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कॉमनवेल्थ गेम्स में मीराबाई चानू का स्वर्णिम इतिहास, लगातार तीसरी बार जीता गोल्ड

खेल | ABC NATIONAL NEWS | ग्लासगो | 26 जुलाई 2026

ग्लासगो में चल रहे 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की स्टार वेटलिफ्टर Mirabai Chanu ने एक बार फिर देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। महिलाओं के 48 किग्रा भार वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए मीराबाई ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके साथ ही उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार तीसरा गोल्ड जीतकर उपलब्धियों की अपनी लंबी सूची में एक और ऐतिहासिक अध्याय जोड़ दिया।

रविवार को हुए मुकाबले में मीराबाई जिस आत्मविश्वास के साथ उतरीं, उससे शुरुआत में ही साफ हो गया था कि उन्हें चुनौती देना आसान नहीं होगा। मुकाबले में सवाल यह कम था कि स्वर्ण पदक कौन जीतेगा और ज्यादा यह कि मीराबाई अपने प्रदर्शन को किस ऊंचाई तक ले जाएंगी। उन्होंने भी उम्मीदों को टूटने नहीं दिया और ताकत, तकनीक तथा मानसिक मजबूती का शानदार मेल दिखाते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा कर लिया।

मीराबाई की इस जीत की खासियत केवल गोल्ड मेडल नहीं है। लगातार तीन कॉमनवेल्थ गेम्स में शीर्ष पर रहना किसी भी खिलाड़ी के लिए असाधारण उपलब्धि है। खेलों में एक बार चैंपियन बनना कठिन होता है, लेकिन वर्षों तक खुद को उसी स्तर पर बनाए रखना उससे भी मुश्किल। उम्र, चोट, फिटनेस, बदलती प्रतिस्पर्धा और उम्मीदों के भारी दबाव के बावजूद मीराबाई ने साबित किया है कि उनमें अभी भी बड़े मंच पर भारत के लिए पदक जीतने का वही दम मौजूद है।

मणिपुर से निकली मीराबाई का सफर भारतीय खेलों की सबसे प्रेरक कहानियों में गिना जाता है। सीमित संसाधनों से शुरुआत कर विश्व स्तर तक पहुंचने वाली इस खिलाड़ी ने वर्षों की मेहनत से भारतीय वेटलिफ्टिंग को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। ओलंपिक से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक उन्होंने बार-बार साबित किया है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और अनुशासन के सामने कठिन परिस्थितियां भी छोटी पड़ सकती हैं।

ग्लासगो में उनका प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक स्थापित चैंपियन पर अपेक्षाओं का दबाव सामान्य खिलाड़ी से कहीं अधिक होता है। मीराबाई जब मंच पर उतरती हैं तो उनसे सिर्फ पदक की नहीं, स्वर्ण पदक की उम्मीद की जाती है। इस बार भी करोड़ों भारतीयों की निगाहें उन पर थीं। लेकिन दबाव उनके चेहरे या प्रदर्शन पर हावी होता दिखाई नहीं दिया। उन्होंने संयम बनाए रखा और निर्णायक क्षणों में चैंपियन की तरह प्रदर्शन किया।

मीराबाई की उपलब्धि भारतीय महिला खिलाड़ियों की लगातार बढ़ती ताकत की कहानी भी कहती है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय महिलाओं ने ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियाई खेलों और विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में देश को कई यादगार सफलताएं दिलाई हैं। मीराबाई उस बदलाव के सबसे चमकदार चेहरों में शामिल हैं। उनकी सफलता छोटे शहरों, गांवों और दूरदराज के इलाकों में खेलों का सपना देख रही हजारों लड़कियों को यह भरोसा देती है कि अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना असंभव नहीं है।

इस गोल्ड के साथ मीराबाई ने कॉमनवेल्थ गेम्स में अपनी बादशाहत को और मजबूत कर लिया है। लगातार तीसरा स्वर्ण पदक इस बात का प्रमाण है कि भारतीय वेटलिफ्टिंग में उनका स्थान केवल वर्तमान की सफल खिलाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि देश की महानतम भारोत्तोलकों में है।

अब नजर इस बात पर भी रहेगी कि आने वाली बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मीराबाई अपनी इस शानदार लय को किस तरह आगे बढ़ाती हैं। उनके सामने नई चुनौतियां होंगी, नई प्रतिद्वंद्वी होंगी और उम्मीदों का दबाव भी बढ़ेगा। लेकिन ग्लासगो की जीत ने एक बात फिर साफ कर दी है—मीराबाई को बड़े मंच पर कभी कम नहीं आंका जा सकता।

तीसरा कॉमनवेल्थ गोल्ड, लगातार तीसरी बार तिरंगा सबसे ऊपर और एक बार फिर देश के लिए गौरव का क्षण—ग्लासगो में मीराबाई चानू ने सिर्फ पदक नहीं जीता, भारतीय खेल इतिहास में अपनी स्वर्णिम विरासत को और मजबूत कर दिया।

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