बिजनेस/ कॉरपोरेट/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 सितंबर 2026
रतन टाटा के दौर में टाटा समूह की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ उसका कारोबार नहीं था, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की थी जिसमें चेहरा बदल सकता था, लेकिन समूह की दिशा और संस्थागत संतुलन पर सवाल कम ही उठते थे। अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद अब करीब 2 साल के भीतर टाटा सन्स के भीतर जो घटनाक्रम सामने आया है, उसने पहली बार इस सवाल को बहुत सामने ला दिया है—क्या रतन टाटा के बाद टाटा समूह के भीतर सत्ता और फैसले लेने का तरीका बदल रहा है? यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरा टाटा समूह बदल चुका है, लेकिन N चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल, टाटा ट्रस्ट्स के विरोध, टाटा सन्स की संभावित लिस्टिंग और कंपनी के Articles of Association को लेकर खुला विवाद यह जरूर दिखाता है कि समूह के भीतर पुराने संतुलन को लेकर गंभीर मतभेद सामने आ चुके हैं।
सबसे पहले उस फैसले को समझिए जिसने इस पूरे विवाद को जन्म दिया। N चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म होना था। 12 अगस्त 2026 को चंद्रशेखरन ने बोर्ड को बताया था कि वह अगला कार्यकाल नहीं लेना चाहते। टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले को स्वीकार करते हुए नए चेयरमैन की तलाश की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। लेकिन 17 सितंबर को कहानी अचानक बदल गई। बोर्ड ने चंद्रशेखरन से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा और उन्होंने हामी भर दी। इसके बाद बोर्ड ने 4-1 के बहुमत से उन्हें अगले 5 साल के लिए फिर नियुक्त करने का फैसला कर दिया।
यहीं से टाटा ट्रस्ट्स और टाटा सन्स आमने-सामने आ गए। बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के 2 नामित निदेशक हैं—नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन। चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर वेणु श्रीनिवासन ने समर्थन किया, जबकि नोएल टाटा ने विरोध किया। यानी पूरे बोर्ड में वोट 4-1 था, लेकिन ट्रस्ट्स के दोनों नामित निदेशकों के बीच वोट 1-1 हो गया। यही 1-1 का आंकड़ा अब करोड़ों-अरबों रुपये के कारोबारी साम्राज्य के भविष्य से जुड़ा सबसे बड़ा कानूनी सवाल बन गया है।
क्यों? क्योंकि टाटा सन्स के Articles of Association में टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों को कुछ विशेष मतदान अधिकार दिए गए हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा सन्स की करीब 66% हिस्सेदारी है और Article 104B के तहत निर्धारित हिस्सेदारी बनाए रखने पर उन्हें बोर्ड के एक-तिहाई निदेशक नामित करने का अधिकार मिलता है। Article 121 कुछ महत्वपूर्ण बोर्ड फैसलों के लिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के समर्थन की अतिरिक्त शर्त रखता है। अब विवाद यह है कि 2 नामित निदेशकों में 1 समर्थन और 1 विरोध होने पर क्या यह जरूरी बहुमत पूरा माना जाएगा?
टाटा ट्रस्ट्स का जवाब साफ है—नहीं। ट्रस्ट्स का कहना है कि 2 में बहुमत का अर्थ 2 समर्थन है। क्योंकि नोएल टाटा ने विरोध किया, इसलिए आवश्यक ‘अफर्मेटिव वोट’ नहीं मिला। ट्रस्ट्स ने यह भी कहा है कि बोर्ड के चेयरमैन का casting vote ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के बीच पैदा हुए 1-1 के अंतर को खत्म नहीं कर सकता। दूसरी तरफ चंद्रशेखरन पक्ष और टाटा सन्स की ओर से अलग कानूनी व्याख्या सामने आई है कि Articles में बराबरी की स्थिति के लिए casting vote का प्रावधान मौजूद है और उसे प्रभावी माना जाना चाहिए। यही वह कानूनी पेच है जिसका जवाब अदालत को देना पड़ सकता है।
अब सवाल उठता है कि रतन टाटा के बाद इसमें इतना बड़ा बदलाव क्या है? रतन टाटा के समय भी टाटा सन्स के भीतर बोर्ड, ट्रस्ट्स और पेशेवर नेतृत्व के बीच अधिकारों का ढांचा मौजूद था। लेकिन सार्वजनिक रूप से सामने आया मौजूदा विवाद इसलिए अलग है क्योंकि इस बार बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले Tata Trusts और Tata Sons के बोर्ड के बीच चेयरमैन के भविष्य को लेकर सीधा टकराव सामने आया है। Reuters ने इसे Tata Group के भीतर एक बड़े कॉरपोरेट विवाद के रूप में रिपोर्ट किया है, जिसमें चंद्रशेखरन का कार्यकाल, टाटा सन्स की लिस्टिंग और दूसरे बड़े कारोबारी मुद्दे शामिल हैं।
और कहानी सिर्फ चंद्रशेखरन की कुर्सी तक सीमित नहीं है। टाटा सन्स की लिस्टिंग भी इस विवाद का दूसरा बड़ा सिरा है। 11 सितंबर को RBI ने टाटा सन्स की Core Investment Company के रूप में अपनी पंजीकरण स्थिति खत्म करने की अर्जी स्वीकार नहीं की। टाटा सन्स अब लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है। 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में लिस्टिंग की दिशा में कदम आगे बढ़ाने का फैसला भी हुआ। नोएल टाटा ने इस कदम का विरोध किया है, जबकि टाटा सन्स की ओर से RBI के नियामकीय ढांचे का पालन करने की बात कही गई है।
यहीं से मामला और बड़ा हो जाता है। टाटा सन्स कोई छोटी कंपनी नहीं है। यही वह holding company है जिसके जरिए टाटा समूह की कई बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी रखी जाती है। टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66% हिस्सेदारी होने के बावजूद अगर कंपनी का बोर्ड ऐसे बड़े फैसले लेता है जिन पर ट्रस्ट्स के नेतृत्व को आपत्ति है, तो सवाल सिर्फ एक नियुक्ति का नहीं रहता। सवाल यह बन जाता है कि टाटा सन्स में अंतिम प्रभाव किसका है—बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले ट्रस्ट्स का, बोर्ड का या कंपनी के Articles में दर्ज विशेष अधिकारों का?
इस सवाल की जड़ 2016 के साइरस मिस्त्री विवाद तक जाती है। मिस्त्री को टाटा सन्स के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद मामला अदालतों तक पहुंचा था। उस कानूनी लड़ाई में टाटा ट्रस्ट्स के विशेष मतदान अधिकार भी चुनौती के केंद्र में आए। 2021 में Supreme Court ने Tata Sons के पक्ष में फैसला देते हुए ट्रस्ट्स के इन विशेष ‘अफर्मेटिव वोटिंग’ अधिकारों को हटाने की मांग को स्वीकार नहीं किया। अब टाटा ट्रस्ट्स उसी फैसले का हवाला देकर कह रहा है कि जिस व्यवस्था का बचाव टाटा सन्स ने Supreme Court के सामने किया था, उसे आज नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन यहां एक जरूरी फर्क भी है। 2021 का Supreme Court फैसला आज के चंद्रशेखरन विवाद का सीधा फैसला नहीं देता। मिस्त्री मामले में ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के बीच ऐसी 1-1 की स्थिति नहीं थी। आज का असली सवाल यह है कि अगर ट्रस्ट्स के 2 नामित निदेशक खुद अलग-अलग वोट करें, तो Article 121 का ‘बहुमत’ कैसे तय होगा और क्या casting vote उस स्थिति को बदल सकता है? यही वह नया कानूनी सवाल है जिसका जवाब 2021 के फैसले में सीधे नहीं मिलता।
और शायद यही रतन टाटा के बाद टाटा समूह में दिखाई दे रहे बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है। यहां किसी एक व्यक्ति के अच्छे या बुरे होने का सवाल नहीं है। असली सवाल है संस्थागत शक्ति का संतुलन। रतन टाटा के दौर में समूह की सार्वजनिक छवि काफी हद तक एक साझा नेतृत्व और ट्रस्ट-आधारित दर्शन से जुड़ी रही। अब नोएल टाटा की अगुवाई वाले ट्रस्ट्स और चंद्रशेखरन के नेतृत्व वाले टाटा सन्स बोर्ड के बीच अधिकारों की व्याख्या पर सार्वजनिक मतभेद सामने आ गया है। यह अपने आप में टाटा की कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए एक बड़ा घटनाक्रम है।
इस बदलाव का पैमाना भी छोटा नहीं है। एक तरफ चंद्रशेखरन को अगले 5 साल के लिए बनाए रखने का फैसला है, दूसरी तरफ टाटा सन्स को संभावित रूप से शेयर बाजार में लाने की तैयारी है। तीसरी तरफ Tata Trusts अपने विशेष अधिकारों और 66% हिस्सेदारी की भूमिका पर जोर दे रहा है। चौथी तरफ 2021 के Supreme Court फैसले को फिर से सामने लाया गया है। और इन सबके बीच टाटा सन्स के अपने नियमों की व्याख्या ही विवाद का केंद्र बन गई है।
इसलिए “क्या रतन टाटा के बाद टाटा में सब कुछ बदल रहा है?” इसका अभी सीधा जवाब हां या नहीं में देना सही नहीं होगा। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि रतन टाटा के निधन के बाद पहली बार टाटा सन्स के भीतर नेतृत्व, बोर्ड की शक्ति, ट्रस्ट्स के विशेष अधिकार और कंपनी की भविष्य की संरचना को लेकर इतना खुला और गंभीर टकराव सामने आया है। यह विवाद अदालत तक जाता है या बातचीत से सुलझता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल असली कहानी चंद्रशेखरन की कुर्सी से कहीं बड़ी है—कहानी इस बात की है कि रतन टाटा के बाद टाटा सन्स में शक्ति का अगला संतुलन आखिर किस तरह तय होगा।



