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DRDO की बड़ी तैयारी: 50 ‘जैम-प्रूफ’ ड्रोन का झुंड, एक मास्टर ड्रोन संभालेगा 49 ‘स्लेव’

महज आधा मीटर की दूरी पर तालमेल से उड़ सकेंगे ड्रोन; 5,000 मीटर ऊंचे पहाड़ी इलाकों और तेज हवा में ऑपरेशन का लक्ष्य, दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से बचाने पर खास जोर

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अगस्त 2026

भविष्य के युद्ध के लिए भारत की ‘ड्रोन स्वार्म’ तैयारी

भारत भविष्य के युद्धक्षेत्र की जरूरतों को देखते हुए ड्रोन युद्ध क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी तकनीक विकसित करने की तैयारी कर रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO ने ऐसे 50 ड्रोन के समूह पर काम आगे बढ़ाने की योजना बनाई है, जो बेहद करीबी फॉर्मेशन में एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाकर उड़ सकें और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग वाले वातावरण में भी प्रभावी संचार बनाए रखने के लक्ष्य के साथ विकसित किए जाएं। इस परियोजना को ‘Development of Close Formation Flying of Multiple Drones’ नाम दिया गया है। योजना के तहत एक ‘मास्टर ड्रोन’ बाकी 49 ड्रोन को निर्देशित करेगा। ये ड्रोन केवल आधा मीटर यानी करीब 500 मिलीमीटर की दूरी बनाए रखते हुए समूह में उड़ सकेंगे। इस तरह की क्षमता विकसित होने पर निगरानी, टोही और दूसरे सैन्य अभियानों में एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन इस्तेमाल करने की भारतीय क्षमता को नया आयाम मिल सकता है।

एक मास्टर ड्रोन के इशारे पर काम करेंगे 49 ‘स्लेव ड्रोन’

इस प्रस्तावित प्रणाली की सबसे खास बात इसका मास्टर-स्लेव मॉडल है। DRDO की परियोजना संबंधी आवश्यकताओं के अनुसार 50 ड्रोन के समूह में एक मास्टर ड्रोन होगा, जबकि बाकी 49 उसके साथ तालमेल बनाकर काम करेंगे। ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से निर्देश सीधे मास्टर ड्रोन तक पहुंचेंगे और इसके बाद वही तय ग्रिड में दूसरे ड्रोनों के संचालन और फॉर्मेशन को समन्वित करेगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य हर ड्रोन को अलग-अलग ग्राउंड कमांड देने की आवश्यकता को कम करते हुए पूरे समूह को एक समन्वित इकाई की तरह संचालित करना है। सैन्य दृष्टि से ऐसी तकनीक इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि युद्धक्षेत्र में दर्जनों ड्रोन यदि एक साथ सटीक फॉर्मेशन में काम करें तो उन्हें नियंत्रित करने के लिए अत्यधिक मजबूत नेविगेशन, संचार और टकराव से बचाव की क्षमता की जरूरत होगी।

सिर्फ 50 सेंटीमीटर की दूरी, पांच सेंटीमीटर तक सटीक पोजिशनिंग का लक्ष्य

परियोजना की सबसे कठिन तकनीकी चुनौतियों में 50 ड्रोनों को बेहद कम दूरी पर सुरक्षित रूप से उड़ाना शामिल है। प्रस्तावित प्रणाली में ड्रोन एक-दूसरे से करीब 500 मिलीमीटर यानी केवल आधा मीटर की दूरी पर रहेंगे। इतनी नजदीकी में दर्जनों ड्रोनों को बिना टकराए फॉर्मेशन में उड़ाना आसान नहीं है। इसके लिए हर ड्रोन को अपनी निर्धारित स्थिति बेहद सटीक तरीके से बनाए रखनी होगी। परियोजना में सभी दिशाओं में करीब पांच सेंटीमीटर तक की पोजिशनिंग सटीकता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। हवा की दिशा बदलने, गति में मामूली अंतर आने या किसी ड्रोन के अपनी निर्धारित जगह से हटने पर पूरा फॉर्मेशन प्रभावित हो सकता है। इसलिए सेंसर, नेविगेशन, नियंत्रण एल्गोरिदम और ड्रोनों के बीच रियल-टाइम समन्वय इस परियोजना की तकनीकी रीढ़ होंगे।

5,000 मीटर ऊंचे पहाड़ी इलाकों में भी ऑपरेशन का लक्ष्य

भारत की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए प्रस्तावित ड्रोन सिस्टम को केवल मैदानी इलाकों के लिए तैयार नहीं किया जा रहा। लक्ष्य इसे ऐसे पहाड़ी क्षेत्रों में भी सक्षम बनाना है जहां ऊंचाई 5,000 मीटर तक हो सकती है। ड्रोन को ऐसी परिस्थितियों में उड़ान भरने, हवा में एक स्थान पर स्थिर रहने और मिशन पूरा करने के बाद सुरक्षित वापस लौटने में सक्षम बनाने की आवश्यकता रखी गई है। ऊंचाई बढ़ने के साथ हवा का घनत्व कम होने और मौसम तेजी से बदलने जैसी परिस्थितियां छोटे ड्रोन के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा प्रणाली को 20 मीटर प्रति सेकंड तक की हवा में स्थिरता बनाए रखने के योग्य बनाने का लक्ष्य भी रखा गया है। यदि ये क्षमताएं सफलतापूर्वक विकसित होती हैं तो कठिन पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसे ड्रोन समूहों का इस्तेमाल महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से मुकाबला सबसे बड़ी चुनौती

आधुनिक युद्ध में केवल ड्रोन उड़ाना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि विरोधी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच संचार बाधित करने की कोशिश कर सकता है। इसी कारण प्रस्तावित प्रणाली में सुरक्षित और एंटी-जैमिंग कम्युनिकेशन पर विशेष जोर है। हालांकि किसी प्रणाली को पूरी तरह ‘जैम करना नामुमकिन’ कहना तकनीकी रूप से बहुत बड़ा दावा होगा; अधिक सटीक रूप से परियोजना का लक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप और जैमिंग के प्रति अधिक प्रतिरोधी संचार व्यवस्था विकसित करना है। खासकर 50 ड्रोन के बेहद करीबी समूह में यदि मास्टर ड्रोन और बाकी ड्रोनों के बीच संचार बाधित होता है तो पूरा फॉर्मेशन प्रभावित हो सकता है। इसलिए इस परियोजना की वास्तविक सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के कठिन वातावरण में नेटवर्क कितनी मजबूती से काम कर पाता है।

स्टार्टअप और MSME को मिलेगा स्वदेशी तकनीक बनाने का मौका

इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि DRDO देश के स्टार्टअप और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी MSME को अत्याधुनिक सैन्य ड्रोन तकनीक विकसित करने की प्रक्रिया में शामिल करना चाहता है। रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना को DRDO की Technology Development Fund (TDF) योजना के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने के साथ छोटी और उभरती भारतीय कंपनियों को अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के विकास में भागीदारी का अवसर देना है। इस परियोजना में सरकारी कंपनियों के बजाय निजी नवाचार और घरेलू तकनीकी क्षमता पर जोर दिए जाने की बात कही गई है। यदि भारतीय स्टार्टअप इस तरह की जटिल ड्रोन स्वार्म तकनीक विकसित करने में सफल होते हैं तो इसका फायदा केवल एक सैन्य परियोजना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के व्यापक ड्रोन और रक्षा प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम को भी मजबूती मिल सकती है।

ऑपरेशन सिंदूर के अनुभव के बाद ड्रोन युद्ध पर बढ़ा फोकस

मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन और मानवरहित प्रणालियों की भूमिका ने आधुनिक युद्ध में इस तकनीक के महत्व को और स्पष्ट किया। ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और विभिन्न सैन्य अभियानों में किया गया। ऐसे अनुभवों ने यह आवश्यकता सामने रखी कि भविष्य के संघर्ष में केवल बड़ी संख्या में ड्रोन होना पर्याप्त नहीं होगा; उनके बीच सुरक्षित संचार, आपसी तालमेल, स्वायत्त संचालन और इलेक्ट्रॉनिक हमलों के बीच काम करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और मानवरहित प्रणालियां अब सहायक उपकरण से आगे बढ़कर सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही हैं। ऐसे में भारत के लिए महत्वपूर्ण है कि जरूरी तकनीक का अधिक से अधिक विकास देश के भीतर हो और महत्वपूर्ण प्रणालियों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम की जाए।

एक ड्रोन नहीं, पूरा नेटवर्क बनेगा युद्धक्षेत्र की ताकत

ड्रोन युद्ध की अगली पीढ़ी में असली ताकत किसी एक अत्याधुनिक ड्रोन से अधिक ऐसे नेटवर्क की हो सकती है जिसमें बड़ी संख्या में मानवरहित प्लेटफॉर्म आपस में संवाद और समन्वय करते हुए एक मिशन पूरा करें। प्रस्तावित 50-ड्रोन प्रणाली इसी दिशा में एक तकनीकी कदम है। हालांकि अभी इसे वास्तविक युद्ध क्षमता मानने से पहले विकास, परीक्षण और विभिन्न परिस्थितियों में प्रदर्शन के कई चरण पूरे करने होंगे। आधा मीटर की दूरी पर 50 ड्रोनों को सुरक्षित रखना, पांच सेंटीमीटर तक सटीक पोजिशनिंग हासिल करना, ऊंचे पहाड़ों और तेज हवा में फॉर्मेशन बनाए रखना तथा इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के बीच सुरक्षित संचार सुनिश्चित करना बेहद चुनौतीपूर्ण लक्ष्य हैं। लेकिन यदि इन चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार किया जाता है तो भारत के पास भविष्य में एक ऐसी स्वदेशी ड्रोन-स्वार्म तकनीक हो सकती है जो कठिन सैन्य परिस्थितियों में निगरानी, समन्वित मिशन और अन्य रक्षा भूमिकाओं में सशस्त्र बलों की क्षमता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएगी।

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