राष्ट्रीय/ व्यापार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अगस्त 2026
इथेनॉल की बहस में अब सरकार के अपने आंकड़े बने सवाल का आधार
पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने को लेकर चल रही बहस के बीच खोजी पत्रकारिता समूह The Reporters’ Collective के एक विश्लेषण ने सरकार के दावों के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट का दावा है कि मोटर स्पिरिट की खपत और देश में वाहनों की बढ़ती संख्या के सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग में तेजी आने के बाद वाहन चालकों को समान दूरी तय करने के लिए अधिक ईंधन खरीदना पड़ा और इसी अतिरिक्त खपत की अनुमानित कीमत तीन वित्त वर्षों—1 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2026—के दौरान करीब ₹88,234 करोड़ बैठती है। यहां ‘मोटर स्पिरिट’ का अर्थ मोटर वाहनों में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल और उसके मिश्रित रूपों से है। महत्वपूर्ण बात यह है कि ₹88,234 करोड़ कोई सरकारी तौर पर घोषित ‘उपभोक्ता नुकसान’ का आंकड़ा नहीं, बल्कि The Reporters’ Collective द्वारा सरकारी खपत और अन्य आंकड़ों के आधार पर निकाला गया अनुमान है। इसलिए इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन इस विश्लेषण को पूरी तरह खारिज करना भी आसान नहीं है, क्योंकि सरकार की अपनी नीति आयोग की रिपोर्ट यह स्वीकार कर चुकी है कि E20 के इस्तेमाल से कुछ श्रेणियों के वाहनों में फ्यूल एफिशिएंसी कम हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य सरकार की अपनी रिपोर्ट में—E20 से माइलेज घट सकता है
इस बहस का सबसे मजबूत पहलू यह है कि माइलेज में संभावित गिरावट केवल सरकार के आलोचकों का दावा नहीं है। नीति आयोग की ‘Roadmap for Ethanol Blending in India 2020-25’ में E20 के उपभोक्ताओं पर प्रभाव का बाकायदा आकलन किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक E20 इस्तेमाल करने पर E0 के लिए डिजाइन और E10 के लिए कैलिब्रेट की गई चार पहिया गाड़ियों में फ्यूल एफिशिएंसी करीब 6-7%, दोपहिया वाहनों में करीब 3-4% और E10 के लिए डिजाइन लेकिन E20 के लिए कैलिब्रेट चार पहिया वाहनों में करीब 1-2% तक कम हो सकती है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि इंजन हार्डवेयर और ट्यूनिंग में बदलाव करके इस दक्षता नुकसान को कम किया जा सकता है। यानी सरकार की आधिकारिक रोडमैप रिपोर्ट स्वयं यह मानती थी कि वाहन की तकनीक के आधार पर E20 का माइलेज पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए आज मूल सवाल यह नहीं रह जाता कि माइलेज पर ‘कोई असर पड़ता है या नहीं’; अधिक उपयोगी सवाल यह है कि अलग-अलग उम्र और तकनीक वाले भारत के विशाल वाहन बेड़े पर वास्तविक औसत प्रभाव कितना पड़ा है।
विज्ञान सीधा है—इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में प्रति लीटर कम ऊर्जा
इस विवाद के पीछे बुनियादी विज्ञान अपेक्षाकृत सरल है। इथेनॉल की प्रति लीटर ऊर्जा सामग्री पेट्रोल की तुलना में कम होती है। The Reporters’ Collective ने अपने आकलन में इसे लगभग 33% कम मानते हुए गणना की है कि यदि मोटर स्पिरिट में 20% इथेनॉल मिलाया जाता है तो मिश्रण की ऊर्जा सामग्री शुद्ध पेट्रोल की तुलना में करीब 6.7% कम हो सकती है। हालांकि वास्तविक वाहन माइलेज केवल ईंधन की ऊर्जा सामग्री से तय नहीं होता—इंजन डिजाइन, कैलिब्रेशन, ड्राइविंग परिस्थितियां, ट्रैफिक, वाहन की उम्र और तकनीक भी परिणाम बदलते हैं। यही वजह है कि नीति आयोग की आधिकारिक रिपोर्ट में अलग-अलग वाहन श्रेणियों के लिए अलग-अलग दक्षता नुकसान बताया गया था। इसलिए ‘33% कम ऊर्जा’ को सीधे ‘हर वाहन का माइलेज 33% कम’ समझना गलत होगा; 33% का संदर्भ इथेनॉल की अपनी ऊर्जा सामग्री से है, पूरे E20 मिश्रण से नहीं।
₹88,234 करोड़ का आंकड़ा आखिर आया कहां से?
The Reporters’ Collective के विश्लेषण के अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग लगभग 11.8% से बढ़कर 20% तक पहुंची। रिपोर्ट ने मोटर स्पिरिट की वास्तविक खपत की तुलना उस अनुमानित मात्रा से की जो समान ऊर्जा आवश्यकता पूरी करने के लिए शुद्ध पेट्रोल की स्थिति में जरूरी होती। उसके अनुसार तीन वर्षों में भारतीय वाहन चालकों ने ऊर्जा-अंतर की भरपाई के लिए अनुमानतः 6.57 मिलियन मीट्रिक टन अतिरिक्त मिश्रित ईंधन इस्तेमाल किया और इसकी अनुमानित लागत करीब ₹88,234 करोड़ बैठती है। रिपोर्ट के मुताबिक अकेले वित्त वर्ष 2025-26 में देश में लगभग 42.6 मिलियन मीट्रिक टन मोटर स्पिरिट की खपत हुई; उसके मॉडल का अनुमान है कि शुद्ध पेट्रोल की स्थिति में समान ऊर्जा आवश्यकता के लिए लगभग 39.76 मिलियन मीट्रिक टन पर्याप्त होता। यह गणना एक विश्लेषणात्मक मॉडल है, प्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक भारतीय वाहन के वास्तविक माइलेज को मापने वाला राष्ट्रव्यापी परीक्षण नहीं—इस अंतर को समझना जरूरी है।
असली सवाल: तेल आयात की बचत हुई तो उपभोक्ता को उसका कितना लाभ मिला?
इथेनॉल नीति के पक्ष में सरकार के पास भी महत्वपूर्ण तर्क हैं। इथेनॉल ब्लेंडिंग का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा की बचत करना, घरेलू जैव-ईंधन उद्योग को बढ़ावा देना और उत्सर्जन में कुछ सुधार हासिल करना रहा है। नीति आयोग की रोडमैप रिपोर्ट में E20 के साथ कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसे कुछ उत्सर्जनों में कमी के संभावित लाभ भी दर्ज किए गए थे। इसलिए पूरी नीति को केवल माइलेज के आधार पर खारिज करना तस्वीर का एक ही हिस्सा देखना होगा। लेकिन उपभोक्ता का सवाल भी उतना ही जायज है—यदि इथेनॉल मिलाने से देश के तेल आयात बिल में बचत होती है, लेकिन कम ऊर्जा घनत्व के कारण वाहन चालक को समान दूरी के लिए अधिक ईंधन खरीदना पड़ता है, तो उस राष्ट्रीय बचत और उपभोक्ता पर पड़ने वाले अतिरिक्त खर्च का समग्र हिसाब सार्वजनिक क्यों न हो? यही वह बिंदु है जहां बहस को नारों से निकालकर पारदर्शी आंकड़ों पर लाने की जरूरत है।
सरकार को लाभ ही नहीं, उपभोक्ता की पूरी लागत भी सामने रखनी चाहिए
इथेनॉल नीति का निष्पक्ष मूल्यांकन तभी संभव है जब उसके सभी लाभ और लागत एक साथ सामने रखे जाएं। देश ने कितना कच्चा तेल आयात करने से बचाया? विदेशी मुद्रा में कितनी बचत हुई? किसानों और इथेनॉल उत्पादकों को कितना आर्थिक लाभ मिला? उत्सर्जन में वास्तविक कमी कितनी हुई? दूसरी तरफ वाहन चालकों की वास्तविक फ्यूल एफिशिएंसी पर कितना असर पड़ा? पुराने वाहनों और E20-अनुकूल नए वाहनों में फर्क कितना है? अतिरिक्त ईंधन खपत की वास्तविक उपभोक्ता लागत क्या है? यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक सार्वजनिक और स्वतंत्र रूप से जांचे जा सकने वाले डेटा सेट में दिया जाए तो इथेनॉल पर बहस अधिक तथ्यपरक हो सकती है। नीति आयोग की पुरानी रिपोर्ट में संभावित दक्षता नुकसान को स्वीकार किया जाना बताता है कि इस सवाल को पूछना अपने आप में इथेनॉल विरोध नहीं है।
इथेनॉल बढ़ेगा तो पुराने वाहन मालिकों की चिंता का जवाब भी जरूरी
भविष्य की नीति के लिहाज से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। यदि पेट्रोल में इथेनॉल का अनुपात आगे और बढ़ाया जाता है, तो भारत में पहले से सड़क पर चल रहे करोड़ों वाहनों का क्या होगा? नई गाड़ियों के इंजन को उच्च इथेनॉल मिश्रण के अनुरूप डिजाइन और कैलिब्रेट किया जा सकता है, लेकिन पुराने वाहन उसी तकनीकी तैयारी के साथ नहीं बने थे। नीति आयोग ने स्वयं माना था कि इंजन में उचित हार्डवेयर और ट्यूनिंग बदलाव दक्षता नुकसान को कम कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि वाहन की तकनीकी अनुकूलता इस बहस के केंद्र में होनी चाहिए। सरकार यदि भविष्य में उच्च मिश्रण की तरफ बढ़ती है तो उपभोक्ताओं को स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि कौन-सा वाहन किस मिश्रण के लिए डिजाइन है और वास्तविक माइलेज पर संभावित प्रभाव क्या होगा।
₹88,234 करोड़ का दावा स्वतंत्र जांच की मांग करता है, खारिज करने की नहीं
The Reporters’ Collective का ₹88,234 करोड़ का अनुमान बहुत बड़ा है और इतनी बड़ी राशि का दावा स्वाभाविक रूप से स्वतंत्र तकनीकी जांच की मांग करता है। इसे अंतिम और निर्विवाद राष्ट्रीय नुकसान मान लेना उतना ही जल्दबाजी होगी जितना बिना विस्तृत जवाब के इसे खारिज कर देना। सरकार के पास पेट्रोलियम बिक्री, इथेनॉल मिश्रण, वाहन श्रेणियों और ईंधन खपत से जुड़े व्यापक आंकड़े उपलब्ध हैं। ऐसे में बेहतर जवाब यही होगा कि सरकार वर्षवार और वाहन-श्रेणीवार अध्ययन सार्वजनिक करे और बताए कि E10 से E20 की यात्रा के दौरान वास्तविक दुनिया में प्रति किलोमीटर ईंधन लागत में क्या बदलाव आया। इससे ₹88,234 करोड़ के अनुमान की पुष्टि, संशोधन या खंडन डेटा के आधार पर किया जा सकेगा।
इथेनॉल पर बहस ‘देशहित बनाम विरोध’ नहीं, उपभोक्ता के पैसे की भी है
इथेनॉल ब्लेंडिंग ऊर्जा सुरक्षा, किसानों, पर्यावरण, विदेशी मुद्रा और घरेलू जैव-ईंधन उद्योग से जुड़ी बड़ी नीति है। लेकिन इतनी बड़ी नीति का एक पक्ष वह सामान्य नागरिक भी है जो हर सप्ताह पेट्रोल पंप पर अपनी जेब से पैसा देता है। यदि ईंधन की प्रति लीटर ऊर्जा घटती है और किसी श्रेणी के वाहन में माइलेज भी घटता है तो उपभोक्ता के लिए असली सवाल पेट्रोल के बोर्ड पर लिखी प्रति लीटर कीमत नहीं, बल्कि एक किलोमीटर चलने की वास्तविक लागत है। सरकार को इथेनॉल नीति के लाभ गिनाने का पूरा अधिकार है, लेकिन उपभोक्ता को भी यह जानने का अधिकार है कि इस बदलाव की कीमत उसकी जेब से कितनी जा रही है। सरकार की अपनी नीति आयोग रिपोर्ट जब E20 से कुछ वाहनों में 6-7% तक फ्यूल एफिशिएंसी नुकसान की संभावना दर्ज कर चुकी है, तब इस सवाल को केवल अफवाह बताकर खत्म नहीं किया जा सकता।
इथेनॉल देश के लिए फायदेमंद है या नहीं, इसका फैसला केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितना पेट्रोल आयात बचा। पूरा हिसाब यह बताएगा कि देश ने कितना बचाया, पर्यावरण को कितना फायदा हुआ, किसानों को कितना मिला—और वाहन चालक ने अपनी जेब से कितना अतिरिक्त चुकाया। ₹88,234 करोड़ के दावे के बाद सरकार के सामने सबसे मजबूत जवाब बयान नहीं, पारदर्शी आंकड़े हैं।




