ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 20 मई 2026
दुनिया अभी कोविड महामारी की भयावह स्मृतियों से पूरी तरह बाहर भी नहीं निकल पाई थी कि अफ्रीका से एक और खतरनाक चेतावनी सामने आ गई है। मध्य अफ्रीका में फैले इबोला वायरस के नए प्रकोप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को गंभीर चिंता में डाल दिया है। कांगो और आसपास के क्षेत्रों में अब तक 131 लोगों की मौत और 500 से अधिक संदिग्ध संक्रमणों की खबरें सामने आ चुकी हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस बार फैल रहा Bundibugyo strain ऐसा प्रकार है, जिसके लिए अभी तक कोई स्वीकृत वैक्सीन या प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है। WHO प्रमुख टेड्रोस अधानोम ने खुद इस महामारी की “गति और फैलाव” को बेहद खतरनाक बताया है। लेकिन सवाल सिर्फ बीमारी का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या दुनिया फिर एक बार महामारी को तब तक नजरअंदाज करेगी, जब तक वह अमीर देशों के दरवाजे तक नहीं पहुंच जाती?
इतिहास गवाह है कि वैश्विक स्वास्थ्य संकटों को लेकर दुनिया का रवैया अक्सर बेहद असमान रहा है। जब तक कोई बीमारी अफ्रीका, एशिया या गरीब देशों तक सीमित रहती है, तब तक वह “स्थानीय संकट” मानी जाती है। लेकिन जैसे ही वही बीमारी यूरोप या अमेरिका की सीमाओं को छूने लगती है, अचानक वह “वैश्विक आपातकाल” बन जाती है। कोविड महामारी के दौरान भी दुनिया ने यही देखा था। शुरुआती चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया, राजनीतिक नेतृत्व ने विज्ञान को नजरअंदाज किया, और जब तक कार्रवाई हुई, तब तक लाखों जिंदगियां प्रभावित हो चुकी थीं। आज इबोला के मामले में भी वही ढर्रा दोहराता दिखाई दे रहा है।
यह प्रकोप केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि वैश्विक असमानता का आईना भी है। जिस क्षेत्र में यह वायरस फैल रहा है, वह लंबे समय से गृहयुद्ध, राजनीतिक हिंसा और संसाधनों की लूट से जूझ रहा है। अस्पताल कमजोर हैं, दवाइयों की भारी कमी है, और स्वास्थ्य ढांचा लगभग टूट चुका है। WHO ने साफ कहा है कि फंडिंग की कमी महामारी से लड़ने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। यही वह जगह है जहां वैश्विक राजनीति और मानवीय संवेदनशीलता का असली चेहरा सामने आता है। दुनिया हथियारों पर खरबों डॉलर खर्च कर सकती है, लेकिन गरीब देशों के स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं जुटा पाती।
सबसे विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि जिस अमेरिका ने कोविड के दौरान वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व का दावा किया था, वही अब WHO से दूरी बना चुका है। ट्रंप प्रशासन द्वारा WHO से अलग होने और USAID जैसे संस्थानों के बजट में कटौती ने वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे को कमजोर किया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अंतरराष्ट्रीय सहयोग कमजोर पड़ा, तो भविष्य की महामारियां और अधिक खतरनाक साबित हो सकती हैं। लेकिन आज दुनिया का राजनीतिक माहौल सहयोग नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद, आर्थिक संरक्षणवाद और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से संचालित हो रहा है। महामारी वायरस नहीं देखती, लेकिन राजनीति हमेशा सीमाएं देखती है।
इबोला का डर इसलिए भी बड़ा है क्योंकि यह वायरस बेहद घातक माना जाता है। इसके संक्रमण की मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। मरीजों में तेज बुखार, उल्टी, दस्त, शरीर से रक्तस्राव और तेजी से अंग विफल होने जैसी स्थितियां पैदा होती हैं। इस बार स्थिति इसलिए और गंभीर है क्योंकि संक्रमण कई हफ्तों तक बिना पहचान के फैलता रहा। इसका मतलब है कि वायरस पहले ही सीमाओं के पार पहुंच चुका हो सकता है। युगांडा और अन्य सीमावर्ती इलाकों में मामलों की आशंका ने पूरे क्षेत्र में भय का माहौल बना दिया है।
लेकिन महामारी का एक राजनीतिक चेहरा भी होता है। कोविड के बाद दुनिया ने यह सीखा था कि स्वास्थ्य संकट केवल अस्पतालों का विषय नहीं होता; वह अर्थव्यवस्था, राजनीति, सामाजिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी प्रभावित करता है। महामारी के दौरान लॉकडाउन, बेरोजगारी, आर्थिक मंदी और सामाजिक अविश्वास ने पूरी दुनिया को बदल दिया था। आज यदि इबोला जैसी बीमारी बड़े पैमाने पर फैलती है, तो उसका असर केवल अफ्रीका तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक व्यापार, यात्रा, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार — सब प्रभावित होंगे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दुनिया ने कोविड से वास्तव में कुछ सीखा भी है? क्या अब भी वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लिया जाएगा, या फिर राजनीतिक बयानबाजी और आर्थिक हित हावी रहेंगे? क्या वैश्विक स्वास्थ्य को “मानव अधिकार” माना जाएगा या केवल “संकट प्रबंधन” का विषय? क्योंकि महामारी हमें हमेशा एक ही सबक देती है — मानवता की सुरक्षा केवल राष्ट्रीय सीमाओं से संभव नहीं है। जब तक दुनिया का सबसे कमजोर स्वास्थ्य तंत्र सुरक्षित नहीं होगा, तब तक कोई भी देश वास्तव में सुरक्षित नहीं हो सकता।
इबोला का यह नया प्रकोप केवल अफ्रीका की खबर नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। यह याद दिलाता है कि विज्ञान की अनदेखी, स्वास्थ्य ढांचे की उपेक्षा और वैश्विक असमानता मिलकर कितनी बड़ी त्रासदी पैदा कर सकते हैं। कोविड के बाद दुनिया ने “Never Again” कहा था। लेकिन इतिहास का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि इंसान अक्सर सबसे बड़ी त्रासदियों से भी बहुत कम सीखता है।




