नई दिल्ली, 19 सितंबर 2025
केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए आदेश को सुप्रीम कोर्ट के अधीन स्थापित ट्राइब्यूनल ने वैध मानते हुए मीरवाइज उमर फारूक की Awami Action Committee (AAC) और मस्रूर अब्बास अंसारी की Jammu & Kashmir Ittihadul Muslimeen (JKIM) पर लगाया गया प्रतिबंध बरकरार रखा। ट्राइब्यूनल ने केंद्र सरकार के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों, दस्तावेजों और गुप्त रिपोर्टों का विस्तृत विश्लेषण किया और पाया कि ये संगठन Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 की धारा 3(1) के अंतर्गत अवैध घोषित किए जाने योग्य हैं। ट्राइब्यूनल ने कहा कि इन समूहों की गतिविधियाँ न केवल अलगाववादी और आतंकवाद समर्थक मानी जा सकती हैं, बल्कि राज्य की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के लिए भी खतरनाक हैं।
पृष्ठभूमि और सरकारी कारण
मार्च 2025 में गृह मंत्रालय ने AAC और JKIM को पांच साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया था। सरकार ने आरोप लगाया कि ये संगठन केवल धार्मिक या सांस्कृतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी गतिविधियों में राष्ट्रविरोधी प्रचार, हिंसा भड़काने और अलगाववादी विचारों का प्रसार शामिल है। सरकार ने यह भी कहा कि ये संगठन जम्मू-कश्मीर में अशांति और अस्थिरता पैदा करने के लिए सक्रिय हैं। AAC के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए इसे “लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला” करार दिया। राजनीतिक विश्लेषकों ने भी इसे क्षेत्रीय राजनीतिक संतुलन और सामाजिक माहौल पर प्रभाव डालने वाला कदम बताया।
ट्राइब्यूनल का तर्क और कानूनी दृष्टिकोण
ट्राइब्यूनल ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों, एनआईए के चार्जशीट और गुप्त खुफिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि AAC और JKIM के कार्य केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्य नहीं हैं। इनकी गतिविधियों में कानून व्यवस्था भंग करने, अलगाववादी भावनाएँ फैलाने और देशविरोधी प्रचार को उकसाने का प्रमाण पाया गया। ट्राइब्यूनल ने यह भी नोट किया कि इन संगठनों ने पूरी समीक्षा प्रक्रिया में सहयोग नहीं किया, जिससे उपलब्ध साक्ष्य और दस्तावेजों के आधार पर प्रतिबंध को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है।
भविष्य और प्रभाव
यह फैसला जम्मू-कश्मीर की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। प्रतिबंधित संगठनों की सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियाँ सीमित होंगी, और उनके प्रभाव को कम करने में यह एक कानूनी आधार प्रदान करेगा। अब ये संगठन अपने हक के लिए न्यायालयों में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का विकल्प चुन सकते हैं, लेकिन फिलहाल केंद्र सरकार को इनकी गतिविधियों पर निगरानी और कार्रवाई के लिए मजबूत कानूनी अधिकार मिल गया है।




