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भारत-चीन व्यापार पर बढ़ता खतरा: घाटा ही नहीं, अब सप्लाई पर निर्भरता ने बढ़ाई चिंता

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राष्ट्रीय | आलोक रंजन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 अप्रैल 2026

भारत और चीन के बीच बढ़ता व्यापार घाटा अब एक गंभीर आर्थिक चिंता का विषय बनता जा रहा है। यह मामला अब सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि भारत ज्यादा आयात कर रहा है और कम निर्यात, बल्कि असली चिंता यह है कि देश की मैन्युफैक्चरिंग व्यवस्था धीरे-धीरे चीन की औद्योगिक सप्लाई पर निर्भर होती जा रही है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की ताजा रिपोर्ट ने इस स्थिति को लेकर साफ चेतावनी दी है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो यह निर्भरता भविष्य में बड़ा जोखिम बन सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन भारत के कुल आयात का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा देता है, लेकिन औद्योगिक सामानों की बात करें तो उसकी हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से भी ज्यादा है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत की कई अहम इंडस्ट्री—जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स और केमिकल सेक्टर—अपने जरूरी कच्चे माल और पुर्जों के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर हैं। यही वजह है कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भी अप्रत्यक्ष रूप से चीन की सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और साफ हो जाती है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल आयात 774.98 अरब डॉलर रहा, जिसमें से 131.6 अरब डॉलर का सामान सिर्फ चीन से आया। वहीं, चीन को भारत का निर्यात करीब 19.5 अरब डॉलर पर ही सीमित रहा। इस असंतुलन के कारण व्यापार घाटा बढ़कर 112.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो पांच साल पहले के मुकाबले करीब 155 प्रतिशत ज्यादा है। यह तेजी से बढ़ता अंतर अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी संकेत माना जा रहा है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चीन से आने वाले आयात का लगभग 98.5 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक उत्पादों का होता है। यानी भारत जो सामान चीन से खरीद रहा है, वह सीधे उत्पादन से जुड़ा हुआ है—जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स के पार्ट्स, मशीनरी, कंप्यूटर, ऑर्गेनिक केमिकल्स, EV बैटरियां और सोलर मॉड्यूल। इन चार प्रमुख सेक्टरों का कुल आयात में लगभग 66 प्रतिशत योगदान है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर इन सप्लाई में किसी भी वजह से रुकावट आती है, तो भारत की कई इंडस्ट्री सीधे प्रभावित हो सकती हैं।

GTRI के विशेषज्ञों का कहना है कि यह सामान्य व्यापार नहीं है, बल्कि यह “जरूरी निर्भरता” बन चुकी है। यानी भारत के मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम को चलाने के लिए इन इनपुट्स की जरूरत है और फिलहाल इसका बड़ा हिस्सा चीन से ही आता है। ऐसे में अगर भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक विवाद या किसी अन्य कारण से सप्लाई प्रभावित होती है, तो इसका असर सीधे भारत की उत्पादन क्षमता और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

रिपोर्ट ने एक और अहम चिंता जताई है। अगर चीन से निवेश नियमों में ढील दी जाती है, तो हो सकता है कि चीनी कंपनियां भारत में लोकल असेंबली शुरू करें, लेकिन जरूरी कंपोनेंट्स चीन से ही मंगाएं। इससे भारत में वास्तविक वैल्यू एडिशन कम रहेगा और घरेलू उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है।

इन सभी जोखिमों को देखते हुए GTRI ने सुझाव दिया है कि भारत को अपनी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत करनी होगी और सप्लाई चेन को विविध बनाना होगा। यानी जरूरी सामान के लिए सिर्फ एक देश पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों से सोर्सिंग बढ़ानी होगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि किसी एक देश पर निर्भरता को 30 प्रतिशत से कम रखना एक व्यावहारिक कदम हो सकता है।

यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि भारत को अब सिर्फ व्यापार घाटे के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी संरचनात्मक चुनौतियों पर ध्यान देने की जरूरत है। अगर समय रहते रणनीति नहीं बदली गई, तो यह बढ़ती निर्भरता भविष्य में आर्थिक और रणनीतिक दोनों तरह के जोखिम पैदा कर सकती है।

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