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सिर्फ 7 वनडे खेले, लेकिन धोनी को सीएसके तक पहुंचाने वाला यही खिलाड़ी था! 56 गेंदों में शतक, द्रविड़ को बनाया सितारा—फिर कर्ज ने ले ली जान

खेल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 सितंबर 2026

 

भारत के लिए सिर्फ 7 वनडे, लेकिन क्रिकेट में योगदान बेहद बड़ा

क्रिकेट की दुनिया में कुछ खिलाड़ियों का नाम उनके आंकड़ों से नहीं, बल्कि उनके पीछे छोड़ी गई विरासत से याद किया जाता है। वीबी चंद्रशेखर भी ऐसी ही एक कहानी हैं। भारत के लिए उन्होंने सिर्फ 7 वनडे मैच खेले और 88 रन बनाए, लेकिन भारतीय क्रिकेट में उनका योगदान इन आंकड़ों से कहीं ज्यादा बड़ा था। घरेलू क्रिकेट में उन्होंने ऐसा तूफानी शतक लगाया था, जिसे उस दौर में लगभग असंभव माना जाता था। इसके बाद उन्होंने एक युवा राहुल द्रविड़ को चेन्नई में क्रिकेट का अनुभव दिलाने में मदद की, राष्ट्रीय चयन समिति में काम किया और फिर 2008 की आईपीएल नीलामी में महेंद्र सिंह धोनी को चेन्नई सुपर किंग्स तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। लेकिन इस शानदार क्रिकेट सफर का अंत बेहद दुखद हुआ। बढ़ते कर्ज और आर्थिक दबाव के बीच वर्ष 2019 में उन्होंने आत्महत्या कर ली।

56 गेंदों में शतक, भारतीय क्रिकेट में मच गया था तहलका

चंद्रशेखर की सबसे यादगार पारियों में से एक 1988 की इरानी ट्रॉफी में आई। तमिलनाडु के सामने 340 रन का लक्ष्य था और टीम के सामने ऐसा गेंदबाजी आक्रमण था, जिसमें नरेंद्र हिरवानी जैसे खतरनाक स्पिनर मौजूद थे। चंद्रशेखर पहली पारी में पहली ही गेंद पर आउट हो चुके थे, लेकिन दूसरी पारी में उन्होंने ऐसा जवाब दिया कि पूरा क्रिकेट जगत हैरान रह गया। उन्होंने केवल 78 गेंदों पर 119 रन ठोक दिए और अपना शतक सिर्फ 56 गेंदों में पूरा किया। उस समय यह भारत के किसी बल्लेबाज का सबसे तेज प्रथम श्रेणी शतक था, जिसकी बराबरी राजेश बोरा भी कर चुके थे। बाद में ऋषभ पंत ने 2016 में 48 गेंदों में शतक लगाकर यह रिकॉर्ड तोड़ा।

 

रणजी ट्रॉफी में भी बल्ले ने मचाया था धमाल

इस ऐतिहासिक पारी से कुछ महीने पहले चंद्रशेखर तमिलनाडु की रणजी ट्रॉफी विजेता टीम का हिस्सा थे और उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया था। उन्होंने सिर्फ आठ मैचों में 551 रन बनाए थे। उत्तर प्रदेश के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में उनके बल्ले से 160 रन निकले, जबकि फाइनल में रेलवे के खिलाफ उन्होंने 89 रन बनाए। तमिलनाडु ने वह फाइनल पारी और 144 रन से जीता था। घरेलू क्रिकेट में उनका प्रदर्शन इतना प्रभावशाली था कि आखिरकार भारतीय टीम के दरवाजे भी उनके लिए खुल गए।

भारत की जर्सी मिली, लेकिन सफर बहुत छोटा रहा

चंद्रशेखर ने दिसंबर 1988 में न्यूजीलैंड के खिलाफ विशाखापत्तनम में अपना वनडे पदार्पण किया। इसके कुछ दिन बाद इंदौर में उन्होंने 53 रन बनाए। उस भारतीय टीम में के. श्रीकांत, नवजोत सिंह सिद्धू, दिलीप वेंगसरकर, मोहम्मद अजहरुद्दीन और कपिल देव जैसे बड़े नाम मौजूद थे। लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उनका सफर लंबा नहीं चला। उन्होंने कुल 7 वनडे मैच खेले और 88 रन बनाए। उनके नाम सिर्फ एक अर्धशतक रहा। 1990 में न्यूजीलैंड दौरे पर वापसी की कोशिश भी हुई, लेकिन कुछ मैचों के बाद उनका अंतरराष्ट्रीय करियर खत्म हो गया।

अंतरराष्ट्रीय करियर छोटा, घरेलू रिकॉर्ड शानदार

अगर कोई सिर्फ उनके भारत के लिए खेले सात वनडे देखे, तो शायद उन्हें एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर समझ ले। लेकिन प्रथम श्रेणी क्रिकेट की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। चंद्रशेखर ने 81 प्रथम श्रेणी मैचों में 4,999 रन बनाए। उनके नाम 10 शतक और 23 अर्धशतक थे। गोवा के लिए खेलते हुए उन्होंने केरल के खिलाफ 237 रन नाबाद बनाए थे। उनके करियर का एक अजीब आंकड़ा यह भी रहा कि वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 5,000 रन पूरे करने से सिर्फ एक रन दूर रह गए।

युवा राहुल द्रविड़ के करियर में भी निभाई अहम भूमिका

चंद्रशेखर का असली योगदान शायद उनके अपने रन से भी आगे था। चेन्नई में लीग क्रिकेट खेलने के दौरान उन्होंने युवा राहुल द्रविड़ को इंडिया सीमेंट्स के सेटअप से जुड़ने में मदद की। उस समय द्रविड़ भारतीय क्रिकेट के महान बल्लेबाज नहीं बने थे। वह अपने करियर की शुरुआत कर रहे थे और उन्हें अच्छे स्तर की क्रिकेट तथा अनुभव की जरूरत थी। द्रविड़ उस दौर में चंद्रशेखर के घर पर भी रहे। आगे चलकर द्रविड़ भारत के सबसे सफल टेस्ट बल्लेबाजों और कप्तानों में शामिल हुए।

राष्ट्रीय चयनकर्ता भी बने, भारतीय क्रिकेट के मुश्किल दौर में रहे मौजूद

चंद्रशेखर बाद में भारतीय राष्ट्रीय चयन समिति का हिस्सा भी बने। 2004 से 2006 के बीच उन्होंने दक्षिण क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। यह भारतीय क्रिकेट का ऐसा दौर था जब टीम में बड़े बदलाव हो रहे थे। सौरव गांगुली की कप्तानी को लेकर विवाद हुआ, उन्हें टीम से बाहर किया गया और राहुल द्रविड़ को कप्तानी की जिम्मेदारी मिली। यानी चंद्रशेखर भारतीय क्रिकेट के उस बेहद महत्वपूर्ण दौर के अंदरूनी फैसलों का हिस्सा भी रहे।

फिर आया वह फैसला जिसने धोनी को सीएसके पहुंचा दिया

लेकिन चंद्रशेखर का नाम आईपीएल इतिहास में सबसे ज्यादा जिस वजह से याद किया जाता है, वह है महेंद्र सिंह धोनी को चेन्नई सुपर किंग्स तक पहुंचाना। 2008 में पहली आईपीएल नीलामी से पहले चेन्नई सुपर किंग्स की नजर वीरेंद्र सहवाग पर थी। लेकिन चंद्रशेखर ने टीम प्रबंधन को समझाया कि धोनी ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकते हैं। उनके पास कप्तानी की क्षमता थी, वह विकेटकीपिंग कर सकते थे और बल्ले से मैच का रुख बदल सकते थे। उनकी सलाह पर सीएसके ने धोनी के लिए जोरदार बोली लगाई और आखिरकार उन्हें 15 लाख डॉलर यानी करीब 1.5 मिलियन डॉलर में अपने साथ जोड़ लिया।

धोनी की बोली में चंद्रशेखर के हाथ में था पैडल

चंद्रशेखर ने बाद में बताया था कि एन. श्रीनिवासन ने उन्हें धोनी को हासिल करने के लिए आगे बढ़ने को कहा था। नीलामी में चंद्रशेखर लगातार बोली लगाते रहे और आखिरकार धोनी चेन्नई सुपर किंग्स के हो गए। उस समय धोनी पहली आईपीएल नीलामी के सबसे महंगे खिलाड़ी बने थे। इसके बाद धोनी और सीएसके का रिश्ता आईपीएल इतिहास की सबसे सफल और पहचान वाली जोड़ियों में बदल गया। आज जब सीएसके और धोनी का नाम एक साथ लिया जाता है, तब शायद ही कोई उस व्यक्ति को याद करता है जिसने नीलामी के कमरे में धोनी के लिए लगातार बोली लगाई थी।

लेकिन जिंदगी ने आखिरी दौर में बेहद दर्दनाक मोड़ लिया

क्रिकेट से जुड़े रहने के बाद चंद्रशेखर तमिलनाडु प्रीमियर लीग की एक टीम के मालिक भी बने। यह टीम बाद में वीबी कांची वीरन्स के नाम से जानी गई। लेकिन इस कारोबार ने उन पर आर्थिक दबाव भी बढ़ाया। पुलिस के अनुसार, वह टीम से जुड़े बढ़ते कर्ज और आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे थे। 15 अगस्त 2019 को 57 वर्ष की उम्र में उन्होंने आत्महत्या कर ली। उनकी मृत्यु ने तमिलनाडु और भारतीय क्रिकेट जगत को झकझोर दिया।

एक खिलाड़ी के आंकड़े नहीं, पूरी क्रिकेट पीढ़ी पर असर

वीबी चंद्रशेखर की कहानी भारतीय क्रिकेट की उस सच्चाई को सामने लाती है, जहां किसी खिलाड़ी की महानता हमेशा उसके अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों से तय नहीं होती। भारत के लिए सिर्फ सात वनडे खेलने वाला यह बल्लेबाज घरेलू क्रिकेट में रिकॉर्ड बनाने वाला खिलाड़ी था, राहुल द्रविड़ जैसे महान बल्लेबाज के शुरुआती सफर में मददगार बना, राष्ट्रीय चयनकर्ता रहा और फिर महेंद्र सिंह धोनी को सीएसके तक पहुंचाने वाले सबसे महत्वपूर्ण लोगों में शामिल हुआ।

धोनी के नाम के साथ आज सीएसके की पूरी कहानी जुड़ी है, लेकिन उस कहानी के शुरुआती पन्नों में एक ऐसा नाम भी है जिसे क्रिकेट की चमक ने धीरे-धीरे भुला दिया—वीबी चंद्रशेखर। सवाल यही है कि क्या भारतीय क्रिकेट अपने ऐसे खिलाड़ियों और क्रिकेट प्रशासकों को उतना याद रखता है, जितना उन्हें रखना चाहिए?

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