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सोयाबीन संकट से चीन के रेयर अर्थ दांव तक: दुनिया ने 1973 से क्या सीखा?

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | न्यूयॉर्क | 13 जुलाई 2026

चीन द्वारा रेयर अर्थ (Rare Earth) खनिजों को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की बढ़ती आशंकाओं के बीच एक ऐतिहासिक उदाहरण फिर चर्चा में है। ब्लूमबर्ग के वरिष्ठ स्तंभकार डेविड फिकलिंग ने अपने ताज़ा विश्लेषण में 1973 के ‘सोय शॉक’ (Soy Shock) का हवाला देते हुए बताया है कि जब कोई देश किसी महत्वपूर्ण संसाधन पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तो वह निर्भरता भू-राजनीतिक दबाव का बड़ा हथियार बन सकती है।

लेख के अनुसार, 1973 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने घरेलू महंगाई पर नियंत्रण पाने के लिए अचानक सोयाबीन के निर्यात पर रोक लगा दी थी। उस समय जापान अपनी लगभग 92 प्रतिशत सोयाबीन जरूरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर था। इस फैसले का सीधा असर टोफू, मिसो और सोया सॉस जैसी रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति पर पड़ा और जापान को पहली बार अपनी खाद्य सुरक्षा रणनीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करना पड़ा।

इस संकट से सबक लेते हुए जापान ने आने वाले वर्षों में आयात के स्रोतों में विविधता लाई और किसी एक देश पर निर्भरता कम करने की नीति अपनाई। यही रणनीति आगे चलकर उसकी खाद्य सुरक्षा की मजबूत नींव बनी।

डेविड फिकलिंग का तर्क है कि आज दुनिया रेयर अर्थ खनिजों के मामले में लगभग वैसी ही स्थिति में खड़ी है। इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, पवन ऊर्जा और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए आवश्यक इन खनिजों के खनन और विशेष रूप से प्रसंस्करण (Processing) में चीन का वैश्विक दबदबा है।

विश्लेषण के मुताबिक, यदि चीन रेयर अर्थ की आपूर्ति को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है, तो अल्पकाल में वैश्विक उद्योगों और सप्लाई चेन पर इसका असर पड़ सकता है। लेकिन इसका एक दूसरा परिणाम भी होगा—अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देश वैकल्पिक स्रोत विकसित करने तथा चीन पर निर्भरता कम करने की प्रक्रिया को और तेज कर देंगे।

लेख का निष्कर्ष स्पष्ट है कि इतिहास बताता है कि संसाधनों की आपूर्ति रोककर दबाव बनाना कुछ समय के लिए असरदार हो सकता है, लेकिन लंबे समय में इससे खरीदार देश नए विकल्प खोज लेते हैं और निर्भरता घटा देते हैं। 1973 का “सोय शॉक” इसी ऐतिहासिक सबक की याद दिलाता है और यह संकेत देता है कि रेयर अर्थ के मुद्दे पर भी दुनिया धीरे-धीरे वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाओं की ओर बढ़ सकती है।

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