ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 27 जुलाई 2026
‘फ्रेंड्स’ कहने और युवाओं को सुनने के बीच बहुत बड़ा फर्क है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम के जरिए नई पीढ़ी से संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। Gen Z को ‘फ्रेंड्स’ कहकर संबोधित करने वाली रील्स एक ऐसे प्रधानमंत्री की छवि पेश करती हैं जो युवाओं के साथ सीधा रिश्ता बनाना चाहता है। इसमें अपने आप कोई समस्या नहीं है। समस्या वहां पैदा होती है जहां डिजिटल स्क्रीन पर दिखाई देने वाली दोस्ती और सड़क पर राज्य की कार्रवाई एक-दूसरे के ठीक विपरीत दिखाई देने लगें। 20 जुलाई के संसद मार्च के बाद सामने आई जानकारियां इसी विरोधाभास को बेहद गंभीर बना रही हैं। RAF की आंतरिक समीक्षा में भीड़ नियंत्रण के दौरान अपनाए गए ‘force gradient’ में गंभीर कमियां सामने आने की खबर है। रिपोर्टों के मुताबिक RAF के एक जवान ने पैलेट गन से सात राउंड दागे, जिनमें पांच प्रदर्शनकारियों को लगे और कम से कम तीन लोगों को अस्पताल में इलाज कराना पड़ा। अब सवाल किसी वायरल तस्वीर, विपक्ष के आरोप या प्रदर्शनकारियों की शिकायत भर का नहीं रह गया है। सवाल खुद उस सुरक्षा व्यवस्था के भीतर से निकली समीक्षा का है जिसे भीड़ नियंत्रण में विशेषज्ञ माना जाता है।
RAF की अपनी समीक्षा ने कहा—‘फोर्स ग्रेडिएंट’ तय मानकों के मुताबिक नहीं था
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू है। RAF की आईजी सीमा धुंडिया की अध्यक्षता में 22 जुलाई को हुई आंतरिक समीक्षा के बारे में सामने आई रिपोर्ट कहती है कि 20 जुलाई के ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान अपनाया गया force gradient निर्धारित crowd-control standards और training के अनुरूप नहीं था। अधिकारियों को बाद में निर्देश देना पड़ा कि बल केवल आवश्यकता के अनुपात में, विवेकपूर्ण, संतुलित और संवेदनशील तरीके से इस्तेमाल किया जाए; बल प्रयोग से पहले जरूरी चेतावनी दी जाए और स्थिति के अनुरूप क्रमिक crowd-control measures अपनाए जाएं। इतना ही नहीं, मौजूदा दिल्ली परिस्थिति में PAG, Anti-Riot Gun, Electric Shock Weapon और Electric Shield जारी न करने के निर्देश भी सामने आए। अगर RAF की अपनी समीक्षा ऐसी कमियों की ओर इशारा कर रही है, तो यह केवल निचले स्तर के किसी जवान की गलती बताकर बंद कर देने वाला मामला नहीं रह जाता। तब कमांड और जवाबदेही की पूरी श्रृंखला की जांच जरूरी हो जाती है।
सात राउंड चले, पांच प्रदर्शनकारियों को लगे—तो ट्रिगर दबाने वाले से पहले आदेश देने वाले को खोजिए
जांच में सामने आई सबसे परेशान करने वाली जानकारी यह है कि एक RAF जवान ने कथित तौर पर पैलेट गन से सात राउंड चलाए, जिनमें पांच प्रदर्शनकारियों को लगे और दो जमीन पर लगे। रिपोर्ट के मुताबिक फायरिंग उस समय हुई जब प्रदर्शनकारियों के एक हिस्से द्वारा सुरक्षाकर्मियों पर हमला और पथराव किए जाने की स्थिति बनी। इस संदर्भ को छिपाना नहीं चाहिए—सुरक्षाकर्मियों पर हिंसा हुई तो राज्य को कानूनसम्मत तरीके से अपने कर्मियों और दूसरे नागरिकों की सुरक्षा करनी ही होगी। लेकिन यही वह जगह है जहां सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है: पैलेट गन तक पहुंचने का फैसला किसने लिया? क्या जवान ने स्वयं निर्णय लिया? क्या उसके सेक्शन या कंपनी कमांडर ने अनुमति दी? क्या पहले कम घातक विकल्प आजमाए गए? क्या चेतावनी दी गई? हथियार जारी किस आदेश के तहत हुआ? और यदि निर्धारित force gradient का पालन नहीं हुआ तो कमांड की किस सीढ़ी पर व्यवस्था टूटी? केवल यह पता लगा लेना पर्याप्त नहीं कि बंदूक किस जवान के हाथ में थी; लोकतांत्रिक जवाबदेही यह भी पूछती है कि वह बंदूक उसके हाथ में क्यों थी और उसे चलाने की परिस्थिति किसने बनने दी।
ड्यूटी मजिस्ट्रेट कौन था और उसकी भूमिका क्या थी—यह भी सार्वजनिक होना चाहिए
किसी बड़े राजनीतिक प्रदर्शन में पुलिस और केंद्रीय बल हवा में काम नहीं करते। वहां कमांड संरचना होती है, वरिष्ठ अधिकारी होते हैं, स्थानीय प्रशासन होता है और कानून-व्यवस्था संबंधी निर्णयों की जवाबदेही तय होती है। इसलिए सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि 20 जुलाई को संबंधित इलाकों में कौन-कौन अधिकारी कमांड की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, किस स्तर पर कौन-से crowd-control weapons की अनुमति थी, पैलेट हथियार जारी करने की प्रक्रिया क्या थी और उस प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं। यदि किसी ड्यूटी मजिस्ट्रेट की अनुमति कानूनी या SOP के तहत आवश्यक थी तो वह अनुमति किसने और किन परिस्थितियों में दी—और यदि ऐसी अनुमति आवश्यक नहीं थी, तो वास्तविक authorization chain क्या थी? यहां अनुमान लगाने की जरूरत नहीं है; दस्तावेज सामने रखे जाने चाहिए। यही जांच का काम होना चाहिए।
‘क्या कमांडर कहीं और से आदेश ले रहे थे?’—सवाल गंभीर है, इसलिए जवाब सबूत से चाहिए
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि RAF के अपने निर्धारित मानकों से अलग कार्रवाई हुई तो क्या जमीन पर मौजूद अधिकारियों को किसी दूसरी कमांड अथॉरिटी से निर्देश मिले थे? लेकिन इसे बिना प्रमाण निष्कर्ष में बदल देना भी उचित नहीं होगा। इसका उत्तर केवल स्वतंत्र और दस्तावेजी जांच दे सकती है। 20 जुलाई के deployment orders, briefing notes, wireless logs, command-room records, weapon issue registers, ammunition records, CCTV और body-camera footage जहां उपलब्ध हों, तथा मौके पर मौजूद अधिकारियों के बयान जांचे जाने चाहिए। CRPF के महानिदेशक ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने कहा है कि RAF की कार्रवाई का “professional post-event assessment” किया जाएगा। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन इतने गंभीर मामले में assessment का निष्कर्ष भी सार्वजनिक होना चाहिए। संस्थागत समीक्षा तभी विश्वास पैदा करेगी जब वह यह बताए कि गलती क्या हुई, किस स्तर पर हुई और जिम्मेदारी किसकी थी।
संयुक्त राष्ट्र ने पैलेट गन पर ‘पूर्ण प्रतिबंध’ नहीं लगाया—लेकिन उसके मानक बेहद कड़े हैं
यहां एक तथ्य को ठीक करना भी जरूरी है। यह कहना सटीक नहीं होगा कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने हर परिस्थिति में पैलेट गन के इस्तेमाल पर सार्वभौमिक प्रतिबंध लगा दिया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की 2020 की Guidance on Less-Lethal Weapons in Law Enforcement बल प्रयोग के लिए आवश्यकता, आनुपातिकता, सावधानी और जवाबदेही जैसे कठोर मानक तय करती है और assemblies की policing में विभिन्न less-lethal weapons के वैध तथा अवैध उपयोग की परिस्थितियों को अलग करती है। पैलेट फैलाने वाली shotgun के इस्तेमाल को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की गंभीर चिंता का कारण भी साफ है—एक बार सैकड़ों छोटे projectiles फैलने के बाद यह नियंत्रित करना कठिन होता है कि वे किस व्यक्ति या शरीर के किस हिस्से पर लगेंगे। भारत में ऐसे हथियारों से गंभीर चोट और आंखों की रोशनी जाने के पुराने मामलों ने इस चिंता को और मजबूत किया है। इसलिए 20 जुलाई का प्रश्न केवल यह नहीं कि हथियार तकनीकी रूप से ‘less-lethal’ कहलाता है या नहीं; प्रश्न यह है कि उस परिस्थिति में उसका इस्तेमाल आवश्यक, आनुपातिक और नियंत्रित था या नहीं।
‘Less-lethal’ लिख देने से हथियार मानवीय नहीं हो जाता
भाषा कभी-कभी हिंसा की गंभीरता को ढक देती है। पैलेट गन को ‘non-lethal’ या ‘less-lethal’ कह देने से उससे निकलने वाले छर्रे आंख, चेहरे, गर्दन या दूसरे संवेदनशील हिस्सों को नुकसान पहुंचाना बंद नहीं कर देते। भारत में सुरक्षा बलों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला तथाकथित pellet gun वास्तव में 12-bore pump-action shotgun हो सकता है, जिसकी cartridge बड़ी संख्या में छोटे pellets छोड़ती है। इसीलिए किसी लोकतांत्रिक प्रदर्शन में ऐसे हथियार का इस्तेमाल असाधारण जांच की मांग करता है। Crowd control का उद्देश्य भीड़ को दंडित करना नहीं होता; उद्देश्य खतरे को न्यूनतम आवश्यक बल के साथ नियंत्रित करना है। अगर कुछ लोग पथराव कर रहे हैं तो उन लोगों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए। पूरी भीड़ को ऐसे हथियार के जोखिम में डाल देना अलग सवाल पैदा करता है।
RAF की समीक्षा के बाद मामला केवल विपक्ष बनाम सरकार नहीं रहा
सरकार इस मामले को केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज नहीं कर सकती, क्योंकि अब RAF की आंतरिक समीक्षा में भी operational shortcomings की खबर सामने आ चुकी है। दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों और विपक्ष को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि सुरक्षाकर्मियों पर हमला या पथराव शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का हिस्सा नहीं है। कानून दोनों तरफ एक ही कसौटी से लागू होना चाहिए। यदि प्रदर्शनकारी ने हिंसा की तो उसकी जवाबदेही तय हो; यदि पुलिस या RAF ने आवश्यकता से अधिक अथवा नियमों के विपरीत बल इस्तेमाल किया तो उसकी जवाबदेही भी तय हो। लोकतंत्र की परीक्षा यही है कि वर्दी पहन लेने से जवाबदेही समाप्त नहीं होती और प्रदर्शनकारी कहलाने से हिंसा वैध नहीं हो जाती।
संसद में बहस हो—क्योंकि यह किसी एक जवान का मामला नहीं है
20 जुलाई की घटना को किसी एक RAF जवान की departmental inquiry तक सीमित करना आसान होगा, लेकिन उससे मूल प्रश्न नहीं सुलझेगा। संसद को पूछना चाहिए कि भारत में राजनीतिक और नागरिक प्रदर्शनों के लिए crowd-control doctrine आखिर क्या है? कौन-से हथियार किस स्तर के खतरे पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं? किसे अनुमति देने का अधिकार है? क्या प्रत्येक हथियार के इस्तेमाल का अनिवार्य रिकॉर्ड रखा जाता है? गंभीर चोट होने पर स्वतंत्र जांच की व्यवस्था क्या है? क्या पैलेट फैलाने वाले हथियारों को नागरिक भीड़ नियंत्रण से पूरी तरह बाहर कर देना चाहिए? Electric Shock Weapons जैसे साधनों के इस्तेमाल के मानक क्या हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या हमारी crowd-control व्यवस्था का पहला सिद्धांत ‘भीड़ को हराना’ है या ‘जीवन और अधिकारों की रक्षा करते हुए व्यवस्था बनाए रखना’? RAF की समीक्षा के बाद इन सवालों को संसद में उठाना संस्थाओं पर हमला नहीं होगा; बल्कि उन्हीं संस्थाओं को अधिक पेशेवर और जवाबदेह बनाने की प्रक्रिया होगी।
प्रधानमंत्री युवाओं को ‘फ्रेंड्स’ कहते हैं तो यही समय है उस शब्द को राजनीतिक अर्थ देने का
‘Friends’ केवल इंस्टाग्राम का संबोधन नहीं होना चाहिए। दोस्ती का पहला अर्थ सुनना होता है। यदि देश के युवा परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, रोजगार या अपने भविष्य को लेकर सड़क पर उतरते हैं तो सरकार उनसे असहमत हो सकती है, उनकी हर मांग मानना भी जरूरी नहीं है, लेकिन उनके शरीर पर राज्य की ताकत का निशान लोकतंत्र का सामान्य दृश्य नहीं बन सकता। प्रधानमंत्री यदि वास्तव में Gen Z से नया संवाद बनाना चाहते हैं तो 20 जुलाई की घटना उनके लिए अवसर भी है—सरकार स्वतंत्र और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करे, जिम्मेदारी तय करे और ऐसी crowd-control policy बनाए जिसमें नागरिक की जान, आंख और शरीर की सुरक्षा केंद्र में हो।
सवाल बहुत सीधा है—आदेश किसने दिया?
यही वह प्रश्न है जिससे सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान को बचना नहीं चाहिए। पैलेट गन किसने जारी की? सात राउंड चलाने की परिस्थिति कैसे बनी? किस अधिकारी को इसकी जानकारी थी? निर्धारित force gradient क्यों टूटा? किसने मौके पर कमांड संभाली थी? यदि नियमों का उल्लंघन हुआ तो जिम्मेदार कौन है? और भविष्य में ऐसा दोबारा न हो, इसके लिए क्या बदलेगा?
जांच जवान से शुरू हो सकती है, लेकिन वहीं खत्म नहीं हो सकती।
क्योंकि बंदूक की ट्रिगर पर एक उंगली होती है, लेकिन राज्य की कार्रवाई के पीछे पूरी command chain होती है।
और यदि प्रधानमंत्री सचमुच इस पीढ़ी को अपना ‘फ्रेंड’ मानते हैं, तो 20 जुलाई के घायल युवाओं को सबसे पहले एक रील नहीं, जवाब चाहिए।




