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वोट चोरी पर घिरा चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार ने फिर बदला नियम!

SIR में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर किए गए मतदाताओं को अब फॉर्म-6 के बजाय दोबारा Enumeration Form भरने का मौका; दिल्ली समेत सात राज्यों के लिए आयोग का नया निर्देश, पहले गलत फॉर्म भरने की मजबूरी पर उठे सवाल

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 नवंबर 2026

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल लगातार बढ़ रहे हैं। अब आयोग ने उन मतदाताओं को दोबारा Enumeration Form भरने की अनुमति दे दी है, जिन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट यानी ASDD श्रेणी में डालकर ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया था। इस फैसले के साथ आयोग ने अपनी पहले की प्रक्रिया में बदलाव किया है। सवाल सीधा है—जब इन मतदाताओं के फॉर्म पहले वापस नहीं मिले, तो उन्हें सूची से बाहर करने के बाद अब दोबारा फॉर्म भरने का रास्ता क्यों खोलना पड़ा?

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग का यह नया निर्देश दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, झारखंड, तेलंगाना और नागालैंड में चल रही SIR प्रक्रिया पर लागू होगा। आयोग ने कहा है कि जिन मतदाताओं के Enumeration Form जारी किए गए थे, लेकिन वापस प्राप्त नहीं हुए, उन्हें अब फॉर्म-6 के बजाय दोबारा Enumeration Form भरकर अंतिम मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने का अवसर मिलेगा।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फॉर्म-6 सामान्यतः पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पहले से मतदाता रहे लोगों को भी इसी फॉर्म के सहारे नाम जुड़वाने की प्रक्रिया में जाना पड़ता, जबकि अब आयोग ने उनके लिए पुराने Enumeration Form को दोबारा भरने का रास्ता खोल दिया है। Scroll.in +1

पहले फॉर्म-6 का रास्ता, अब पुराना फॉर्म दोबारा भरने की छूट

चुनाव आयोग ने 3 नवंबर को स्पष्ट किया था कि ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर हुए मतदाता फॉर्म-6 भरकर अपना नाम जुड़वा सकते हैं। लेकिन अब 6 नवंबर को आयोग ने नई व्यवस्था जारी कर दी है। जिन मतदाताओं के नाम ASDD श्रेणी में डालकर हटाए गए थे, वे अब फॉर्म-6 के बजाय अपना Enumeration Form दोबारा भर सकते हैं।

यानी पहले से मतदाता रहे लोगों को नए मतदाता की तरह पंजीकरण कराने की प्रक्रिया में भेजने के बजाय आयोग ने अब उन्हें पुराने मतदाता के रूप में अपना नाम बहाल कराने का रास्ता दिया है। यह बदलाव अपने आप में बताता है कि आयोग की पहले वाली प्रक्रिया पर सवाल उठे थे और उसे दोबारा व्यवस्था बदलनी पड़ी। India News +2

सुप्रीम कोर्ट में फॉर्म-6 पर सवाल, फिर आयोग का नया फैसला

इस पूरे घटनाक्रम में 28 अक्टूबर की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई भी महत्वपूर्ण है। अदालत ने सवाल उठाया था कि जो लोग पहले से मतदाता सूची में दर्ज थे, उन्हें नाम हटने के बाद पहली बार मतदाता बनने वाला फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है। अदालत ने ऐसे मतदाताओं के नाम बहाल करने के लिए वैकल्पिक प्रक्रिया पर विचार करने को कहा था।

इसके बावजूद 3 नवंबर को आयोग ने फॉर्म-6 के जरिए नाम जुड़वाने की व्यवस्था स्पष्ट की। अब 6 नवंबर को उसी आयोग ने ASDD श्रेणी के मतदाताओं के लिए दोबारा Enumeration Form भरने का विकल्प खोल दिया है। India News +1

सवाल यह है कि जब मतदाता पहले से सूची में थे, तो उन्हें पहले फॉर्म-6 के रास्ते पर क्यों भेजा गया? क्या आयोग को यह समझने में इतना समय लगना चाहिए था कि पुराने मतदाताओं और पहली बार पंजीकरण कराने वालों की स्थिति अलग है?

सिर्फ आदेश जारी करना काफी नहीं, नाम वापस जोड़ना भी जरूरी

नए निर्देश के तहत आयोग ने बूथवार ASDD सूची दोबारा प्रदर्शित करने को कहा है। ये सूचियां संबंधित मतदान केंद्रों, पंचायत भवनों और शहरी स्थानीय निकाय कार्यालयों के नोटिस बोर्ड पर लगाई जाएंगी। संबंधित मुख्य निर्वाचन अधिकारियों की वेबसाइट पर भी इन्हें पढ़ने योग्य PDF के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा। सूची में नाम शामिल न होने के संभावित कारण भी बताए जाएंगे।

जिला निर्वाचन अधिकारियों और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों को ECINET के माध्यम से दोबारा भरे जा सकने वाले Enumeration Form तैयार करने होंगे। बूथ लेवल अधिकारियों को संबंधित मतदाताओं से संपर्क करना होगा और जहां संभव हो, घर जाकर, व्हाट्सऐप, ईमेल या SMS के जरिए फॉर्म उपलब्ध कराना होगा।

मतदाता अपने पुराने EPIC नंबर का इस्तेमाल करके चुनाव आयोग की वेबसाइट या ECINET ऐप से भी फॉर्म डाउनलोड और भर सकेंगे। जिन लोगों ने पहले ही फॉर्म-6 जमा कर दिया है, उन्हें दोबारा Enumeration Form जमा करने की जरूरत नहीं होगी। उनके आवेदन पहले से निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निपटाए जाएंगे। India Today +2

ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही तय करने की मांग

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चल रहे SIR को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। अब आयोग के इस नए फैसले ने उन सवालों को और महत्वपूर्ण बना दिया है। मतदाता सूची कोई सामान्य सरकारी दस्तावेज नहीं है। यही सूची तय करती है कि देश का नागरिक चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर पाएगा या नहीं।

जिन लोगों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट बताकर सूची से बाहर किया गया, उनके नाम हटाने की प्रक्रिया कितनी विश्वसनीय थी? कितने लोगों तक Enumeration Form वास्तव में पहुंचा? कितने लोगों के फॉर्म वापस नहीं मिले और कितने लोगों को बिना पर्याप्त सूचना के ड्राफ्ट सूची से बाहर कर दिया गया? आयोग को इन सवालों का सार्वजनिक जवाब देना चाहिए।

सबसे अहम बात यह है कि नाम दोबारा जुड़वाने की जिम्मेदारी केवल नागरिकों पर डालकर आयोग अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। जब किसी मतदाता का नाम हटाया जाता है, तो उसे इसकी जानकारी देना, कारण बताना और उसे समय रहते अपनी बात रखने का अवसर देना भी आयोग की जिम्मेदारी है।

अब सात राज्यों के मतदाताओं को फिर लगानी होगी उम्मीद

दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, झारखंड, तेलंगाना और नागालैंड के प्रभावित मतदाताओं के लिए यह नया निर्देश राहत का अवसर है। लेकिन असली परीक्षा अब इसके जमीन पर लागू होने की है। BLO प्रभावित लोगों तक पहुंचते हैं या नहीं, सूची सार्वजनिक होती है या नहीं और पात्र मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में वापस जुड़ते हैं या नहीं—इस पर निगरानी जरूरी है।

आयोग ने अधिकारियों से ऐसी निगरानी व्यवस्था बनाने को भी कहा है जिससे कोई पात्र मतदाता अंतिम सूची में शामिल होने के अवसर से वंचित न रहे और डुप्लीकेट नाम भी न जुड़ें। Akashvani News +1

यह मामला केवल फॉर्म-6 और Enumeration Form के बीच चुनाव का नहीं है। सवाल उस प्रक्रिया का है जिसमें पहले से मतदाता रहे लोगों के नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हो गए और फिर उन्हें अपना नाम वापस पाने के लिए नई प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।

ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग को अब साफ जवाब देना चाहिए—पहले की व्यवस्था में गलती कहां हुई, कितने पात्र मतदाता बाहर हुए और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले हर वास्तविक मतदाता का नाम शामिल कराने की जिम्मेदारी कौन लेगा?

वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना आयोग की मेहरबानी नहीं, नागरिक का अधिकार है। चुनाव आयोग का काम मतदाता का नाम बचाना है, उसे बार-बार अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए मजबूर करना नहीं।

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