राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | डिब्रूगढ़/शिवसागर (असम) | 31 जुलाई 2026
“19 जुलाई असम के लिए मनहूस तारीख बन गई है। पहले इसी तारीख को हमने अपने प्रिय गायक जुबीन गर्ग को खोया और अब उसी दिन आई बाढ़ ने न जाने कितने लोगों से उनका घर, उनका परिवार और उनकी पूरी दुनिया छीन ली।” डिब्रूगढ़ से शिवसागर जाते समय एक टैक्सी चालक की यह बात सुनकर समझ में आ जाता है कि इस बार असम ने केवल बाढ़ नहीं देखी, बल्कि ऐसा दर्द झेला है जिसे आने वाली पीढ़ियां भी शायद भूल नहीं पाएंगी।
असम के निचले इलाकों में रहने वाले लोग हर साल बाढ़ का सामना करते हैं। वहां के लोगों ने बाढ़ के साथ जीना जैसे सीख लिया है। लेकिन ऊपरी असम के लोगों ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन पानी उनके पूरे गांव को ही मिटा देगा। 19 जुलाई को नागा पहाड़ियों में हुई लगातार बारिश के बाद अचानक आई बाढ़ ने देखते ही देखते खेत, घर, सड़कें, स्कूल और मंदिर सब कुछ अपने साथ बहा दिया। कई गांव ऐसे हैं जहां अब सिर्फ मिट्टी का ढेर बचा है। लोग अपने ही घर की जगह खड़े होकर पहचानने की कोशिश कर रहे हैं कि कभी यहां उनका आंगन हुआ करता था।
जहां कभी बच्चों की हंसी सुनाई देती थी, वहां अब सन्नाटा है। पूरे गांव पर कीचड़ की मोटी परत जमी हुई है। टूटी हुई दीवारें, बह चुके पेड़, मलबे में दबे सामान और चारों ओर फैली सड़ांध इस त्रासदी की गवाही दे रहे हैं। कई परिवारों के पास अब पहनने के कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं बचा। जिन हाथों ने वर्षों की मेहनत से घर बनाया था, वे आज उसी घर के मलबे में अपनी जिंदगी की बची-खुची निशानियां तलाश रहे हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष असम में बाढ़ से 78 लोगों की जान जा चुकी है। बाढ़ के चरम पर 7 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे। एक समय 1.15 लाख से ज्यादा लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। हालांकि पानी धीरे-धीरे उतर रहा है, लेकिन अभी भी हजारों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब वे लौटेंगे तो आखिर लौटेंगे कहां?
प्राकृतिक आपदाएं केवल मकान नहीं गिरातीं, वे इंसानों का भरोसा भी तोड़ देती हैं। जिन बच्चों ने अपनी किताबें, खिलौने और स्कूल खो दिए, जिन बुजुर्गों ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई एक ही रात में बहते देखी और जिन किसानों की फसलें मिट्टी में मिल गईं, उनके लिए यह बाढ़ सिर्फ एक खबर नहीं बल्कि जीवनभर का घाव बन चुकी है।
आज असम को केवल राहत सामग्री की जरूरत नहीं है। उसे लंबे समय तक साथ निभाने वाली पुनर्वास योजना, मजबूत बाढ़ प्रबंधन, सुरक्षित आवास और ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिससे हर साल हजारों परिवार फिर से बेघर होने के डर में न जिएं। क्योंकि किसी भी आपदा के बाद सबसे कठिन काम पानी निकालना नहीं होता, बल्कि लोगों के दिलों में उम्मीद वापस लाना होता है।




