30% लोग डिजिटल एडिक्शन के लक्षण दिखा रहे हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा तेजी से इसी स्तर की ओर बढ़ रहा है।
सरकारें भी सतर्क: ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और भारत के कदम
1. मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कई देशों ने सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
2. Australia में बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त नियमों और संभावित बैन की चर्चा तेज हुई है
3. Germany में डिजिटल वेलबीइंग और स्क्रीन टाइम नियंत्रण को लेकर नीतियां बनाई जा रही हैं
4. भारत में Karnataka सरकार ने भी बच्चों के स्क्रीन टाइम और ऑनलाइन कंटेंट पर नियंत्रण के लिए पहल शुरू की है
यह संकेत है कि समस्या अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि नीति स्तर का मुद्दा बन चुकी है।
मोबाइल एडिक्शन के लक्षण: क्या आप भी शिकार हैं? अगर कोई व्यक्ति:
1. बार-बार बिना वजह मोबाइल चेक करता है
2. मोबाइल दूर होने पर बेचैनी महसूस करता है
3. परिवार और दोस्तों से दूरी बनाने लगता है
4. नींद और ध्यान में कमी महसूस करता है
तो यह मोबाइल एडिक्शन के स्पष्ट संकेत हो सकते हैं। इसे नोमोफोबिया भी कहा जाता है।
कैसे कम करें स्क्रीन टाइम? आसान लेकिन असरदार उपाय? मोबाइल एडिक्शन से बचना मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। कुछ व्यावहारिक कदम मदद कर सकते हैं:
1. स्क्रीन टाइम लिमिट सेट करें (प्रतिदिन 2–3 घंटे)
2. सोने से कम से कम 1 घंटा पहले मोबाइल बंद करें
3. अनावश्यक नोटिफिकेशन ऑफ करें
4. सप्ताह में एक दिन डिजिटल डिटॉक्स रखें
5. मोबाइल की जगह किताब, एक्सरसाइज या आउटडोर गतिविधियां अपनाएं
6. “नो फोन ज़ोन” बनाएं—जैसे बेडरूम या डाइनिंग टेबल
7. मोबाइल आप पर हावी न हो—इसके लिए क्या जरूरी है?
8. मोबाइल को नियंत्रित करने के लिए सिर्फ नियम नहीं, मानसिक अनुशासन जरूरी है।
9. खुद तय करें कि मोबाइल आपका टूल है, मालिक नहीं
10. समय का स्पष्ट बंटवारा करें—काम, परिवार और डिजिटल
11. सोशल मीडिया तुलना से बचें
12. वास्तविक रिश्तों को प्राथमिकता दें
13. अपने दिमाग को “डोपामाइन ब्रेक” दें यानी लगातार उत्तेजना से दूर रखें
संतुलन ही समाधान
मोबाइल फोन आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। भारत में तेजी से बढ़ते स्क्रीन टाइम और डिप्रेशन के मामलों को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि हम समय रहते सतर्क हो जाएं। डिजिटल दुनिया जरूरी है, लेकिन असली दुनिया उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर संतुलन बना लिया जाए तो मोबाइल वरदान है, लेकिन अगर नियंत्रण खो दिया जाए तो यही सबसे बड़ा नुकसान बन सकता है।




