ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 जुलाई 2026
सरकारी कंपनियों का CSR फंड अंततः जनता के संसाधनों से ही आता है। इसलिए इसका उपयोग केवल कानून के दायरे में होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उसका उपयोग निष्पक्ष, पारदर्शी और व्यापक जनहित में होता हुआ दिखाई दे।
यदि किसी सरकारी उपक्रम का CSR धन ऐसे संगठनों तक पहुंचता है, जिन्हें किसी विशेष वैचारिक, धार्मिक या राजनीतिक धारा से जुड़ा माना जाता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे। यह सवाल केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) तक सीमित नहीं है। यही प्रश्न किसी वामपंथी, धार्मिक, जातीय या किसी भी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े संगठन पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।
यह भी सच है कि किसी संगठन पर कट्टरवाद या वैचारिक पक्षधरता के आरोप लगना और किसी अदालत द्वारा उसे गैरकानूनी घोषित किया जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। भारत में RSS एक प्रतिबंधित संगठन नहीं है और उसके अनेक सहयोगी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में काम करने का दावा करते हैं। यदि कोई संस्था कानून के अनुसार CSR प्राप्त करने की पात्रता रखती है, तो केवल वैचारिक मतभेद के आधार पर उसे स्वतः अपात्र नहीं कहा जा सकता।
लेकिन सवाल यहीं समाप्त नहीं होता। सरकारी उपक्रमों को केवल कानूनी वैधता नहीं, बल्कि लोक-विश्वास का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि किसी संस्था को लेकर समाज में गंभीर विवाद या राजनीतिक ध्रुवीकरण है, तो उस संस्था को सरकारी CSR फंड देने का निर्णय अतिरिक्त पारदर्शिता और स्पष्ट मानदंडों के साथ होना चाहिए। यह सार्वजनिक रूप से बताया जाना चाहिए कि चयन किन मापदंडों पर हुआ, परियोजना क्या थी, लाभार्थी कौन थे और परिणाम क्या निकले।
सरकारी CSR किसी भी विचारधारा को मजबूत करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और आजीविका जैसी बुनियादी सेवाएं पहुंचाने का साधन होना चाहिए। इसलिए सबसे उचित व्यवस्था यही होगी कि सरकारी कंपनियां केवल परियोजना की गुणवत्ता, सामाजिक प्रभाव और पारदर्शिता के आधार पर अनुदान दें, न कि किसी संगठन की वैचारिक पहचान के आधार पर।
आखिरकार, सवाल किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि एक सिद्धांत का है—क्या जनता का पैसा किसी भी वैचारिक ध्रुवीकरण से ऊपर रहकर केवल सार्वजनिक हित में खर्च होना चाहिए? एक लोकतंत्र में इसका उत्तर जितना स्पष्ट होगा, सार्वजनिक संस्थाओं पर लोगों का विश्वास उतना ही मजबूत होगा।




