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नेपाल में तबाही, चीन पर सवाल! 12 दिन बाद भी तिब्बत की बाढ़ में कितने मरे-लापता—दुनिया को पूरी तस्वीर क्यों नहीं मिल रही?

नेपाल में 1,300 से ज्यादा मौतों और करीब 5,000 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आ चुकी है, लेकिन चीन के तिब्बत वाले हिस्से में मृतकों और लापता लोगों की संख्या को लेकर सीमित जानकारी; विदेशी पत्रकारों की पहुंच पर भी सवाल

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 8 सितंबर 2026

नेपाल ने नाम बताए, चीन में जानकारी अब भी सीमित

नेपाल और चीन की सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ को 12 दिन बीत चुके हैं, लेकिन इस त्रासदी के दोनों ओर सूचना की तस्वीर बेहद अलग दिखाई दे रही है। नेपाल ने बाढ़ के तुरंत बाद लापता विदेशी नागरिकों के नाम, उम्र और राष्ट्रीयता तक सार्वजनिक करना शुरू कर दिया था। इसके मुकाबले चीन ने तिब्बत में लापता 261 विदेशी नागरिकों के 23 देशों से होने की जानकारी पांच दिन बाद जारी की। नेपाल की तरफ अब तक 1,300 से ज्यादा मौतें और करीब 5,000 लोग लापता बताए जा रहे हैं, जबकि चीन की ओर से 40 से ज्यादा मौतें और 500 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या तिब्बत में इस आपदा की पूरी तस्वीर दुनिया के सामने आ रही है?

विदेशी पत्रकारों की पहुंच पर बड़ा सवाल

एनपीआर की रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में बाढ़ प्रभावित इलाके तक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय पहुंच बेहद सीमित रही। नेपाल की तरफ पत्रकारों, अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों और अन्य पर्यवेक्षकों को अपेक्षाकृत जल्दी पहुंच मिली और वहां पुलिस तथा आपदा प्रबंधन एजेंसियां नियमित जानकारी देती रहीं। दूसरी तरफ चीन में विदेशी पत्रकारों के लिए तिब्बत पहुंचना मुश्किल रहा और कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के लगातार अनुरोध के बाद भी उन्हें काफी समय बाद सीमित और व्यवस्थित दौरे के जरिए प्रवेश दिया गया। एनपीआर को उस दौरे में शामिल होने की अनुमति नहीं मिली।

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क्या तिब्बत में मौतों का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है?

तिब्बत की स्थिति को लेकर सबसे गंभीर सवाल यहीं से उठता है। इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के रयान फियोरेसी ने दावा किया कि ग्यिरोंग काउंटी में कम से कम 300 घर नष्ट हुए हैं और वहां वास्तविक मौतों की संख्या चीनी अधिकारियों द्वारा बताए गए आंकड़े से काफी अधिक हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों के तिब्बतियों को नियंत्रित स्थानों पर ले जाया गया और बाहरी दुनिया से उनका संपर्क बेहद सीमित हो गया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन्हें अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन स्वतंत्र पहुंच की कमी निश्चित रूप से पारदर्शिता का सवाल खड़ा करती है।

चीन का जवाब—हमने कुछ नहीं छिपाया

चीन के विदेश मंत्रालय ने पहले इन आरोपों को खारिज किया था। प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा था कि चीन सूचना जारी करने में खुला, पारदर्शी और समय पर रहा है। उन्होंने आपदा के बीच चीन के खिलाफ गलत सूचना और बदनाम करने वाली बातों को अनुचित बताया। चीन का कहना है कि सरकारी मीडिया और बचाव दल लगातार राहत और बचाव अभियान की जानकारी दे रहे हैं। इसलिए फिलहाल दो तस्वीरें सामने हैं—एक तरफ पारदर्शिता पर सवाल उठाने वाले समूह और दूसरी तरफ चीन का अपना दावा कि सूचना पर्याप्त और समय पर दी जा रही है।

चीनी मीडिया की खबरों में भी अंतर

एनपीआर ने चीन के वाणिज्यिक मीडिया के कामकाज में भी बदलाव की ओर ध्यान दिलाया है। हांगकांग बैपटिस्ट यूनिवर्सिटी की पत्रकारिता विशेषज्ञ रोज ल्यूकियू के अनुसार, पहले चीन के व्यावसायिक मीडिया के पास आपदा क्षेत्रों में जाकर स्वतंत्र रिपोर्टिंग करने की कुछ ज्यादा गुंजाइश होती थी। इस बार सरकारी मीडिया का ध्यान मुख्य रूप से राहतकर्मियों, बचाव अभियान, रसद व्यवस्था और सरकारी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर रहा। यानी पीड़ितों और प्रभावित गांवों की व्यक्तिगत कहानियां अपेक्षाकृत कम दिखाई दीं।

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सोशल मीडिया से वीडियो हटाने के आरोप

चीन में बाढ़ के बाद सोशल मीडिया पर प्रसारित कई वीडियो हटाए जाने का दावा भी किया गया है। चीन के एक मीडिया विशेषज्ञ डेविड बांडुरस्की ने कहा कि बाढ़ से जुड़े कई वीडियो सक्रिय रूप से हटाए जा रहे थे। दूसरी ओर चीनी विदेश मंत्रालय ने पहले ऐसी सामग्री हटाने और प्रत्यक्षदर्शियों की जानकारी दबाने के आरोपों से इनकार किया है। कुछ लोगों पर बाढ़ के संबंध में चीन द्वारा गलत सूचना बताए गए संदेश फैलाने के लिए कार्रवाई की खबर भी सामने आई है। ऐसे में असली चुनौती यही है कि कौन-सी जानकारी तथ्य है, कौन-सी अफवाह है और कौन-सी जानकारी उपलब्ध ही नहीं कराई जा रही—इसे स्वतंत्र रूप से जांचना कितना संभव है?

नेपाल और तिब्बत की त्रासदी सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं

इस आपदा में नेपाल की तरफ परिवार आज भी अपने लोगों की तलाश कर रहे हैं। काठमांडू में लापता लोगों के परिजन प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार से बचाव अभियान तेज करने की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ सीमा के पार तिब्बत में भी बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं, लेकिन वहां स्वतंत्र पत्रकारों और राहत संगठनों की सीमित पहुंच के कारण पीड़ितों की वास्तविक स्थिति समझना ज्यादा कठिन है। आपदा में सबसे जरूरी चीज सिर्फ बचाव नहीं, बल्कि सही सूचना भी होती है, क्योंकि लापता व्यक्ति के परिवार के लिए एक नाम, एक तस्वीर या एक सत्यापित जानकारी भी उम्मीद और निराशा के बीच का फर्क बन सकती है।

अब दुनिया चीन से क्या जानना चाहती है?

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नेपाल में तबाही का पैमाना लगातार सामने आ रहा है, लेकिन तिब्बत की तस्वीर अब भी धुंधली है। क्या वहां बताए गए मृतकों और लापता लोगों के आंकड़े अंतिम हैं? कितने गांव और घर पूरी तरह प्रभावित हुए? कितने विदेशी और स्थानीय लोग अभी संपर्क से बाहर हैं? कितने लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय मीडिया और राहत एजेंसियों को प्रभावित इलाकों तक पर्याप्त पहुंच मिलेगी?

इन सवालों के जवाब जितनी जल्दी और स्वतंत्र तरीके से सामने आएंगे, उतना ही इस भयावह आपदा का वास्तविक मानवीय पैमाना दुनिया समझ पाएगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नेपाल और तिब्बत दोनों तरफ भारी तबाही हुई है, लेकिन तिब्बत में इस तबाही की पूरी तस्वीर तक दुनिया की पहुंच अभी भी सीमित है।

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