राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 सितंबर 2026
अमित शाह के ऐलान के बाद एनडीए में अलग-अलग सुर
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस ऐलान के बाद कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू की जाएगी, एनडीए के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ज्यादातर सहयोगी दलों ने इस फैसले का समर्थन किया है, लेकिन सभी दलों का रुख एक जैसा नहीं है। आंध्र प्रदेश की टीडीपी ने यूसीसी के समर्थन में आवाज उठाई है, शिवसेना और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने भी समर्थन किया है, लेकिन बिहार में जेडीयू ने साफ कर दिया है कि वह इस तरह के किसी कदम को राज्य में लागू नहीं होने देगी।
टीडीपी का बदला हुआ रुख क्यों अहम?
टीडीपी इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में से एक है। केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए संसद में बहुमत बनाए रखने में टीडीपी की भूमिका अहम है। आंध्र प्रदेश में पार्टी का अच्छा-खासा मुस्लिम मतदाता आधार भी है। यही वजह है कि यूसीसी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर टीडीपी का समर्थन राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पहले टीडीपी बिना पर्याप्त बातचीत और सभी पक्षों से सलाह के किसी कानून के समर्थन को लेकर सावधानी बरतती रही थी, लेकिन अब उसका रुख पहले की तुलना में नरम दिखाई दे रहा है।
जेडीयू ने बिहार के लिए खींची साफ लकीर
सबसे बड़ा राजनीतिक विरोध एनडीए के भीतर से ही बिहार में सामने आया है। जेडीयू ने साफ कर दिया है कि बिहार में यूसीसी लागू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जेडीयू भी एनडीए का हिस्सा है और बिहार की सत्ता में भाजपा के साथ गठबंधन में है। ऐसे में एक ही गठबंधन के भीतर एक तरफ केंद्र सरकार देश के 21 एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने की बात कर रही है और दूसरी तरफ उसका एक प्रमुख सहयोगी अपने राज्य में इसे रोकने की घोषणा कर रहा है।
बिहार में मुस्लिम वोट बैंक भी बड़ा कारण
जेडीयू का बिहार में महत्वपूर्ण मुस्लिम वोट बैंक है। पार्टी पहले भी यूसीसी जैसे मुद्दों पर व्यापक बातचीत और सभी समुदायों से सलाह की जरूरत पर जोर देती रही है। ऐसे में बिहार में यूसीसी का विरोध केवल कानूनी या संवैधानिक बहस नहीं, बल्कि राज्य की चुनावी राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। जेडीयू के लिए सवाल यह है कि वह भाजपा के साथ गठबंधन भी बनाए रखे और अपने सामाजिक-राजनीतिक आधार को भी सुरक्षित रखे।
एक तरफ शाह का लक्ष्य, दूसरी तरफ सहयोगियों की मजबूरी
अमित शाह का ऐलान यूसीसी को एनडीए की बड़ी राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल करने का संकेत देता है। लेकिन अब असली चुनौती इसे लागू करने की राजनीतिक सहमति बनाने की है। अगर एनडीए के भीतर ही अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग राय सामने आती है, तो क्या पूरे गठबंधन में यूसीसी पर एक राय बन पाएगी? यही सवाल आने वाले दिनों में और बड़ा हो सकता है।
शिवसेना और हम का समर्थन
दूसरी ओर शिवसेना और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने अमित शाह के ऐलान का समर्थन किया है। यानी एनडीए में यूसीसी के समर्थक सहयोगियों की संख्या कम नहीं है। लेकिन जेडीयू का रुख यह दिखाता है कि समर्थन का सवाल सिर्फ भाजपा बनाम विपक्ष का नहीं है। एनडीए के भीतर भी इस मुद्दे पर क्षेत्रीय राजनीति, सामाजिक समीकरण और चुनावी हित अपना असर डाल रहे हैं।
यूसीसी आखिर है क्या?
समान नागरिक संहिता का मतलब अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और परिवार से जुड़े कुछ नागरिक मामलों में अलग-अलग नियमों की जगह एक समान कानूनी व्यवस्था लाना है। इसके समर्थकों का तर्क है कि देश में नागरिक कानून सबके लिए समान होने चाहिए। विरोध करने वाले दल और संगठन इसे धार्मिक तथा व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ा संवेदनशील विषय मानते हैं और व्यापक बातचीत की मांग करते हैं।
2029 से पहले बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने की तैयारी
अमित शाह के बयान के बाद यूसीसी आने वाले वर्षों की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। भाजपा इसे समान कानून और समान नागरिक अधिकार के नजरिए से देखती है, जबकि उसके कुछ सहयोगी इसके तरीके, समय और राज्यों में लागू करने को लेकर अलग सोच रखते हैं। यानी 2029 से पहले यूसीसी केवल कानून का सवाल नहीं रहेगा, बल्कि एनडीए की एकता और सहयोगी दलों की राजनीतिक स्वतंत्रता की भी परीक्षा बन सकता है।
अब सवाल बिहार से पूरे एनडीए तक
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर जेडीयू बिहार में यूसीसी के खिलाफ खड़ी रहती है, तो भाजपा और जेडीयू इस मुद्दे पर आगे कैसे साथ चलेंगे? क्या केंद्र सरकार बिहार को अलग रखकर आगे बढ़ेगी? अगर ऐसा होता है तो क्या दूसरे सहयोगी दल भी अपने-अपने राज्यों के लिए अलग रुख अपनाएंगे?
अमित शाह ने 2029 से पहले 21 एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने का लक्ष्य सामने रख दिया है, लेकिन बिहार ने अभी से ब्रेक लगा दिया है। अब असली परीक्षा कानून की नहीं, एनडीए की राजनीतिक एकजुटता की है—क्या यूसीसी पर पूरा गठबंधन एक साथ खड़ा होगा या यह मुद्दा एनडीए के भीतर ही नई दरार पैदा करेगा?



