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अरावली पर्वत श्रृंखलाओं को खोद कर निर्माण

अरावली पर्वत श्रृंखलाओं को खोद कर निर्माण : संरक्षण और पर्यावरण की ऐसी तैसी करने की योजना

अखलाक अहमद | जयपुर 29 दिसंबर 2025

फार्महाउस, रिसॉर्ट, वेलनेस सेंटर, रेस्कुटोरेंट और कुछ अन्य रिहायशी और बाजारीकरण के प्रोजेक्ट्स… राजस्थान सरकार ने ऐसी जगह बनाने को मंजूरी का रास्ता साफ किया है जो पर्यावरण की अनदेखी करते हुए तैयार किया गया है। राजस्थान सरकार की यह योजना पर्यावरण के लिहाज से घातक सिद्ध होगी। क्योंकि जो दरवाजे उद्योगपतियों के लिए खोलने को मंजूरी का रास्ता बन रहा है वो स्थान है भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली। अरावली को लेकर सरकार उद्योगपतियों के लिए नए निर्माण स्थल बनाने को लेकर मंजूरी की पहल कर चुकी है। जिसका विरोध कर रहा है विपक्ष और साथ में हैं पर्यावरणविद जिन्होंने सरकार की इस मुहिम पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। मामला सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। पहाड़ी इलाकों में लो डेंसिटी परियोजनाओं को उद्योगपतियों के लिए खोलने की सरकारी पहल दिल्ली हरियाणा पंजाब हिमाचल और राजस्थान के पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित करेगी। प्रदूषण की मार इतनी बढ़ेगी कि आम इंसान की जिंदगी मुहाल हो जाएगी। अरावली पर्वत श्रृंखला 700 किलोमीटर में फैली है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान में लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस देकर जवाब मांगा है।

नए हिल कंज़र्वेशन मॉडल रेगुलेशंस 2024 के तहत पहाड़ियों को ढलान के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। 15 डिग्री से अधिक ढलान वाली पहाड़ियां (कैटेगरी C) को गैर-विकास योग्य बताया गया है, लेकिन 8 से 15 डिग्री ढलान वाली पहाड़ियों (कैटेगरी B) में सीमित निर्माण और गतिविधियों की अनुमति दी गई है। इन्हीं इलाकों में फार्महाउस और रिसॉर्ट जैसी परियोजनाओं को “कम घनत्व” के नाम पर मंज़ूरी मिल रही है।

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राजस्थान सरकार का कहना है कि ये नियम संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश हैं। सरकार के मुताबिक, हरियाली बढ़ाने, बायो-डाइजेस्टर, ड्रेनेज प्लान और ऊंचाई की सीमा जैसी शर्तों के साथ निर्माण की इजाज़त दी गई है। साथ ही यह भी दावा किया गया है कि जरूरत पड़ने पर पुराने फैसलों की समीक्षा का प्रावधान रखा गया है।

लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं को यह दलील मंज़ूर नहीं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि अरावली की नई परिभाषा पहले से तबाह हो चुके इकोसिस्टम में और तबाही मचाएगी। उनके मुताबिक, सिर्फ खनन ही नहीं, बल्कि रियल एस्टेट विकास के लिए भी रास्ता खोला जा रहा है, जो वन सर्वे ऑफ इंडिया की सिफारिशों के खिलाफ है। उन्होंने इसे “डबल इंजन सरकार” द्वारा दिल्ली-जयपुर कॉरिडोर में अरावली को कमजोर करने की कोशिश बताया।

जयपुर सहित कई इलाकों में अरावली संरक्षण के समर्थन में लोगों ने मार्च और प्रदर्शन भी किए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जल सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और हवा की गुणवत्ता की रीढ़ है। अगर यहां निर्माण बढ़ा, तो इसका असर दिल्ली-एनसीआर तक महसूस होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में खनन और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर स्वतः संज्ञान लिया है और केंद्र व राज्य सरकारों से जवाब मांगा है। अब सबकी निगाहें अदालत के अगले निर्देशों पर टिकी हैं—क्या विकास के नाम पर अरावली के साथ समझौता होगा, या देश की सबसे पुरानी पहाड़ियों को वाकई वह संरक्षण मिलेगा, जिसकी उन्हें सख़्त ज़रूरत है।

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