बिजनेस | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 जून 2026
दशकों तक वैश्विक तेल बाजार की धुरी मध्य पूर्व, ओपेक देशों और रूस के इर्द-गिर्द घूमती रही। तेल उत्पादन में कटौती हो, युद्ध छिड़ जाए, किसी देश पर प्रतिबंध लग जाए या होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव पैदा हो—पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर उसका सीधा असर दिखाई देता था। लेकिन ईरान युद्ध और उसके बाद पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट ने एक नया संकेत दिया है। इस बार दुनिया ने महसूस किया कि तेल बाजार की सबसे बड़ी ताकत केवल तेल पैदा करने वाले देशों के पास नहीं, बल्कि उस देश के पास भी हो सकती है जो सबसे ज्यादा तेल खरीदता है। यही वजह है कि अब विशेषज्ञ चीन को दुनिया का नया “ऑयल सुपरपावर” या “ऑयल किंग” कहने लगे हैं। बीजिंग की खरीद नीति अब उतनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है जितनी कभी रियाद, मॉस्को या वॉशिंगटन की हुआ करती थी।
ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाली वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई। अनुमान है कि चरम स्थिति में प्रतिदिन लगभग 1.1 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई, जो वैश्विक तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा है। इतिहास बताता है कि 1973 के अरब ऑयल एम्बार्गो के समय इससे कहीं कम आपूर्ति बाधित होने पर भी तेल की कीमतें 100 प्रतिशत से अधिक उछल गई थीं। इस बार भी आशंका जताई जा रही थी कि कच्चा तेल 180 से 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कीमतों में बढ़ोतरी जरूर हुई, मगर वह अनुमान से काफी कम रही। यही वह बिंदु है जिसने दुनिया भर के ऊर्जा विशेषज्ञों का ध्यान चीन की ओर खींचा।
विश्लेषकों का कहना है कि इस बार चीन ने बाजार में घबराकर तेल खरीदने के बजाय वर्षों से बनाई गई अपनी रणनीति पर भरोसा किया। पिछले कई वर्षों में चीन ने रूस और ईरान से रियायती दरों पर भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर अपने रणनीतिक और व्यावसायिक भंडार भर लिए थे। विभिन्न अनुमानों के अनुसार उसके पास एक अरब बैरल से अधिक का तेल भंडार मौजूद है। जब युद्ध के कारण आपूर्ति प्रभावित हुई, तब चीन ने नए ऑर्डर देने के बजाय अपने इन्हीं भंडारों का उपयोग शुरू कर दिया। परिणाम यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग अचानक घट गई। ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि संकट के दौरान चीन ने अपनी कच्चे तेल की खरीद लगभग 30 लाख बैरल प्रतिदिन तक कम कर दी। इतनी बड़ी मांग कम होने से वैश्विक बाजार पर दबाव घटा और कीमतों में विस्फोटक उछाल नहीं आया।
चीन की ताकत केवल उसके विशाल तेल भंडार तक सीमित नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रिक वाहन बाजार ने भी तेल की मांग को तेजी से कम किया है। आज चीन में बिकने वाले लगभग आधे नए वाहन इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार केवल चीन के इलेक्ट्रिक वाहनों ने ही प्रतिदिन लगभग 10 लाख बैरल तेल की मांग को समाप्त कर दिया है। इसके साथ-साथ चीन ने अपनी कई रिफाइनरियों का उत्पादन घटाया, ईंधन निर्यात को नियंत्रित किया और घरेलू खपत को अधिक संतुलित बनाया। इन सभी कदमों ने मिलकर चीन को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है कि वह चाहे तो अपनी खरीद घटाकर वैश्विक कीमतों को नीचे ला सकता है और चाहे तो अचानक बड़ी खरीद शुरू कर बाजार को ऊपर भी ले जा सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी। युद्ध के दौरान जिन रणनीतिक भंडारों का उपयोग किया गया है, उन्हें आने वाले वर्षों में फिर भरना होगा। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरती हैं तो चीन दोबारा बड़ी मात्रा में खरीद शुरू कर सकता है। उस स्थिति में वैश्विक मांग अचानक बढ़ जाएगी और तेल की कीमतों में फिर तेजी देखने को मिल सकती है। यानी आज दुनिया के तेल बाजार की दिशा केवल मध्य पूर्व की राजनीति या ओपेक के फैसलों से तय नहीं होगी, बल्कि बीजिंग के खरीद आदेशों से भी तय होगी।
भारत जैसे देशों के लिए यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाला हर उतार-चढ़ाव पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, महंगाई, परिवहन लागत और पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। चीन द्वारा तेल खरीद कम करने से भारत को अपेक्षाकृत कम कीमतों का लाभ मिला, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि भविष्य में चीन अपने भंडार भरने के लिए फिर बड़े पैमाने पर खरीद शुरू करता है तो भारत के आयात बिल पर भी उसका असर पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए भी रणनीतिक तेल भंडार का विस्तार करना और ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
वैश्विक ऊर्जा राजनीति अब तेजी से बदल रही है। एक समय था जब तेल बाजार की हर नजर रियाद, तेहरान, मॉस्को और वॉशिंगटन पर रहती थी। अब उसी सूची में बीजिंग सबसे प्रभावशाली केंद्र के रूप में उभर रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक, सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन बाजार, विशाल रणनीतिक भंडार और खरीद बढ़ाने या घटाने की क्षमता—इन सबने चीन को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है जहां उसके फैसले पूरी दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि अब विशेषज्ञ मानने लगे हैं कि आने वाले वर्षों में वैश्विक तेल बाजार की सबसे बड़ी खबर किसी तेल उत्पादक देश से नहीं, बल्कि चीन की खरीद नीति से आएगी। ऊर्जा की दुनिया में शक्ति संतुलन बदल रहा है और इस नए दौर का केंद्र अब तेजी से बीजिंग बनता दिखाई दे रहा है।




