राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 जून 2026
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में आदिवासी क्षेत्रों से जुड़े कानूनों के क्रियान्वयन को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (PESA) 1996 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए गठित टास्क फोर्स पर कांग्रेस और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि इस व्यवस्था के जरिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठनों की भूमिका को संस्थागत रूप दिया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने 6 मई 2026 को एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया था। इस व्यवस्था में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में 18 सदस्यीय शीर्ष समिति और मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 12 सदस्यीय कार्यान्वयन समिति बनाई गई है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य वन अधिकार कानून और PESA के तहत लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा करना, सामुदायिक वन अधिकारों की पहचान करना तथा आदिवासी क्षेत्रों में विकास और अधिकारों के बेहतर क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना है।
टास्क फोर्स को सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों (Community Forest Resource Rights) के संभावित क्षेत्रों की पहचान करने, लंबित दावों की समीक्षा करने और PESA से जुड़े मुद्दों पर रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा जिला प्रशासन को इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में सहायता प्रदान करना भी इसका प्रमुख कार्य होगा।
हालांकि कांग्रेस और विभिन्न आदिवासी अधिकार संगठनों ने इस कदम का विरोध किया है। उनका कहना है कि FRA और PESA जैसे कानूनों के तहत पहले से ही ग्राम सभाओं, जिला स्तरीय समितियों और अन्य वैधानिक संस्थाओं को अधिकार दिए गए हैं। ऐसे में समानांतर टास्क फोर्स बनाना इन संवैधानिक और कानूनी संस्थाओं की भूमिका को कमजोर कर सकता है।
आलोचकों का आरोप है कि टास्क फोर्स में शामिल कुछ व्यक्तियों और संगठनों का संबंध संघ परिवार से जुड़ा हुआ माना जाता है। उनका कहना है कि इससे आदिवासी अधिकारों से जुड़े संवेदनशील मामलों में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ सकता है। कांग्रेस ने इसे आदिवासी स्वशासन की भावना के खिलाफ बताते हुए कहा है कि सरकार को ग्राम सभाओं और स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।
दूसरी ओर राज्य सरकार का कहना है कि टास्क फोर्स का गठन केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने और वर्षों से लंबित मामलों के समाधान के लिए किया गया है। सरकार का दावा है कि इससे वन अधिकार दावों के निपटारे में तेजी आएगी और आदिवासी समुदायों को उनके कानूनी अधिकार समयबद्ध तरीके से मिल सकेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि PESA और FRA दोनों ही कानून आदिवासी समुदायों को भूमि, जल, जंगल और स्थानीय प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करते हैं। इसलिए इनके क्रियान्वयन से जुड़ा कोई भी कदम राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।
फिलहाल छत्तीसगढ़ में गठित नई टास्क फोर्स को लेकर बहस तेज हो गई है। एक तरफ सरकार इसे आदिवासी अधिकारों को मजबूत करने की पहल बता रही है, वहीं विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता इसे वैधानिक संस्थाओं के अधिकारों में हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा आदिवासी राजनीति और केंद्र-राज्य संबंधों की बहस में प्रमुख स्थान हासिल कर सकता है।




