ओपिनियन | आलोक रंजन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 मई 2026
दुनिया की राजनीति अक्सर उन तस्वीरों से समझी जाती है जो कैमरों में कैद होती हैं। पिछले एक सप्ताह में बीजिंग से आई दो तस्वीरें शायद आने वाले दशक की वैश्विक राजनीति को परिभाषित करेंगी। पहली तस्वीर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ दिखाई दिए। दूसरी तस्वीर में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बीजिंग पहुंचते दिखाई दिए। दुनिया की दो सबसे बड़ी सैन्य और राजनीतिक शक्तियों — अमेरिका और रूस — के शीर्ष नेताओं का कुछ ही दिनों के अंतराल में चीन पहुंचना केवल कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं है; यह बदलती विश्व व्यवस्था का प्रतीक है। यह उस युग का संकेत है जहां बीजिंग अब केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्रीय मंच बनता जा रहा है।
शीत युद्ध के दौर में दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुई थी — वाशिंगटन और मॉस्को। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है, अमेरिका वैश्विक नेतृत्व की अपनी पुरानी स्थिति बचाने में व्यस्त है, और चीन धीरे-धीरे खुद को “स्थिर शक्ति” के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। यही कारण है कि आज हर बड़ा नेता बीजिंग से अपने संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहता है। ट्रंप की यात्रा अमेरिका-चीन तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश थी, जबकि पुतिन की यात्रा रूस-चीन साझेदारी को सार्वजनिक रूप से मजबूत दिखाने का प्रयास है। लेकिन इन दोनों यात्राओं के बीच सबसे बड़ा लाभ किसे मिला? जवाब स्पष्ट है — चीन को।
शी जिनपिंग की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह टकराव और साझेदारी — दोनों को एक साथ साधने की कोशिश करते हैं। चीन अमेरिका से व्यापार, तकनीक और वैश्विक आर्थिक स्थिरता चाहता है, लेकिन वह रूस को भी अपने रणनीतिक दायरे से बाहर नहीं जाने देना चाहता। यही कारण है कि बीजिंग अब ऐसी शक्ति की तरह व्यवहार कर रहा है जो एक साथ कई वैश्विक ध्रुवों से संवाद कर सकती है। यह वही भूमिका है जो कभी अमेरिका निभाता था। फर्क सिर्फ इतना है कि चीन इसे “साझेदारी” और “स्थिरता” की भाषा में प्रस्तुत करता है।
पुतिन की यह यात्रा रूस की मजबूरी को भी उजागर करती है। यूक्रेन युद्ध ने रूस को आर्थिक और सैन्य दोनों स्तरों पर कमजोर किया है। पश्चिमी प्रतिबंधों ने मॉस्को को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से काफी हद तक अलग-थलग कर दिया है। ऐसे समय में चीन रूस के लिए केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि आर्थिक जीवनरेखा बन चुका है। रूसी तेल और गैस का सबसे बड़ा खरीदार चीन है। तकनीकी प्रतिबंधों के बीच चीन ही वह बाजार है जहां रूस अपनी आर्थिक उपस्थिति बनाए रख सकता है। यही कारण है कि पुतिन बार-बार बीजिंग की ओर देखते हैं। यह मित्रता जितनी वैचारिक दिखाई जाती है, उससे कहीं अधिक रणनीतिक और व्यावहारिक है।
लेकिन इस रिश्ते का दूसरा पहलू भी है। चीन और रूस आज भले ही साझेदार दिखाई दें, पर शक्ति संतुलन अब बराबरी का नहीं रहा। यूक्रेन युद्ध ने रूस को कमजोर और चीन को अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली बना दिया है। आज बीजिंग वह स्थिति हासिल कर चुका है जहां वह अमेरिका और रूस — दोनों से समानांतर संवाद कर सकता है, जबकि रूस ऐसा करने की स्थिति में नहीं है। यही कारण है कि कई विश्लेषक चीन-रूस संबंधों को “समान साझेदारी” नहीं, बल्कि “रणनीतिक निर्भरता” के रूप में देखने लगे हैं।
ट्रंप और पुतिन की लगातार यात्राएं एक और महत्वपूर्ण संकेत देती हैं — दुनिया अब स्पष्ट रूप से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। अमेरिका अब अकेला निर्णायक केंद्र नहीं रह गया है। रूस सैन्य शक्ति तो है, लेकिन आर्थिक रूप से सीमित है। यूरोप आंतरिक संकटों से जूझ रहा है। ऐसे में चीन वह शक्ति बनना चाहता है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार मार्गों और भू-राजनीतिक संवाद — सभी का केंद्र बने। यही कारण है कि बीजिंग आज केवल राजधानी नहीं, बल्कि “वैश्विक शक्ति मंच” की तरह व्यवहार कर रहा है।
यह पूरा घटनाक्रम भारत जैसे देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत ऐसे समय में अपनी विदेश नीति को संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है जब अमेरिका, रूस और चीन — तीनों के साथ संबंध अलग-अलग कारणों से महत्वपूर्ण हैं। लेकिन यदि आने वाले वर्षों में चीन वास्तव में वैश्विक कूटनीति का केंद्रीय मंच बनता है, तो एशिया की शक्ति राजनीति और अधिक जटिल हो जाएगी। भारत को तब केवल सीमा विवाद या व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ही नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव के स्तर पर भी चीन की बढ़ती उपस्थिति का सामना करना पड़ेगा।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या दुनिया वास्तव में “स्थिर बहुध्रुवीय व्यवस्था” की ओर बढ़ रही है, या यह केवल नए शक्ति संघर्षों की शुरुआत है? क्योंकि इतिहास बताता है कि जब भी वैश्विक शक्ति संतुलन बदलता है, दुनिया लंबे समय तक अस्थिर रहती है। आज बीजिंग मुस्कुराते हुए अमेरिका और रूस — दोनों का स्वागत कर रहा है। लेकिन इस मुस्कान के पीछे एक गहरी रणनीतिक महत्वाकांक्षा छिपी है — 21वीं सदी की विश्व राजनीति का केंद्रीय ध्रुव बनने की महत्वाकांक्षा।




