विमेन/ दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 सितंबर 2026
जिस बच्चे ने 6 साल की उम्र में एक अनाथालय से निकलकर अपने नए माता-पिता के घर में कदम रखा था, शायद उसने उस दिन पहली बार महसूस किया होगा कि अब उसका भी अपना घर है। नोएडा का एक दंपति उसे असम के एक अनाथालय से गोद लेकर अपने साथ लाया था। 8 साल तक वह बच्चा इसी परिवार का हिस्सा रहा। लेकिन अब वही बच्चा 14 साल का है और उसकी मां दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचकर कह रही है कि पति की मौत के बाद वह अकेली पड़ गई हैं और अब अपने बेटे को संभाल पाना उनके लिए मुश्किल हो गया है।
यह सिर्फ एक मां की परेशानी की कहानी नहीं है। यह उस बच्चे की कहानी भी है, जिसने बचपन में अपना घर बदला, फिर पिता को खोया और अब ऐसी स्थिति में पहुंच गया है जहां उसकी मां खुद अदालत से उसके लिए किसी सरकारी या निजी देखभाल की व्यवस्था करने की मांग कर रही है। सबसे भावुक बात यह है कि मां ने बच्चे को कानूनी रूप से वापस करने या गोद लेने की प्रक्रिया खत्म करने की मांग नहीं की है। वह चाहती हैं कि बच्चे की देखभाल कहीं ऐसी जगह हो, जहां उसकी जरूरतों को समझा और संभाला जा सके।
महिला ने अदालत को बताया है कि उनके पति की 2021 में मृत्यु हो गई। इसके बाद वह अपने बुजुर्ग मां के साथ अलीगढ़ चली गईं। घर में अब कोई पुरुष सदस्य नहीं है और मां-बेटी दोनों की अपनी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हैं। दूसरी तरफ बच्चे के व्यवहार को लेकर लगातार मुश्किलें बढ़ती गईं। इस साल हुई चिकित्सकीय जांच में बच्चे में हल्की बौद्धिक अक्षमता की बात सामने आई। याचिका में उसके आक्रामक व्यवहार, पैसे और सामान लेने तथा घर से चले जाने जैसी समस्याओं का भी जिक्र किया गया है।
बच्चे के जीवन में मुश्किलें गोद लिए जाने के कुछ समय बाद ही शुरू हो गई थीं। परिवार ने शुरुआत में माना कि शायद असम से नोएडा आने और अचानक वातावरण बदलने के कारण बच्चा परेशान है। लेकिन 2018 में स्कूल में एक घटना के बाद उसे स्कूल से निकाल दिया गया। बाद में पिता की मृत्यु के बाद जब परिवार अलीगढ़ पहुंचा और बच्चे का दाखिला वहां के एक स्कूल में कराया गया, तो वहां भी व्यवहार संबंधी शिकायतों के बाद उसे स्कूल से निकाल दिया गया।
इसके बाद परिवार की चिंता और बढ़ती गई। याचिका में कहा गया है कि बच्चे के व्यवहार को लेकर एक और शिकायत पुलिस तक पहुंची थी। मां ने उसकी उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए शिकायत आगे नहीं बढ़ाने का अनुरोध किया। घर में पैसे और कीमती सामान गायब होने तथा बच्चे के घर से चले जाने की घटनाओं ने भी मां की परेशानी बढ़ा दी। आखिरकार उन्होंने बच्चे की चिकित्सकीय जांच कराने का फैसला किया।
चिकित्सकीय जांच के बाद परिवार को पता चला कि बच्चे को विशेष देखभाल और व्यवहार संबंधी सहायता की जरूरत है। याचिका में बच्चे के व्यवहार को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की गई हैं। मां ने अदालत को बताया कि घर में वह और उनकी बुजुर्ग मां ही हैं और दोनों के लिए स्थिति लगातार कठिन होती जा रही है। एक मां के लिए अपने ही बच्चे के बारे में अदालत से यह कहना कि वह अब उसकी देखभाल करने में सक्षम नहीं है, कितना कठिन रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना भी आसान नहीं है।
लेकिन इस कहानी में बच्चे की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। 14 साल की उम्र में शायद वह यह समझ भी नहीं पा रहा होगा कि जिस घर को उसने अपना समझा, वहां अब उसके लिए जगह क्यों मुश्किल हो गई है। उसके व्यवहार के पीछे क्या कारण हैं, उसके बचपन में क्या बीता, उसने माता-पिता से जुड़ने और फिर पिता को खोने का अनुभव किस तरह झेला—इन सवालों के जवाब केवल अनुशासन या सजा में नहीं मिल सकते। उसे चिकित्सा, परामर्श, शिक्षा और लगातार देखभाल की जरूरत हो सकती है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण यानी CARA और बाल कल्याण समिति से जवाब मांगा है। अदालत इस मामले पर 30 सितंबर को फिर सुनवाई करेगी। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चे की देखभाल कौन करेगा। सवाल यह भी है कि उसकी भावनात्मक, शैक्षणिक और चिकित्सकीय जरूरतों को कौन समझेगा और उसे ऐसा वातावरण कैसे मिलेगा जहां वह खुद को अस्वीकार किया हुआ महसूस न करे।
कानून में ऐसी परिस्थितियों के लिए दत्तक ग्रहण की व्यवस्था मौजूद है। औपचारिक गोद लेने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले बच्चा नए परिवार के साथ तालमेल नहीं बैठा पाता है तो उसे ‘डिसरप्शन’ की स्थिति माना जा सकता है। लेकिन जब गोद लेने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो, तब स्थिति अलग होती है। दत्तक ग्रहण को खत्म करने यानी ‘डिसॉल्यूशन’ के लिए अदालत का आदेश जरूरी होता है। इसका मतलब यह है कि गोद लिया हुआ बच्चा कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे परिवार अपनी सुविधा के हिसाब से वापस कर दे। हर मामले में बच्चे के हित को केंद्र में रखकर कानूनी प्रक्रिया अपनानी होती है।
CARA के 2020 के आंकड़ों के अनुसार, 2017 से 2019 के बीच गोद लिए गए बच्चों में करीब 4 से 5% बच्चे वापस दत्तक ग्रहण एजेंसियों तक पहुंचे थे। यह आंकड़ा अपने आप में एक बड़ी सामाजिक चुनौती की ओर इशारा करता है। बच्चा गोद लेना सिर्फ उसे घर देने का फैसला नहीं है। यह उसके पूरे जीवन की जिम्मेदारी स्वीकार करना है। और जब बच्चे को विशेष जरूरतें हों, तो परिवार की जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है।
इस कहानी का सबसे कठिन सवाल शायद यह नहीं है कि मां सही हैं या बच्चा। असली सवाल यह है कि क्या हमारे पास ऐसे बच्चों और परिवारों के लिए पर्याप्त व्यवस्था है, जहां परिवार टूटने की स्थिति में बच्चे को फिर से कहीं सुरक्षित जगह मिल सके? क्या ऐसे माता-पिता को समय रहते परामर्श, विशेषज्ञ सहायता और व्यवहार संबंधी उपचार उपलब्ध कराया जाता है? और क्या बच्चे को यह महसूस कराए बिना उसकी मदद की जा सकती है कि उसे उसके अपने परिवार ने छोड़ दिया है?
कभी-कभी एक बच्चा सिर्फ इसलिए मुश्किल नहीं बन जाता क्योंकि वह ऐसा चाहता है। उसके पीछे कोई मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक या विकास संबंधी परेशानी हो सकती है, जिसे समझने में परिवार भी असमर्थ हो सकता है। इस मामले में अदालत के सामने अब सिर्फ कानूनी सवाल नहीं है। सामने एक 14 साल का बच्चा है, एक अकेली मां है, एक बुजुर्ग नानी है और एक ऐसा परिवार है जो अपनी क्षमता की सीमा तक पहुंच चुका है।
जिस बच्चे को 6 साल की उम्र में एक घर मिला था, आज उसके लिए सबसे जरूरी है कि उसे फिर से ‘घर’ मिले—चाहे वह घर जैविक परिवार का हो, दत्तक परिवार का हो या किसी सुरक्षित देखभाल संस्था का। लेकिन वह जगह ऐसी होनी चाहिए जहां उसे बोझ नहीं, एक बच्चे के रूप में देखा जाए; जहां उसके व्यवहार से ज्यादा उसकी जरूरतों को समझा जाए और जहां उसके भविष्य को बचाने की कोशिश की जाए।



