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नेपाल को भारत का दोटूक संदेश: सीमा विवाद में तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं, बातचीत से ही निकलेगा समाधान

विदेश | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 जून 2026

भारत ने नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह के उस बयान पर स्पष्ट और सख्त प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने भारत-नेपाल सीमा विवाद के समाधान के लिए ब्रिटेन और चीन जैसे देशों की संभावित भूमिका का उल्लेख किया था। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने दो टूक शब्दों में कहा है कि भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े सभी मुद्दों के समाधान के लिए स्थापित द्विपक्षीय तंत्र मौजूद हैं और ऐसे मामलों में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं हो सकती।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि भारत और नेपाल के बीच संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं। सीमा विवाद समेत सभी लंबित मुद्दों पर दोनों देशों के बीच नियमित संवाद और संस्थागत व्यवस्था मौजूद है, इसलिए किसी बाहरी शक्ति की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है।

भारत की यह प्रतिक्रिया नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत और नेपाल दोनों के पास एक-दूसरे के कुछ क्षेत्रों को लेकर दावे हैं और सीमा विवाद एक जटिल विषय है। उन्होंने इस मुद्दे के समाधान के लिए चीन और ब्रिटेन जैसे देशों की भूमिका की संभावना का भी जिक्र किया था। शाह के इस बयान ने कूटनीतिक हलकों में चर्चा पैदा कर दी थी, जिसके बाद भारत ने अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट कर दिया।

दरअसल, भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर लंबे समय से सीमा विवाद चला आ रहा है। नेपाल इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता है, जबकि भारत लगातार यह कहता रहा है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड राज्य का अभिन्न हिस्सा हैं। वर्ष 2020 में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपने हिस्से के रूप में दर्शाया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच विवाद और गहरा गया था। हालांकि इसके बावजूद दोनों देशों ने संवाद के रास्ते को खुला रखा और विभिन्न स्तरों पर बातचीत जारी रही।

भारत का मानना है कि पड़ोसी देशों के साथ विवादों का समाधान आपसी विश्वास, कूटनीतिक बातचीत और द्विपक्षीय समझ के जरिए ही संभव है। यही कारण है कि नई दिल्ली हमेशा से किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के विचार को खारिज करती रही है। भारत का यह रुख केवल नेपाल के मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पाकिस्तान सहित अन्य पड़ोसी देशों के साथ विवादों पर भी यही नीति अपनाई जाती रही है।

इस घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब नेपाल की सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (Rastriya Swatantra Party) के अध्यक्ष रवि लामिछाने भारत दौरे पर हैं। अपने दौरे के दौरान उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की और दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत बनाने पर चर्चा की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत ने एक ओर जहां नेपाल के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को महत्व दिया है, वहीं दूसरी ओर सीमा विवाद के मुद्दे पर अपना रुख भी पूरी दृढ़ता से स्पष्ट कर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और नेपाल के बीच संबंध केवल दो देशों के बीच की साझेदारी नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्ते भी जुड़े हुए हैं। लाखों नेपाली नागरिक भारत में रहते और काम करते हैं, जबकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा की व्यवस्था भी है। ऐसे में किसी भी विवाद का समाधान संवाद और सहयोग के माध्यम से ही संभव माना जाता है।

भारत के ताजा बयान को नेपाल के लिए एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि सीमा विवाद पर बातचीत का रास्ता खुला है, लेकिन इसमें किसी तीसरे देश या अंतरराष्ट्रीय शक्ति की भूमिका स्वीकार नहीं की जाएगी। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए इस मुद्दे को आगे बढ़ाने की संभावना बनी हुई है, लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि समाधान केवल द्विपक्षीय ढांचे के भीतर ही तलाशा जाएगा।

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